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क्या है आस्था?
क्या है आस्था?
धर्म को आस्था के कठिन मार्ग से गुजरना पड़ता है। जितनी गहरी आस्था उतनी अधिक धर्म में संलिप्तता। आस्थावान होने का पैमाना है तर्क को खूंटी पर टांग देना। तर्क ही क्यों विवेक, ज्ञान, बुद्धि यहां तक कि शिक्षित होने की योग्यता को भी लॉकर के हवाले कर एक अनपढ़, गंवार, बुद्धिहीन, लंपट, धूर्त के अंगुलियों के इशारे पर ख़ुद को नाचने के लिए प्रस्तुत करना। अर्थ हासिल करने लिए शिक्षा ग्रहण किया, नौकरी हासिल की, धन कमाया और उसी धन को एक मूर्ख व्यक्ति के चरणों में आर्शीवाद की लालसा में अर्पित करना किस उद्भट ज्ञान का परिचायक है?
जब किसी लंपट के आर्शीवाद से ही घर, मन मस्तिष्क व परिवार में शांति स्थापित की जा सकती थी तब जीवन के 15-20 वर्ष शिक्षा ग्रहण करने में स्वास्थ्य को तकलीफ़ देकर तर्पण क्यों किया गया? नाहक ही बचपन को दहकती अग्नि, जवानी को ज्वाला में तपाने का निरर्थक प्रयोजन सिर्फ़ इसलिए किया गया कि अच्छी शिक्षा ग्रहण की जाए ताकि नौकरी मिल सके। बचपन के अलबेलेपन और किशोरावस्था के अल्हड़पन को जीना चाहिए था। जब नौकरी, स्वास्थ्य, उन्नति किसी मंदबुद्धि के आर्शीवाद से हासिल और सुरक्षित रखा जा सकता है तब शरीर को दैहिक, दैनिक और मानसिक संत्रास में झोंकने की नासमझी भरा क़दम उठाकर अपनी खुशियों को तार तार करने के मायने क्या थे?
अभावों में ज़िंदगी घसीटने वाले मां बाप को पढ़ाई की फ़ीस का भारी भरकम बोझ उठाने के लिए मजबूर करने का औचित्य क्या था? नास्तिक लोग कार्ल मार्क्स के एक वाक्य को लेकर उड़ते हैं कि धर्म आवाम के लिए अफ़ीम है। मगर मार्क्स इससे आगे बढ़ते हैं और लिखते हैं कि धर्म आत्महीन दुनियां में आत्मा की पुकार है। धर्म भ्रमात्मक सुख देता है जबकि मनुष्य को वास्तविक सुख चाहिए जो सामाजिक परिवर्तन से आता है। धर्म जड़ दृष्टि देता है, भाग्यवादी और अकर्मण्य बनाता है। धर्म मूल अच्छे तत्त्व छोड़कर कर्मकांड का रूप ले लेता है। जनता को शोषण के लिए तैयार करता है। शोषक के हाथ में धर्म एक अचूक हथियार है।
वास्तविक धर्म क्या है? अपने पुत्र, भाई, और पिता होने का फ़र्ज़ निभाया। सबसे बड़ा है दायित्व है देश के प्रति। नागरिकों के भ्रातृत्व भाव अक्षुण्ण रखने के उत्तरदायित्व के प्रति समर्पण का भाव। पाखण्ड प्रदर्शन से किस उत्तरदायित्व के प्रति वफादार रहा जा सकता है? धर्म आत्ममुग्धता प्रेरित करता है। दम्भ का संचार करता है। किसी को श्रेष्ठ तो किसी को नीच होने का प्रेरक है धर्म। अकर्मण्य भावनाएं बलवती होती है। कर्मयोगी को निकृष्ट और हठयोगी को उच्च स्थान देता है।
पुरातन की सड़ी गली व्यवस्था पर इतराते लोगों से उतना कोफ्त नही है जितनी समाजवादी लोगों से असहमति है। समाजवादी आन्दोलन की आधारशिला ही धर्महीन विचार की नींव पर खड़ी है फिर भी इन समाजवादियों का धर्मोत्थान प्रलाप समझ से परे है। क्या किसी समाजवादी मनीषी के पास इसका कोई जवाब है? धर्म एक बड़ी शक्ति के रूप में स्थापित हो चुका है स्वीकारने में ऐतराज नही है परन्तु सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा भी बलवती है। भारत में गतिशील चिंतकों से इस दिशा में प्रयास करने की अपेक्षा क्या अवांछनीय है?
छात्रों युवकों को क्रान्ति की, सामाजिक परिवर्तन की शक्ति मानना कहीं से भी अनुचित नही है। हां यह भी सच है कि यदि छात्रों, युवकों में विचार हो, दिशा हो, संगठन हो, और हो उनमें सकारात्मक ऊर्जा हो तो छात्र क्रान्ति कर सकते हैं।बशर्ते वे अपने से ऊपर की पीढ़ी की बुराइयों को समझें उसके ध्वजावाहक न बने। हम छात्रों, युवकों के सिर्फ़ आक्रोश को सार्थक नही मनाते। सदी के छठे दशक में एक चिंतक हुए हर्बर्ट मार्क्यूस जो काफ़ी प्रचलित थे। छात्रों युवकों यानि स्टूडेंट पॉवर में विश्वास करते थे। वह भी निरा आक्रोश को आत्म क्षय का प्रतिबिम्ब मानते थे, हम भी ख़ुद को उनसे सम्बद्ध करते हुए स्वीकारते हैं कि अकेले छात्र क्रान्ति नही कर सकते। उन्हें अपने अध्ययन से प्राप्त ज्ञान व विवेक का उपयोग समाज के दूसरे वर्गों को शिक्षित कर चेतनाशील बनाकर आन्दोलन में शरीक होने के लिए उन्हें प्रेरित करना चाहिए।
आस्था वह है जो देश में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, न्याय की आधारशिला रख सके। धर्म, आस्था, उपासना, विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधक के बरक्स साधक बन मृदुल भूमि उपलब्ध कराएं। वह नही कि मादक द्रव्यों का सेवन कर, कान फाड़ू आवाज़ में मदहोश हो दूसरों की तकलीफों का कारण बने। वह आस्था के प्रतीक तो बिल्कुल नही हो सकते जो पुरुष होने के बावजूद श्रृंगार कर राधा बन घूमे और दावा करते फिरे कि राम रात्रि में उनके संग होते हैं। यदि आप तार्किक हैं तब प्रश्न कर सकते हैं कि राम एक राजा थे उनके लिए सुन्दर कन्याओं का कहां अकाल पड़ा है कोई भी दूसरा राजा अपनी पुत्र उनके संग ब्याहने को लालायित होगा फिर वह तुम्हारे पास क्यों आयेंगे?
गौतम राणे सागर
राष्ट्रीय संयोजक,
संविधान संरक्षण मंच।
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