बीजेपी एक कुटिल पार्टी


बीजेपी एक कुटिल पार्टी
बीजेपी भले ही एक सांप्रदायिक, बुरी व भ्रष्टतम पार्टी के रूप में दुनियां में पहचानी जाती हो लेकिन कुटिलता व सत्ता की भूख कैसे पूरी की जा सकती है इस रण कौशल में इसके मुक़ाबले अन्य भारतीय दल दूर दूर तक नही टिकते। अपने हर निर्णय से चौंकाने में इसे महारत हासिल है। जो फडणवीस उद्धव ठाकरे को ढाई साल के लिए सत्ता की बागडोर सौंपने को कतई तैयार नही था वही अब एकनाथ शिंदे का नायब बनने को सहर्ष तैयार हो गया। यह भी तय है कि सियासी दुनियां को भौचक्का करने वाला यह निर्णय उसका ख़ुद का नही है। इसके बावजूद इस समर्पण को निरर्थक नही कहा जा सकता है। चीता शिकार पर हमला करने से पहले पीछे झुककर बैठ जाता है।
शरद पवार की सलाह पर जब उद्धव ठाकरे त्याग पत्र देकर मुख्य मंत्री की कुर्सी को एकनाथ शिंदे को सौंपने को तैयार हो गए थे, तभी भाजपा के रणनीति कारों ने तय कर लिया था कि इस शख्स को मुख्यमंत्री की कुर्सी की कीमत पर ही रोका जा सकता है। ईडी, सीबीआई अपना काम करती ही लेकिन सिर्फ़ इस भय से एनसीपी, कांग्रेस, शिवसेना के बनते सहज गठजोड़ से मुक़ाबला करना 2024 के लोकसभा के चुनाव में आसान नही होता। चाणक्य नीति यही कहती है युद्ध जीतने के लिए दुश्मन की ताक़त कम कर दें और अपनी ताकत बढ़ा लें। अपुष्ट खबरों को आधार माने तभी ठीक इस प्रस्ताव के बाद ही एकनाथ को मुख्यमंत्री बनाने की पटकथा सूरत में लिखी जा चुकी थी। उद्धव ठाकरे का इस्तीफा देने और एकनाथ को नेता स्वीकार करने का प्रस्ताव बागियों में हलचल पैदा कर था। मुख्यमंत्री के कुर्सी की लालच और तोता (सीबीआई) मैना (ईडी) से मुक्ति का यह सबसे उचित और सहज मार्ग था। बागियों को भा गया।
2024 लोकसभा के चुनावी शतरंज के चौसर पर बिछे शह और मात के खेल में एक दूसरे को पटखनी देने की जब कवायद चल रही हो तब विश्वनाथ आनन्द से सीखे गए दांव पेंच को आजमाना ही चाहिए। क्यों नही इतने दिनों से शतरंज के खेल को यूं ही तो महिमा मंडित नही किया जा रहा था। जिनकी धमनियों में लहू के बरक्स व्यवसाय बहता हो वह क्यों बिना वजह के किसी के उन्नायक बनने का जोख़िम उठाएंगे? लोगों का मत हो सकता है कि एनसीपी, कांग्रेस, लोकसभा चुनाव में स्वाभाविक दोस्त हो सकते हैं परन्तु शिवसेना के लिए यह क़दम संभव नही हो सकता। इस मनोभाव के लोग शायद राजनीति के शैशव काल में हैं। कहां कब भारतीय राजनीति के इतिहास में आम जन मानस ने मुद्दों पर अपने पसंदीदा नेता को घेरा है? जिसे इन्होंने एक बार नेता मान लिया फिर उसके हर निर्णय के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़े हैं। इतना ही क्यों उनका वश चले तो वह अपने दोनों कंधों को मिलाकर पसंदीदा नेता के भहराते छप्पर को रोकने हेतु थुन्ह के रूप में इस्तेमाल करने को तैयार हो जायेंगे।
