एमपी सीमा से ओवरलोड मोरंग के ट्रकों की बेखौफ आवाजाही पर सवाल, कथित कारखास की रवानगी अटकी तो पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली भी घेरे में
आमोद कुमार
बाँदा। कानून की किताब में स्थानांतरण आदेश का अपना महत्व है, लेकिन गिरवां थाने का मामला कुछ अलग ही कहानी बयां करता नजर आ रहा है। स्थानांतरण आदेश जारी होने के बावजूद पुलिसकर्मी गजेंद्र राजपूत की थाने से रवानगी न होना अब महज प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि विभागीय जवाबदेही पर गंभीर सवाल बनता जा रहा है। आखिर ऐसा कौन-सा अदृश्य प्रभाव है, जिसके सामने विभागीय आदेश का अनुपालन ठहर गया है? किसके संरक्षण में कथित कारखास की कुर्सी अब तक सुरक्षित है?गिरवां थाना क्षेत्र में मध्य प्रदेश की सीमा से मोरंग लदे ओवरलोड ट्रकों की आवाजाही को लेकर स्थानीय स्तर पर लगातार शिकायतें और आरोप सामने आ रहे हैं। क्षमता से अधिक वजन लादकर सड़कों पर दौड़ते भारी वाहनों ने ग्रामीण रास्तों की दुर्दशा, सरकारी राजस्व की क्षति और सड़क हादसों के खतरे को लेकर चिंता बढ़ा दी है। ऐसे में पुलिस की भूमिका और निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।स्थानीय चर्चाओं और सूत्रों के हवाले से गजेंद्र राजपूत को थाने में कथित कारखास की भूमिका से जोड़कर देखा जा रहा है। वहीं जावेद नामक व्यक्ति के कथित परिवहन कारोबार और मध्य प्रदेश से आने वाले मोरंग वाहनों के साथ संभावित सांठगांठ को लेकर भी आरोप लगाए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन उनकी निष्पक्ष जांच कराना पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि सीमा पार से आने वाले मोरंग लदे ट्रकों की वैध रॉयल्टी, एम-चालान, परिवहन प्रपत्र और निर्धारित भार क्षमता की जांच कौन कर रहा है? यदि वाहन नियमों के मुताबिक चल रहे हैं तो शिकायतों का जवाब आंकड़ों और जांच रिपोर्ट से दिया जाए। और यदि ओवरलोडिंग हो रही है तो उन वाहनों को सड़क पर बेखौफ दौड़ने की छूट आखिर कैसे मिल रही है?यह भी विचारणीय है कि जब स्थानांतरण आदेश जारी हो चुका है तो संबंधित पुलिसकर्मी को तत्काल कार्यमुक्त करने में बाधा क्या है? यदि कोई प्रशासनिक कारण है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। पुलिस विभाग में आदेशों का पालन पद और प्रभाव देखकर होने लगे तो अनुशासन की व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है।अब पुलिस अधीक्षक बाँदा से मांग उठ रही है कि गजेंद्र राजपूत की रवानगी लंबित रहने के कारणों की विभागीय जांच कराई जाए। गिरवां क्षेत्र में ओवरलोड मोरंग वाहनों के आवागमन की विशेष निगरानी हो तथा खनन, परिवहन और पुलिस विभाग के संबंधित अभिलेखों का मिलान कराया जाए। किसी भी स्तर पर अवैध वसूली, मिलीभगत या संरक्षण की पुष्टि होने पर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।कानून की ताकत उसकी निष्पक्षता में होती है, किसी व्यक्ति के रसूख में नहीं। यदि एक स्थानांतरण आदेश भी जमीन पर लागू नहीं हो पा रहा तो आम नागरिक को न्याय और नियमों के पालन का भरोसा कैसे मिलेगा? गिरवां का सवाल अब सिर्फ एक पुलिसकर्मी की रवानगी का नहीं, बल्कि पुलिस प्रशासन की जवाबदेही और कानून के इकबाल का बन चुका है।
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