अब तक न्याय नीरज कश्यप तहसील रिपोर्टर


अब तक न्याय नीरज कश्यप तहसील रिपोर्टर

अस्पताल है या खंडहरनुमा भवन? परिसर की बदहाल स्थिति और व्यवस्थाओं पर उठ रहे गंभीर सवाल, जिम्मेदार अधिकारियों की निगरानी पर भी सवालिया निशान

लखीमपुर खीरी। सरकार एक ओर प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने, सरकारी अस्पतालों में मरीजों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराने और स्वच्छता व्यवस्था को दुरुस्त रखने के बड़े-बड़े दावे कर रही है। वहीं दूसरी ओर जनपद लखीमपुर खीरी के मूड़ा बुजुर्ग सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की बदहाल स्थिति इन दावों की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े करती नजर आ रही है। स्वास्थ्य केंद्र की स्थिति को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि कागजों पर व्यवस्थाओं को दुरुस्त दिखाया जा रहा है, जबकि धरातल पर बदहाली का मंजर दिखाई दे रहा है।

कहावत है कि अंधेर नगरी, चौपट राजा, और मूड़ा बुजुर्ग सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की मौजूदा स्थिति इस कहावत को चरितार्थ करती दिखाई दे रही है। एक तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं, स्वच्छता और मरीजों को गुणवत्तापूर्ण इलाज उपलब्ध कराने का संकल्प दोहरा रही है, तो दूसरी तरफ स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की निगरानी में संचालित इस स्वास्थ्य केंद्र की हालत व्यवस्था की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगा रही है।

अस्पताल है या खंडहरनुमा भवन?

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का नाम सुनते ही लोगों के मन में साफ-सुथरे अस्पताल, बेहतर चिकित्सा सुविधाओं और व्यवस्थित परिसर की तस्वीर उभरती है। लेकिन मूड़ा बुजुर्ग स्वास्थ्य केंद्र की स्थिति को लेकर उठ रही शिकायतें इस उम्मीद के विपरीत नजर आती हैं। अस्पताल परिसर की चारों तरफ की स्थिति, साफ-सफाई और रखरखाव को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। सरकारी अस्पतालों का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को उनके नजदीक ही बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है, लेकिन जब स्वास्थ्य केंद्र की बुनियादी व्यवस्थाओं पर ही सवाल खड़े होने लगें तो आम जनता की परेशानी बढ़ना स्वाभाविक है।

करोड़ों का बजट, फिर भी बदहाली क्यों?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर सरकार द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले बजट और संसाधनों का उपयोग आखिर किस तरह किया जा रहा है? यदि अस्पताल परिसर की साफ-सफाई, भवन के रखरखाव और मरीजों की सुविधाओं पर पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है, तो फिर बदहाली की शिकायतें क्यों सामने आ रही हैं? क्या संबंधित अधिकारियों द्वारा समय-समय पर अस्पताल का निरीक्षण किया जाता है? यदि निरीक्षण होता है तो व्यवस्थाओं में सुधार क्यों नहीं दिखाई दे रहा है?

इन सवालों का जवाब स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों को देना चाहिए। हालांकि बजट के वास्तविक आवंटन और खर्च का विवरण सामने आए बिना करोड़ों रुपये के दुरुपयोग का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। ऐसे में अस्पताल को मिलने वाले बजट, खर्च के विवरण और कराए गए कार्यों की निष्पक्ष जांच जरूरी है।

ग्रामीणों को बेहतर इलाज की उम्मीद, लेकिन व्यवस्थाओं पर सवाल

ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले गरीब और जरूरतमंद परिवार सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर ही निर्भर रहते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए निजी अस्पतालों में इलाज कराना आसान नहीं होता। ऐसे में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। यदि अस्पताल परिसर की साफ-सफाई और रखरखाव की स्थिति संतोषजनक नहीं है, तो इसका सीधा असर मरीजों और उनके तीमारदारों के अनुभव पर पड़ता है।

स्वास्थ्य केंद्र में आने वाले मरीजों को बेहतर वातावरण, स्वच्छ परिसर और आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं मिलना उनका अधिकार है। सरकारी अस्पताल केवल भवन का नाम नहीं, बल्कि आम जनता की उम्मीदों और भरोसे का केंद्र होते हैं।

जिम्मेदार अधिकारियों की निगरानी पर उठे सवाल

अब सवाल स्वास्थ्य विभाग के उन अधिकारियों से है जिनके ऊपर अस्पताल की व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखने और समय-समय पर निरीक्षण करने की जिम्मेदारी है। क्या अधिकारियों को स्वास्थ्य केंद्र की वास्तविक स्थिति की जानकारी है? क्या कभी मौके पर पहुंचकर व्यवस्थाओं का जायजा लिया गया? यदि कमियां हैं तो उन्हें दूर करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं?

जांच और कार्रवाई की उठ रही मांग

मूड़ा बुजुर्ग सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्थाओं को लेकर उठ रहे सवालों के बीच अब जरूरत है कि स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारी स्वयं मौके पर पहुंचकर निरीक्षण करें। अस्पताल परिसर की साफ-सफाई, भवन की स्थिति, चिकित्सा उपकरणों, दवाओं की उपलब्धता, कर्मचारियों की उपस्थिति और बजट से कराए गए कार्यों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि जांच में किसी प्रकार की लापरवाही या अनियमितता सामने आती है तो संबंधित जिम्मेदारों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

अब देखना यह होगा कि स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारी इस बदहाल व्यवस्था का संज्ञान लेकर सुधार की पहल करते हैं या फिर मूड़ा बुजुर्ग सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की समस्याएं कागजी दावों के बीच ही दबकर रह जाएंगी। आखिर ग्रामीणों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं कब मिलेंगी और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही कब तय होगी?

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