पहाड़ों की संपदा ही मैदानी क्षेत्रों का स्वास्थ्य है; वेदांता दोनों को तबाह करने पर आमादा!
रायगढ़ जिले तथा इससे सटे कालाहांडी सीमावर्ती क्षेत्रों में वेदांता लिमिटेड की खनन एवं औद्योगिक गतिविधियों का गहन विश्लेषण पर्यावरण, सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं, कानूनी अधिकारों और मानवाधिकारों से जुड़े गंभीर विवादों को उजागर करता है। विशेष रूप से लांजीगढ़ एल्युमिना रिफाइनरी कॉरिडोर और सिजिमाली बॉक्साइट खदान जैसी नई खनन परियोजनाओं को लेकर स्थानीय स्तर पर व्यापक असंतोष सामने आ रहा है।
रायगढ़ जिले के विस्तृत पहाड़ी क्षेत्र और पठार प्राकृतिक जल भंडार के रूप में कार्य करते हैं। ये मानसून के दौरान वर्षा जल को अपने भीतर संचित कर सालभर झरनों, नालों और नदियों को पानी उपलब्ध कराते हैं। वंशधारा और नागावली जैसी प्रमुख नदियों के जलग्रहण क्षेत्र को बनाए रखने में इन पहाड़ियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में पहाड़ों की ऊपरी सतह को काटकर बॉक्साइट का खनन किए जाने से जल संरक्षण की प्राकृतिक क्षमता प्रभावित होने, नीचे के क्षेत्रों में प्राकृतिक झरनों के सूखने तथा कृषि कार्यों के लिए पानी की उपलब्धता में भारी कमी आने की आशंका है।इसके अलावा, एल्युमिना रिफाइनरी से निकलने वाले जहरीले रेड मड और फ्लाई ऐश का उचित प्रबंधन नहीं होने पर मिट्टी, जलस्रोतों और पर्यावरण पर दीर्घकालिक दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं। अतीत में रेड मड तालाबों से अपशिष्ट का रिसाव, स्लरी का बाहर निकलना और बारिश के पानी के साथ प्रदूषित पदार्थों का स्थानीय जलधाराओं में पहुंचना पर्यावरण प्रदूषण को लेकर गंभीर चिंता पैदा करता रहा है।
सिजिमाली खनन परियोजना के मामले में 700 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि सहित बड़े वन क्षेत्रों को खदानों, परिवहन सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचे के लिए इस्तेमाल किए जाने की आशंका जताई गई है। इससे घने जंगलों का प्राकृतिक संपर्क टूट सकता है। वन्यजीवों के आवागमन, जैव विविधता और स्थानीय जलवायु पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है।रायगढ़ जिले में डोंगरिया कंध और कुटिया कंध जैसे विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) के साथ-साथ अनेक आदिवासी एवं दलित किसान समुदाय निवास करते हैं। इन समुदायों के लिए पहाड़ केवल खनिज संपदा का स्रोत नहीं हैं, बल्कि उनकी धार्मिक आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं। नियमराजा जैसे आराध्य देवता के साथ इन पहाड़ियों का गहरा आध्यात्मिक संबंध है।स्थानीय आदिवासी परिवार महुआ, केंदू पत्ता, साल बीज, जंगली खाद्य पदार्थों और औषधीय वनस्पतियों जैसे लघु वनोपज (NTFP) पर काफी हद तक निर्भर हैं। इसके अलावा पहाड़ी ढलानों पर पारंपरिक डोंगर खेती और पशु चराई उनकी आजीविका के प्रमुख साधन हैं। खनन परियोजनाओं के कारण इन प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक आजीविका के साधनों के नष्ट होने से आदिवासी परिवारों को कम मजदूरी वाले अस्थायी श्रम कार्यों पर निर्भर होना पड़ सकता है।वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले में नियमगिरि पहाड़ियों पर खनन के संबंध में डोंगरिया कंध समुदाय की ग्रामसभाओं के निर्णय को महत्वपूर्ण मान्यता दी गई थी। हालांकि, आरोप है कि नई खनन परियोजनाओं में स्थानीय ग्रामसभाओं और जनता की राय को उचित महत्व नहीं दिया जा रहा है।