डीजीपी की दो टूक_पत्रकारों के सम्मान से समझौता बर्दाश्त नहीं!

पुलिस की वर्दी का रौब पत्रकारिता की आवाज दबाने का लाइसेंस नहीं!

उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) ने मीडिया के सम्मान और स्वतंत्र पत्रकारिता को लेकर पुलिस महकमे को सख्त संदेश दिया है। स्पष्ट निर्देश है कि पत्रकारों के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाए, उनकी बात गंभीरता से सुनी जाए और संवाद में मर्यादा का पालन हो।

सवाल सीधा है_जब प्रदेश के डीजीपी का संदेश इतना स्पष्ट है, तो आखिर थानों और चौकियों पर कुछ पुलिसकर्मियों की कार्यशैली में इसका असर कब दिखाई देगा?

पत्रकार कोई पुलिस का मातहत नहीं, बल्कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। भ्रष्टाचार, अन्याय और जनसमस्याओं को उजागर करना पत्रकार का कर्तव्य है, न कि किसी की चापलूसी करना।

याद रखिए!
सवाल पूछना पत्रकारिता है, सवालों से बचना जवाबदेही से भागना है। वर्दी का सम्मान जरूरी है तो कलम की स्वतंत्रता का सम्मान भी उतना ही जरूरी है।

डीजीपी का संदेश केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि हर थाने, हर चौकी और हर पुलिसकर्मी के व्यवहार में दिखाई दे।!

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