द्रौपदी वाह! रामनाथ ...?


द्रौपदी वाह! रामनाथ ...?
राजनीतिज्ञों के बयान पे पेदी के लोटे के समान होते हैं। यह लाभ हानि को तराज़ू के पलड़े में तौलने के उपरान्त ही मुंह से आवाज़ निकलती हैं। खासतौर से वह नेता जो सत्ता से फिसलने के बावजूद लिखकर उद्बोधन करे। उसका दिया गया हर बयान जेल की यात्रा से बचने की कवायद भी हो सकती है। राष्ट्रपति चुनाव में मुर्मू को बसपा के समर्थन के आखिरकार मायने क्या है,सवाल विमर्श को निमंत्रित करता है। लोकतन्त्र की खूबसूरती यही है कि असहमत होने पर अपनी बात रखने का अवसर मिलता है। यह लोकतन्त्र के सिद्धांत हैं वास्तविक धरातल पर टिकते हैं या औंधे मुंह गिर जाते हैं निर्भर करता है सत्ता के चरित्र और विपक्ष के कर्मयोग पर। इस कथन को वर्तमान सरकार के आदर्श और मर्यादा से जोडने की कोशिश न करें। सरकार के मर्यादा पर टिप्पणी करने की हमारी पहल तो बिल्कुल नही है। उम्र के इस पड़ाव पर ही रोटी को भिगो कर खाने की जहमत क्यों मोल लूं। बत्तीसी और पसलियां भी सलामत रखनी है। सूखी रोटी के स्वादहीन आचरण और कृष काया का भी ध्यान रखना है। जब मंहगाई आसमान से ऊंची उड़ान भरने की प्रतियोगिता शूरू कर दे तब बाजार से खरीददारी करने की हिम्मत बड़ी मुश्किल से होती है। दुकानों की कतारों के बीच से गुजरना भी ऐसा प्रतीत है तो जैसे बंधक बना के यहां लाकर पटक दिया गया है। यहां से हम दम घुटते माहौल से शीघ्रतिशीघ्र निकल जाने की जल्दी में हैं।
2017 में भी राष्ट्रपति का चुनाव हुआ था,2022 में भी हो रहा प्राकृतिक आपदा नही आई तो 2027में भी राष्ट्रपति का चुनाव होगा। 2017 राष्ट्रपति चुनाव में भी कोई राष्ट्रपति का उम्मीदवार नही था 2022में भी कोई नही है और 2027 मे भी कोई नही होगा। 2017में एक दलित व्यक्ति उम्मीदवार था इस बार आदिवासी महिला और 2027 में भी इन्हीं में से कोई होगा। जातीय मानसिकता से ग्रसित लोग नैतिक पतन के इतने गर्त में गिर जाएंगे कल्पना करते ही दिल दहल जाता है। जो व्यक्ति देश का राष्ट्राध्यक्ष चुना जाने वाला है वह राष्ट्रपति नही अपितु दलित है, आदिवासी है, महिला है ऐसी निकृष्टतम सोच का देश विश्वगुरू बनेगा। संभव है बन भी जाय आखिर विश्व में भी तो जातीय विषमता का बीजारोपण करना है। जब से द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी तय हुई तभी से जात्याभिमानी मीडिया यह दिखाने में व्यस्त हैं कि मुर्मू मंदिरों में झाड़ू लगाने में कितनी पारंगत है।
कमाल तो यह है साहब कि उनके गांव में यदि सरकार बिजली पहुंचाने में अभी तक कामयाब नही हो पाई थी तब भी कोई शिकायत नही थी, लेकिन तकलीफ़ तब ज़रूर होती है जब रात दिन झाड़ू लगवाने के बावजूद ईश्वर भी मज़दूरी देने से मुकर गया। मुर्मू को गांव में बिजली का तार दौड़ते हुए देखने का ख़्वाब तब पूरा हो रहा है जब वह राष्ट्रपति की उम्मीदवार हुईं। हमारे देश की उवाच सरकार लम्बे समय से दावे कर रही है कि हमने देश के सभी गांवों में बिजली पहुंचा दी है। सरकार के दावे को चुनौती देने की हिमाकत की नही जा सकती, इसलिए सोचने पर मजबूर हूं कि क्या उड़ीसा का ऊपरबेदा गांव भारत का ही अंग है? यदि हां तो क्या इस गांव में बिजली आपूर्ति की नई तकनीक ईजाद की गई थी जिसमें खंभे और तार की कोई आवश्यकता नही सीधे बिजली हर घर में पहुंच जाती थी। मोदी हैं तो संभव है।
कभी सोच कर देंखे! झारखण्ड की राज्यपाल होने के बावजूद वह अपने गांव में बिजली की आपूर्ति करा पाने में असफल थी। जब राज्यपाल का गांव भी बिजली आपूर्ति के लिए तरस जाए तब साधारण गांवों की दुर्दशा की सुध कौन लेगा? एक दलित और आदिवासी दिन रात किन किन दैहिक पीड़ाओं के दंश सहता है वही जान सकता है, अन्य नही। मुबारक हो मुर्मू जी! राष्ट्रपति होने की नही। आपके गांव तक बिजली के उपकरणों के पहुंच की। पता नही उन खंभों पर फैले तारों में बिजली दौड़ेगी या नही? भविष्य के गर्भ में है। राष्ट्रपति भवन पहुंचने की शुभकामना! तब जब पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन जैसे; सरकार और उच्चतम न्यायालय के विषमतावादी प्रस्तावों पर टिप्पणी करते हुए संशोधन के लिए फाईल वापस कर देंगी तब राष्ट्रपति होने के गौरव को संरक्षित रखने की बधाई भी दे देंगे।
