- कभी-कभी कोई सपना इसलिए हमारे साथ रह जाता है, क्योंकि हम उसे समझ नहीं पाते. सुबह उठने के बाद भी उसका कोई दृश्य, कोई जगह, कोई चेहरा या कोई छोटी-सी बात हमारे भीतर बनी रहती है, लेकिन उसका अर्थ साफ नहीं होता. शायद यही कुछ सपनों को दिलचस्प बनाता है. वे हमें किसी संदेश की तरह नहीं मिलते, जिसका अर्थ तुरंत समझ आ जाए. वे हमारे सामने एक सवाल की तरह आते हैं. एक ऐसे सपने में मैं रात के समय किसी जगह पर था, शायद उस जगह का नाम Success था या कुछ वैसा ही.
- आसपास कुछ परिचित चीजें और परिचित लोग थे।.फिर मैं एक शिपयार्ड में घूम रहा था. मैं कुछ देख रहा था, कुछ खोज रहा था, शायद कुछ खरीदने की कोशिश भी कर रहा था. लेकिन मुझे ठीक-ठीक पता नहीं था कि मैं क्या खोज रहा हूं. सपने ने कोई उत्तर नहीं दिया. उसने केवल एक एहसास छोड़ा और कभी-कभी कोई एहसास ही एक महत्वपूर्ण सवाल की शुरुआत होता है.
- सपनों की कोई ऐसी शब्दावली नहीं
- विज्ञान में सपनों की कोई ऐसी निश्चित शब्दावली नहीं है, जिसमें हर सपने और हर प्रतीक का एक ही अर्थ हो. शिपयार्ड का मतलब हर व्यक्ति के लिए बदलाव ही हो, ऐसा जरूरी नहीं है. रात का मतलब भी हर बार डर नहीं होता. सपना सबसे पहले उस व्यक्ति का होता है, जिसने उसे देखा है. लेकिन अगर हम भविष्य जानने के बजाय अपने भीतर देखने की कोशिश करें, तो शिपयार्ड हमारे सामने खुद से मिलने की एक दिलचस्प जगह बन जाता है.
- खुद को क्या बनने के लिए तैयार कर रहे हैं?
- शिपयार्ड न तो यात्रा की शुरुआत है और न उसका अंत. वह बीच की जगह है. वहां कुछ ठीक किया जा रहा होता है. कुछ बनाया जा रहा होता है. कुछ पुराना खोला जा रहा होता है और कुछ नया समुद्र पार करने के लिए तैयार किया जा रहा होता है. शायद इसी कारण वह दृश्य मेरे भीतर रह गया. शायद सपना यह नहीं पूछ रहा था कि ‘आप कहां जा रहे हैं? शायद वह धीरे से पूछ रहा था, आप खुद को क्या बनने के लिए तैयार कर रहे हैं?
- सपने की एक और बात महत्वपूर्ण है. मैं वहां खड़ा नहीं था. मैं घूम रहा था और कुछ खोज रहा था. बहुत-सी जिंदगियां भी शायद ऐसी ही होती हैं. हम एक संभावना से दूसरी संभावना की ओर चलते रहते हैं. नौकरी बदलते हैं, चीजें खरीदते हैं, घर बनाते हैं, उपलब्धियां जुटाते हैं, लोगों से मिलते हैं, पहचान खोजते हैं और इस पूरे चलने को प्रगति कह देते हैं. लेकिन चलना और दिशा एक ही बात नहीं है. कोई व्यक्ति 20 साल तक चलता रह सकता है और फिर भी उसे पता न हो कि वह खोज क्या रहा था.
- एक बच्चा केवल इसलिए तितली के पीछे दौड़ सकता है क्योंकि वह सुंदर है. एक बड़ा आदमी सफलता के पीछे दशकों तक दौड़ सकता है और एक दिन उसे पता चल सकता है कि उसने कभी रुककर यह पूछा ही नहीं कि वह सफलता से चाहता क्या था.
- मैं खोज क्या रहा हूं?
- यहीं हमारे भीतर एक अजीब बातचीत शुरू होती है. एक आवाज कहती है, ‘कुछ खोजो. फैसला करो. जल्दी आगे बढ़ो. दूसरी आवाज पूछती है, ‘लेकिन मैं खोज क्या रहा हूं? पहली आवाज अधीर हो जाती है. ‘आपको पता होना चाहिए. दूसरी चुप रहती है. ‘मुझे अभी नहीं पता. शायद हमें इस दूसरी आवाज का थोड़ा अधिक सम्मान करना चाहिए. हर बार न जानना भ्रम नहीं होता. कभी-कभी न जानना ईमानदारी होता है.