विमर्श को घर वापस लाना आवश्यक है। 2019में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 25, शिवसेना ने 23 सीटों पर चुनाव चुनाव लड़ा, क्रमशः भाजपा 23 और शिवसेना ने 18 सीटों पर जीत हासिल किया। एनडीए से शिवसेना का अलग होना भविष्य में एनसीपी कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ने की बनती सम्भावना 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा की कब्र खोदने के लिए पर्याप्त होता। आख़िर भाजपा के रणनीति कार इतने अबोध तो हैं नही कि वह शुतुरमुर्ग की तरह तूफ़ान आने पर रेत में सिर झुका कर बैठ जाने का इन्तजार करते। वह दम रखते हैं तूफ़ान की दिशा बदलने का। चुप होकर बैठना उनका चरित्र कभी रहा ही नही। जो सच के लिए लड़ते हैं वह ढीले होकर उचित समय आने का इन्तजार करते हैं परन्तु फितरत के सिपहसालार हमेशा नए नए प्रयोग को उपलब्ध रहते हैं और अपनी छद्म चालों से हमेशा कामयाबी की तलाश में लीन भी।
वह हर क्षण धूल की रस्सी बनाने और रस्सी को सांप बनाने के कार्य में लिप्त रहते हैं। RSS (rumours super spreader) के पास इससे इतर कोई कार्य ही नही है। भांप लिया खतरे की घंटी को शिवसेना का मुक़ाबला भाजपा नही शिवसेना ही कर सकती है। ईडी के ज़रिए एंट्री ली, सौदा किया और बना लिया एकनाथ। हो गया खेला। किसी ने सोचा भी नही होगा कि फडणवीस उप मुख्यमंत्री बनेगा और एकनाथ होगा महाराष्ट्र का नया मुख्यमंत्री। बकायदा प्रयोगशाला में परीक्षण किया गया कि भाजपा का मुख्यमंत्री बनाने में फ़ायदा होने के बरक्स नुकसान होने की सम्भावना अधिक है। यह धोबिया पछाड़ शायद उद्धव को उधेड़ने में सफ़ल हो जाए और एकनाथ मधु कोड़ा की राह पकड़ लें।
इससे उलट देखने की कोशिश करते हैं। क्या बीजेपी की जगह कांग्रेस, सपा, बीएसपी या एनसीपी होती तो एकनाथ का चयन मुख्यमंत्री के लिए करती? जवाब होगा बिल्कुल नही। यह दल अपनी जूती पर नजरे गड़ा कर रखते हैं चाहे टीपी हवा में ही क्यों न उड़ जाए। हां हम इस यथार्थता से मुंह नही फेर सकते हैं कि बीजेपी उद्योपतियों की तरह योजना बनाती है। पहले मुफ्त सिम के साथ तीन महीने की कॉलिंग और डेटा भी फ़्री देगी। फिर ₹299 का पैक ₹ 599 में और अब ₹799 में बेचेगी।
महाराष्ट्र का प्रयोग कई और राज्यों में भी अपनाया जा सकता है। हेमन्त सोरेन ग्रह मंत्री से मिलकर फ़ोटो शेयर करते हुए कैप्शन में लिखेंगे, बाकी ख़बर ब्रेक के बाद। लेकिन बेचारे अशोक गहलोत के पास यह विकल्प तो उपलब्ध ही नही है कि वह देश के ग्रह मंत्री से मुलाकात कर फ़ोटो शेयर करें। हैरान, हताश वह बेचारे क्या करें। सचिन पायलट कब एकनाथ के मार्ग के अनुगामी हो जाएं कुछ कह पाना मुश्किल है। जब नैतिकता चरित्रहीनता पर उतारू हो तब कोई कब तक रखवाली करेगा!
आरे जंगल, नानार रिफाइनरी, इत्यादि प्रॉजेक्ट आखिर कब तक डीप फ्रीजर में पड़े पड़े बर्फ़ की सिल्ली बनते रहेंगे? 5 लाख करोड़ के प्रॉजेक्ट और पचासों हज़ार करोड़ के ड्रग्स के व्यवसाय जो सुशुप्ता अवस्था में चले गए हो उनके व्यवसायी यों ही चुप तो नही बैठेंगे। एनसीबी का वित्त मंत्रालय से गृह मंत्रालय में संयोजन का कुछ तो मक़सद होगा कि नही?
गौतम राणे सागर
राष्ट्रीय संयोजक,
संविधान संरक्षण मंच।

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