थाना मनकापुर पुलिस द्वारा जिला बदर अभियुक्त को किया गया गिरफ्तार-
प्रेमनाथ शुक्ला गोंडा अब तक न्याय
आमोद कुमार
आमोद कुमार
बांदा। सरकारी व्यवस्थाओं की हकीकत अक्सर फाइलों में नहीं, जमीनी हालात में दिखाई देती है। शनिवार सुबह लगभग 11:10 बजे राजकीय पशु चिकित्सालय पलरा में जो दृश्य सामने आया, उसने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। अस्पताल का दरवाजा खुला था, लेकिन न डॉक्टर मौजूद थे और न ही कोई कर्मचारी। यानी भवन मौजूद था, व्यवस्था गायब थी।
पशुपालकों के लिए यह अस्पताल कोई औपचारिक संस्था नहीं, बल्कि उनके पशुधन और आजीविका की सुरक्षा का केंद्र है। ऐसे में कार्य समय के दौरान अस्पताल का खाली मिलना केवल लापरवाही नहीं, बल्कि ग्रामीणों के विश्वास के साथ खिलवाड़ भी माना जा सकता है।सबसे चिंताजनक बात यह है कि अस्पताल परिसर में कहीं भी ऐसी कोई सूचना नहीं मिली, जिससे यह पता चल सके कि चिकित्सक या कर्मचारी किसी सरकारी कार्य से बाहर गए हैं। यदि वे फील्ड ड्यूटी पर थे तो सूचना बोर्ड पर इसका उल्लेख होना चाहिए था। और यदि नहीं थे, तो फिर सवाल और भी गंभीर हो जाता है।आखिर सरकारी अस्पतालों का उद्देश्य क्या केवल भवन खोलकर रखना रह गया है? क्या जिम्मेदार अधिकारियों को यह एहसास है कि किसी बीमार पशु के लिए कुछ मिनटों की देरी भी जानलेवा साबित हो सकती है? जब अस्पताल में इलाज देने वाला ही मौजूद न हो, तो पशुपालक किसके पास जाए?
यह मामला केवल एक अस्पताल तक सीमित नहीं है, बल्कि उस सोच को उजागर करता है जिसमें जवाबदेही धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। यदि कर्मचारी सरकारी कार्य पर थे तो इसकी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? और यदि बिना किसी वैध कारण के अनुपस्थित थे तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
पलरा पशु चिकित्सालय की यह तस्वीर कई सवाल छोड़ जाती है—क्या सरकारी अस्पताल केवल ताले और दीवारों के भरोसे चलेंगे? क्या ग्रामीणों और पशुपालकों की समस्याएं अधिकारियों तक तभी पहुंचेंगी जब कोई बड़ी घटना हो जाएगी? और सबसे बड़ा सवाल, जब अस्पताल में डॉक्टर ही नहीं मिलेंगे तो फिर सरकार की पशु स्वास्थ्य सेवाएं आखिर किसके भरोसे हैं?
अब जवाब विभाग को देना है, क्योंकि सवाल केवल कर्मचारियों की अनुपस्थिति का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की जवाबदेही का है।
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प्रेमनाथ शुक्ला गोंडा अब तक न्याय
रिपोर्ट सुधीर वर्मा अब तक न्याय
जौनपुर
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