पति की मौत के पांच साल बाद गिरफ्तारी, आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में ब्लॉक कर्मी महिला जेल भेजी गई
बांदा। रिश्तों की दरार जब जिंदगी पर भारी पड़ जाए तो पीछे छूटने वाले सवाल वर्षों तक पीछा नहीं छोड़ते। कमासिन विकासखंड में पांच साल पहले हुई लिपिक संजय श्रीवास्तव की आत्महत्या का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। पति की मौत के मामले में आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों का सामना कर रही पत्नी रोली उर्फ कांति को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। पांच साल की कानूनी प्रक्रिया और विवेचना के बाद हुई इस गिरफ्तारी ने पुराने प्रकरण को फिर चर्चा में ला दिया है।मामला वर्ष 2021 का है। कमासिन ब्लॉक में लिपिक के पद पर तैनात संजय श्रीवास्तव ने ब्लॉक परिसर स्थित सरकारी आवास में आत्महत्या कर ली थी। घटना के बाद मृतक की बहन सीमांजलि ने तीन मार्च 2021 को कमासिन थाने में पत्नी के विरुद्ध हत्या का मुकदमा दर्ज कराया था।प्रारंभिक मुकदमे में हत्या की धारा 302 लगाई गई थी, लेकिन बाद में विवेचना क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई। जांच के उपरांत हत्या की धारा के स्थान पर आत्महत्या के लिए उकसाने की धारा 306 के तहत न्यायालय में आरोपपत्र दाखिल किया गया। न्यायालय में उपस्थित नहीं होने पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, बांदा ने गिरफ्तारी वारंट जारी किया।पुलिस के मुताबिक रविवार को कस्बा इंचार्ज मनीष शर्मा ने हेड कांस्टेबल सत्येंद्र कुमार और महिला कांस्टेबल ममता के साथ मुखबिर की सूचना पर दांदौ तिराहे से दोपहर करीब ढाई बजे रोली उर्फ कांति को गिरफ्तार कर लिया। आवश्यक कानूनी कार्रवाई के बाद उसे जेल भेज दिया गया।
मौत के बाद अनुकंपा नौकरी, अब गिरफ्तारी ने बढ़ाई चर्चा
इस प्रकरण का एक और पहलू लोगों का ध्यान खींच रहा है। बताया गया है कि पति संजय श्रीवास्तव की मृत्यु के बाद रोली को अनुकंपा के आधार पर उसी कमासिन विकासखंड में लिपिक की नौकरी मिली थी। जिस सरकारी व्यवस्था में पति कार्यरत था, उसी व्यवस्था में उसकी मृत्यु के बाद पत्नी को नौकरी मिली और अब उसी महिला की गिरफ्तारी पुराने मामले में चर्चा का विषय बन गई है। पांच साल तक क्यों खिंचती रही कानूनी प्रक्रिया?
यह मामला केवल एक गिरफ्तारी की खबर नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की लंबी यात्रा की कहानी भी है। वर्ष 2021 में दर्ज मुकदमे से लेकर विवेचना, आरोपपत्र और गिरफ्तारी वारंट तक पहुंचने में पांच वर्ष का समय लगा। इस दौरान मृतक के परिजनों के मन में न्याय की उम्मीद और अनगिनत सवाल रहे होंगे।हालांकि, गिरफ्तारी किसी को अपराधी साबित नहीं करती और आरोपपत्र दोषसिद्धि का प्रमाण नहीं होता। रोली के विरुद्ध धारा 306 के आरोपों पर अंतिम फैसला न्यायालय साक्ष्यों के आधार पर करेगा।
रिश्तों के विवाद में एक जिंदगी खत्म हो गई, परिवार बिखर गया और मामला वर्षों तक कानूनी फाइलों में चलता रहा। अब जरूरत इस बात की है कि न्यायिक प्रक्रिया बिना अनावश्यक देरी के पूरी हो और सच सामने आए। क्योंकि किसी की मौत के बाद आरोपों की गूंज नहीं, बल्कि साक्ष्यों के आधार पर मिलने वाला न्याय ही पीड़ित परिवार को वास्तविक जवाब दे सकता है।
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