सिजिमाली बॉक्साइट खदान आवंटन का विरोध कर रहे ग्रामीणों ने जनसुनवाई और वैधानिक मंजूरी की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि ग्रामसभा की सहमति प्राप्त करने की प्रक्रिया में दबाव, हस्तक्षेप और अनियमितताएं हुईं तथा आदिवासी समुदायों की स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति (FPIC) नहीं ली गई।विभिन्न स्वतंत्र कानूनी और वैज्ञानिक अध्ययनों में परियोजना की प्रारंभिक पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्टों में कई महत्वपूर्ण जानकारियों की कमी की ओर भी ध्यान दिलाया गया है। विशेष रूप से पहाड़ी क्षेत्रों की जलप्रवाह व्यवस्था, जहरीले अपशिष्ट के दीर्घकालिक प्रबंधन तथा आदिवासी आबादी की सामाजिक-आर्थिक स्थिति से संबंधित पर्याप्त जानकारी शामिल नहीं होने के आरोप लगाए गए हैं।
खनन परियोजनाओं को लेकर काशीपुर ब्लॉक और सिजिमाली पहाड़ियों के आसपास विरोध का सामना कर रहे क्षेत्रों में सर्वेक्षण तथा बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए प्रशासन और सुरक्षा बलों द्वारा भारी पुलिस बल तैनात किए जाने की शिकायतें भी सामने आई हैं।मां माटी माली सुरक्षा समिति और नियमगिरि सुरक्षा समिति जैसे संगठनों के कार्यकर्ताओं तथा स्थानीय जननेताओं को कथित तौर पर एहतियाती हिरासत, लंबे समय तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रहने और कई आपराधिक मामलों का सामना करना पड़ रहा है। आरोप है कि शांतिपूर्ण जनआंदोलनों को दबाने के लिए ऐसी कार्रवाई की जा रही है। सड़क निर्माण और विस्थापन अभियानों के दौरान झड़पों, गांवों में पुलिस कार्रवाई तथा मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायतें भी सामने आई हैं।
खनन और एल्युमिना रिफाइनिंग उद्योग अत्यधिक पूंजी एवं मशीन आधारित होने के कारण स्थानीय लोगों के लिए स्थायी और उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार के अवसर सीमित हैं। तकनीकी कौशल की कमी के चलते अधिकांश स्थानीय मजदूरों को कम वेतन वाले अस्थायी ठेका कार्यों तक ही सीमित रहना पड़ता है।
कंपनी की ओर से कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) कार्यक्रमों के तहत स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और स्वच्छता सुविधाएं विकसित करने के दावे किए जाते हैं। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि इन योजनाओं से पुश्तैनी जमीन, स्वच्छ जलस्रोतों और आत्मनिर्भर कृषि आधारित आजीविका के स्थायी नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती।
इस पूरे मामले पर माइंस, मिनरल्स एंड पीपुल (MM&P) के राष्ट्रीय संयोजक रवि प्रगड़ा ने कहा,
“रायगढ़ के खनिज संसाधनों से अर्जित संपत्ति औद्योगिक केंद्रों और कॉर्पोरेट मुख्यालयों तक पहुंच जाती है, जबकि इसके पर्यावरणीय, स्वास्थ्य संबंधी और सामाजिक दुष्परिणामों का बोझ स्थानीय जनता को उठाना पड़ता है। मैदानी क्षेत्रों के स्वास्थ्य और जीवन को सुरक्षित रखने के लिए पहाड़ों की संपदा तथा प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। अन्यथा कॉर्पोरेट स्वार्थ और लूट के कारण पहाड़ी और मैदानी दोनों क्षेत्र भारी विनाश का सामना करेंगे। जनता के बुनियादी हितों के साथ किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार्य नहीं है।”
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