विषय की सार्थकता पर क़दम खींचते हुए विमर्श को वहीं केंद्रित करना प्रासंगिक होगा। 2017 में राम नाथ कोविंद राष्ट्रपति के उम्मीदवार थे, तब बीएसपी नेत्री ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि यह तो कोरी है कोई अनुसूचित जाति का थोड़े ही है। चूंकि भारत में भक्तों और भगवान का गहरा नाता है। भगवान होता है या नही यह विषय वृहद है चर्चा को उतना लम्बा चौड़ा खींचना समीचीन नही। बुद्धिष्ट मतावलंबी ईश्वर के अस्तित्व को नकारते हैं परन्तु संबोधन में तथागत गौतम बुद्ध से पुर्व भगवान जोड़ने पर गौरव महसूस करते हैं। यहां हम प्राचीन भगवानों की चर्चा नही कर रहे हैं अर्वाचीन या अद्यतन में स्वमेव घोषित चमत्कारी भगवानों का वाचन कर रहे हैं। जो ताकत हासिल करते हैं जनादेश से यानि देश के नागरिकों के मतों से लेकिन उन्हें ठेंगा दिखाते हुए स्वयं को उन्हीं नागरिकों का भगवान घोषित कर देते हैं। संभव है कि वह स्वयं को चौकीदार कहलाना पसन्द करते हों, परन्तु बन बैठे तो भगवान ही हैं। यह प्रवृत्ति किसी एक दल तक सीमित नही है, सभी दल और दल दल इसी कीचड़ में सने है।
स्वयं को देवी घोषित कर चुकी बीएसपी नेत्री ने जब 2017 में रामनाथ कोविंद को कोरी कहकर संबोधित किया तब क्या था उनके भक्तों ने कोविंद को अनुसूचित जाति से ही ख़ारिज कर दिया। दे दी तबले पर थाप, यह तो भाजपा का गुलाम है। अब जब देवी जी ने उद्घोषणा की कि राष्ट्रपति चुनाव में हम द्रौपदी मुर्मू का समर्थन करेंगे तब भक्तों ने फिर तरन्नुम छेड़ दिया है बहन जी ने भाजपा का नही अपितु एक आदिवासी महिला का समर्थन किया है। इन परिस्थितियों में भी क्या हमें मीडिया को दोषी ठहराना चाहिए, जब समर्थन और विरोध का आधार मुद्दा नही स्वतः की पसन्द हो।
जब भाजपा प्रत्याशी आदिवासी होने के नाते बसपा समर्थन की पात्र हैं, बहुजन समाज के मतों से चुने गए एमपी अपना मत देने में गौरव महसूस करेंगे, तब उप्र में मंत्री बनी, बेबी रानी मौर्य, असीम अरुण, राजलक्ष्मी गौतम अस्वीकार क्यों, क्या वह दलित नही है? वही क्यों केन्द्र में भी बने दलित मंत्री स्वीकार्य क्यों नही, सिर्फ़ इसलिए कि देवी जी ने उन्हें प्रमाण पत्र नही जारी किया? लुकाछिपी का यह खेल देश में आंबेडकरवादी आन्दोलन का कब्रगाह बनाने में सहायक भूमिका अदा नही कर रहा है? इन नेताओं या तथाकथित अलौकिक शक्तियों में इतना साहस नही कि अपने समर्थकों से सच कह सकें कि मुर्मू को हम आदिवासी महिला के नाते नही तोता मैना की जोड़ी ईडी और सीबीआई से बचने के लिए बीजेपी को समर्थन कर रहे हैं। बेहतर होगा सभी जागरूक नागरिक इस पहलू पर विचार अवश्य करें! ताकि दोस्त और दुश्मन की पहचान बनी रहे। सामने खड़े दुश्मन से जीतना सरल है परन्तु आस्तीन में छिपा कब हमला बोल देगा कोई भरोसा नही।
स्मरण रहे 2017 में बीजेपी के पास राष्ट्रपति चुनाव जीतने के लिए पर्याप्त संख्या बल था इसलिए ईडी और सीबीआई पिजड़े से बाहर नही निकले। एमपी, राजस्थान, छत्तीसगढ़,महाराष्ट्र, झारखण्ड में भाजपा की सरकार थी। उप्र में बीजेपी के 324 विधायक और 73 एमपी थे। काल्पनिक महाभारत में शिखंडी के दम पर युद्ध जीत जा सकता है अद्यतन में कदापि नही।
गौतम राणे सागर
राष्ट्रीय संयोजक,
संविधान संरक्षण मंच।

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Rajesh Kumar Siddharth

अब तक इंडिया लाइव न्यूज़ चैनल

राजेश कुमार सिद्धार्थ अबतक मीडिया ग्रुप के संपादक-इन-चीफ हैं, जिन्हें 25 वर्षों से अधिक का पत्रकारिता जगत में अनुभव प्राप्त है, और जो अपनी कुशल नेतृत्व क्षमता से अबतक मीडिया ग्रुप

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