समितियों में खाद का अकाल, निजी दुकानों पर उपलब्धता की बहार! आखिर किसके संरक्षण में चल रहा खाद वितरण का खेल? शालिनी सिंह पटेल ने केंद्र सरकार को घेरा
आमोद कुमार
बाँदा। बुंदेलखंड का किसान इन दिनों खेत में फसल उगाने से ज्यादा खाद की तलाश में पसीना बहा रहा है। सहकारी समितियों के दरवाजों पर इंतजार, खाली हाथ लौटते किसान और दूसरी ओर निजी दुकानों पर खाद उपलब्ध होने की शिकायतें सरकारी वितरण व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। सवाल सीधा है—जब सरकार खाद की आपूर्ति का दावा कर रही है तो किसानों के हिस्से की खाद आखिर जा कहां रही है? समितियां खाली क्यों हैं और निजी दुकानों पर खाद कैसे पहुंच रही है?इसी विसंगति को लेकर जनता दल यूनाइटेड की प्रदेश उपाध्यक्ष एवं बुंदेलखंड संगठन प्रभारी शालिनी सिंह पटेल ने दिल्ली स्थित कृषि भवन में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर से मुलाकात कर मांग पत्र सौंपा। उन्होंने खाद संकट को महज आपूर्ति की समस्या मानने के बजाय वितरण व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा गंभीर सवाल बताया।
शालिनी सिंह पटेल ने सवाल उठाया कि यदि खाद पर्याप्त मात्रा में भेजी जा रही है तो सहकारी समितियों पर उसका अभाव क्यों है? क्या आवंटन और वितरण के बीच कोई ऐसा छेद है, जहां से किसानों के हिस्से की खाद दूसरी दिशा में चली जाती है? यदि निजी दुकानों पर खाद उपलब्ध है तो सरकारी समितियों पर किसान खाली हाथ क्यों लौट रहे हैं? इन सवालों का जवाब केवल आश्वासन से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच और सार्वजनिक आंकड़ों से मिलना चाहिए।उन्होंने खाद की खरीद, आवंटन, परिवहन और बिक्री की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग करते हुए iFMS और e-Urvarak पोर्टल के रिकॉर्ड का मिलान कराने पर जोर दिया। साथ ही यह सार्वजनिक करने की मांग की कि किस जिले, किस सहकारी समिति और किस निजी विक्रेता को कितनी खाद भेजी गई और वास्तव में कितनी बिक्री हुई।उन्होंने सहकारी समितियों पर डीएपी, यूरिया और एनपीके की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने, कर्मचारियों की अनुपस्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था बनाने तथा कालाबाजारी, जमाखोरी और निर्धारित मूल्य से अधिक वसूली करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की।उन्होंने तल्ख लहजे में कहा कि कागजों पर खाद की पर्याप्त आपूर्ति दिखाकर किसानों की बदहाली पर पर्दा नहीं डाला जा सकता। सरकारी आंकड़ों में खाद की उपलब्धता और खेतों में किसान की बेबसी के बीच का अंतर आखिर किसकी जिम्मेदारी है? किसान को अपने ही अधिकार की खाद के लिए घंटों कतार में खड़ा रहना पड़े और मजबूरी में निजी दुकानों से महंगे दामों पर खरीदारी करनी पड़े तो यह व्यवस्था की सफलता नहीं, बल्कि उसकी विफलता का आईना है।शालिनी सिंह पटेल ने स्पष्ट किया कि बुंदेलखंड का किसान किसी की कृपा नहीं, बल्कि अपनी मेहनत और अधिकार का उचित मूल्य मांग रहा है। खाद की कमी के नाम पर किसानों को आर्थिक चोट पहुंचाने वालों के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है। क्योंकि किसान की फसल केवल खेत में नहीं सूखती, बल्कि सरकारी लापरवाही और अव्यवस्थित वितरण के बीच उसकी उम्मीदें भी दम तोड़ने लगती हैं।उन्होंने चेतावनी दी कि किसानों के हक की लड़ाई किसी ज्ञापन तक सीमित नहीं रहेगी। जब तक बुंदेलखंड के किसानों को नजदीकी सहकारी समितियों पर निर्धारित सरकारी मूल्य में खाद उपलब्ध नहीं होती, तब तक इस मुद्दे को लगातार उठाया जाता रहेगा।
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