- हम जीवन के किसी नए हिस्से के सामने खड़े हो सकते हैं, लेकिन अगली मंजिल अभी दिखाई न दे. पुरानी बुद्धि हमें बार-बार यही सिखाती रही है कि जो स्पष्ट है, उसके अनुसार कदम उठाइए, लेकिन जो अभी दिखाई नहीं दे रहा, उसके बारे में झूठी निश्चितता मत बनाइए. नाव चलाने वाले को पूरा समुद्र पहले से दिखाई देने की जरूरत नहीं होती. उसे अगला सही कदम उठाने जितना ही जानना होता है.
- कुछ खरीदने की कोशिश
- सपने में एक और बात थी. मैं शायद कुछ खरीदने की कोशिश कर रहा था. शायद वह कोई वस्तु नहीं थी. इंसान अक्सर दिखाई देने वाली चीजों के जरिए अपनी अदृश्य जरूरतों को पूरा करना चाहता है. हम आराम खरीदते हैं, जबकि भीतर शायद शांति चाहिए होती है. हम चीजें जमा करते हैं, जबकि भीतर सुरक्षा चाहिए होती है. हम पहचान चाहते हैं, जबकि भीतर शायद यह महसूस करना चाहते हैं कि हमारी जिंदगी का कोई अर्थ है.
- हम किसी दूसरे इंसान को खोजते हैं, जबकि शायद हमें अपने ही भीतर किसी जुड़ाव की कमी महसूस हो रही होती है. बाहर वस्तु दिखाई देती है. उसके पीछे की भूख दिखाई नहीं देती. शायद इसी कारण शिपयार्ड हमारे भीतर की जिंदगी को समझने के लिए एक तैयार जहाज से भी बेहतर तस्वीर है. तैयार जहाज सुंदर दिखाई देता है, लेकिन उस पर निर्माण का काम खत्म हो चुका है.
- शोर, उलझन, अधूरापन और अनिश्चितता
- शिपयार्ड में शोर है, उलझन है, अधूरापन है और अनिश्चितता है. फिर भी बदलाव वहीं होता है. हमारे जीवन में भी कभी ऐसा समय आता है, जब हमारा पुराना रूप हमें ठीक से फिट नहीं बैठता, लेकिन नया रूप अभी बना नहीं है. हमें लगता है कि शायद हम असफल हो रहे हैं, क्योंकि हम किसी को अपना तैयार रूप दिखा नहीं सकते. लेकिन शायद हम असफल नहीं हैं. शायद हम केवल निर्माण में हैं.
- तो शायद उस सपने ने मुझे यह नहीं बताया कि मुझे क्या खरीदना चाहिए, कहाँ जाना चाहिए या कल क्या होने वाला है. शायद उसने मुझे इससे कहीं सरल बात दिखाई. मैं खोज रहा हूं. मेरे भीतर कुछ चल रहा है. कुछ बदल रहा है और अभी मेरे पास उसके लिए शब्द नहीं हैं.
- अभी अपना रास्ता नहीं चुना
- शायद यह हममें से बहुतों की कहानी है. उस बच्चे की भी, जिसने अभी अपना रास्ता नहीं चुना है. उस युवा की भी, जिसने कुछ हासिल कर लिया है लेकिन भीतर एक अजीब खालीपन महसूस करता है. उस माता-पिता की भी, जिसके बच्चे अब अपने रास्ते पर चले गए हैं. उस व्यक्ति की भी, जो अपने जीवन में उस जगह पहुंच चुका है, जिसका उसने कभी सपना देखा था.
- और उस बुजुर्ग की भी, जो एक दिन पीछे मुड़कर पूछता है कि आखिर इन सारे वर्षों का अर्थ क्या था. हर उम्र में हमारे भीतर एक शिपयार्ड हो सकता है. क्या पता आप खोए हुए नहीं हैं. क्या पता आप बस अपनी ही जिंदगी के उस अधूरे हिस्से में खड़े हैं, जहां आप उस चीज को खोज रहे हैं जिसे अभी नाम देने के लिए आप तैयार नहीं हुए हैं?
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