बांदा। सरकारी योजनाओं की फाइलों में गरीबों के पक्के घरों की तस्वीर भले चमकती हो, लेकिन पपरेंदा गांव में शनिवार की रात एक कच्ची दीवार ने उस चमक के पीछे छिपी हकीकत उजागर कर दी। लगातार बारिश के बीच करीब 1:30 बजे जर्जर कच्चा मकान भरभराकर ढह गया और मलबे में दबकर घर में सो रहे 70 वर्षीय चुन्नी वर्मा पुत्र स्व. सुखारी वर्मा की मौत हो गई।मकान के कमजोर होने की बात पहले से बताई जा रही थी, लेकिन बारिश ने आखिरकार उसकी आखिरी सांस भी छीन ली। परिजनों और ग्रामीणों ने मलबा हटाकर वृद्ध को बाहर निकाला, मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। एक परिवार का सहारा मलबे में दब गया और पीछे छूट गया सवाल—क्या गरीब की जिंदगी सुरक्षित करने वाली सरकारी योजनाएं कागजों से निकलकर उसकी जर्जर छत तक पहुंची थीं?
परिजनों के मुताबिक चुन्नी वर्मा मजदूरी करते थे। पत्नी की पहले ही मौत हो चुकी है। छह बेटे भी मजदूरी कर परिवार चलाते हैं और उनके नाम करीब एक बीघा जमीन बताई गई है। आर्थिक तंगी के बीच जर्जर मकान में गुजर रही जिंदगी आखिरकार बारिश की मार नहीं सह सकी।सरकार गरीबों को पक्का आवास देने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण जैसी योजनाएं चला रही है। ऐसे में इस हादसे ने स्थानीय स्तर पर पात्रता के सर्वे, आवास आवंटन और जरूरतमंद परिवारों की पहचान की व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर दिया है। यदि परिवार पात्र था तो उसे सुरक्षित छत क्यों नहीं मिली और यदि पात्र नहीं था तो क्यों? इन सवालों का जवाब जांच से ही सामने आएगा।अब प्रशासन के सामने सिर्फ मलबा हटाने की चुनौती नहीं है, बल्कि यह देखने की जिम्मेदारी भी है कि परिवार को नियमानुसार आपदा राहत और अहेतुक सहायता मिले तथा बारिश में ऐसे अन्य जर्जर मकानों की पहचान समय रहते हो। फिलहाल परिजनों ने थाने में कोई तहरीर नहीं दी है। गांव में मातम है और उस ढही हुई छत के नीचे एक सवाल अब भी दबा है—गरीब के सिर पर पक्की छत का सरकारी वादा आखिर जमीन पर कब उतरेगा?

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