निघासन में पोस्टमार्टम हाउस बना सफेद हाथी! लाखों की लागत से बनी व्यवस्था पर उठे सवाल, आखिर जनता को कब मिलेगा लाभ?

अब तक न्याय | नीरज कुमार कश्यप

सरकारी व्यवस्था पर बड़ा सवाल, पोस्टमार्टम के लिए आज भी परेशानियों का सामना करने को मजबूर स्थानीय लोग!

लखीमपुर खीरी | निघासन।

जनपद लखीमपुर खीरी की तहसील निघासन में पोस्टमार्टम हाउस को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है। स्थानीय स्तर पर पोस्टमार्टम की सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनाई गई व्यवस्था आखिर आम जनता के कितने काम आ रही है? क्षेत्र में इस सुविधा के संचालन और उपयोगिता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। लोगों के मन में यह सवाल है कि जब क्षेत्र में पोस्टमार्टम हाउस की व्यवस्था मौजूद है, तो फिर पोस्टमार्टम से जुड़ी जरूरतों के लिए लोगों को परेशानियों का सामना क्यों करना पड़ रहा है?

स्थानीय लोगों के लिए किसी परिजन की मौत के बाद पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पहले से ही बेहद कठिन और संवेदनशील समय होता है। ऐसे में यदि संबंधित सुविधा का लाभ समय पर न मिल पाए या लोगों को दूसरे स्थानों पर जाने की आवश्यकता पड़े, तो परिवारों की परेशानी और बढ़ जाती है। इसी को लेकर निघासन क्षेत्र में पोस्टमार्टम हाउस की उपयोगिता और संचालन व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं।

लाखों की लागत से बनी व्यवस्था, फिर भी सवाल बरकरार!

सरकारी योजनाओं का उद्देश्य जनता को स्थानीय स्तर पर बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना और लोगों की समस्याओं को कम करना होता है। पोस्टमार्टम हाउस जैसी आवश्यक व्यवस्था भी इसी उद्देश्य से महत्वपूर्ण मानी जाती है। लेकिन यदि किसी सुविधा का लाभ लोगों को जरूरत के समय नहीं मिल पाता, तो उसके निर्माण, संचालन और रखरखाव को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

निघासन में पोस्टमार्टम हाउस को लेकर भी अब यही सवाल सामने आ रहा है कि क्या यहां आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध हैं? क्या पोस्टमार्टम की प्रक्रिया नियमित रूप से संचालित हो रही है? यदि सुविधा पूरी तरह से काम नहीं कर रही है, तो इसके पीछे क्या कारण हैं? क्या आवश्यक संसाधनों, कर्मचारियों या अन्य व्यवस्थाओं की कमी है? इन सवालों का जवाब संबंधित विभाग और जिम्मेदार अधिकारियों को स्पष्ट करना चाहिए।

जरूरत के समय आखिर कहां जाएं लोग?

किसी भी क्षेत्र में स्वास्थ्य और प्रशासन से जुड़ी सुविधाओं की असली उपयोगिता तभी साबित होती है, जब जरूरत पड़ने पर आम नागरिकों को उनका लाभ मिले। पोस्टमार्टम की प्रक्रिया में देरी या स्थानीय स्तर पर सुविधा उपलब्ध न होने की स्थिति में मृतक के परिजनों को मानसिक परेशानी के साथ-साथ समय और संसाधनों की समस्या का भी सामना करना पड़ सकता है।

ऐसे में निघासन क्षेत्र के लोगों की अपेक्षा है कि पोस्टमार्टम हाउस की वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जाए। यदि भवन तैयार होने के बावजूद आवश्यक व्यवस्थाएं उपलब्ध नहीं हैं, तो संबंधित विभाग को कमियों को दूर करने की दिशा में कदम उठाने चाहिए। वहीं, यदि पोस्टमार्टम हाउस संचालित है, लेकिन लोगों को जानकारी या सुविधा मिलने में परेशानी हो रही है, तो व्यवस्था को अधिक प्रभावी और सुलभ बनाने की जरूरत है।

जिम्मेदार विभाग की भूमिका पर उठे सवाल

पोस्टमार्टम हाउस के संचालन के लिए आवश्यक संसाधनों, कर्मचारियों और अन्य व्यवस्थाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है। ऐसे में प्रशासन को इस बात की जांच करनी चाहिए कि निघासन स्थित पोस्टमार्टम हाउस की मौजूदा स्थिति क्या है और इसका लाभ स्थानीय लोगों को किस हद तक मिल रहा है।

यदि भवन का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के अनुसार नहीं हो पा रहा है, तो इसके कारणों की जांच कर आवश्यक कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही, स्थानीय लोगों को यह भी बताया जाना चाहिए कि पोस्टमार्टम की सुविधा कहां और किस प्रक्रिया के तहत उपलब्ध है, ताकि किसी आपात स्थिति में परिवारों को अनावश्यक भटकना न पड़े।

जनता के सवालों का जवाब कौन देगा?

निघासन के पोस्टमार्टम हाउस को लेकर अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस व्यवस्था का पूरा लाभ स्थानीय लोगों को कब मिलेगा? क्या जिम्मेदार अधिकारी मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति का निरीक्षण करेंगे? क्या आवश्यक सुविधाओं की कमी को दूर किया जाएगा? और क्या आम जनता को पोस्टमार्टम के लिए होने वाली परेशानियों से राहत मिल सकेगी?

इन सवालों पर संबंधित अधिकारियों का पक्ष और पोस्टमार्टम हाउस की वर्तमान स्थिति सामने आना बेहद जरूरी है। फिलहाल, स्थानीय स्तर पर उठ रहे सवालों के बीच प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार विभाग इस मामले को गंभीरता से लेते हुए निघासन के पोस्टमार्टम हाउस की व्यवस्था को दुरुस्त करता है या फिर जनता के सवाल यूं ही अनुत्तरित बने रहते हैं।

बड़ा सवाल: लाखों की लागत से बनी व्यवस्था का लाभ जनता को कब मिलेगा? पोस्टमार्टम हाउस की वास्तविक स्थिति क्या है? और जिम्मेदार अधिकारी इस दिशा में क्या कदम उठाएंगे?

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