हममें से बहुतों के बचपन में कोई किताब रही होगी, जिसे बार-बार पढ़ते हुए उसका कवर तक निकल गया था. उसकी तस्वीरें और उसे पढ़ने की खुशी याद है, लेकिन वह हम तक कैसे पहुंची, यह शायद याद नहीं. माता-पिता ने किसी दूसरी ज़रूरत के पैसे बचाकर खरीदी होगी. किसी शिक्षक ने दी होगी. कोई मिलने आया होगा और छोड़ गया होगा. बच्चों तक किताबें पहुंचती हैं क्योंकि कोई उन्हें लेकर आता है.
पूर्वी अरुणाचल प्रदेश की लोहित घाटी में चालीस साल से अधिक समय तक यह काम एक व्यक्ति करते रहे. उनका नाम है सत्यनारायण मुंडयूर. बच्चों को उनका लंबा मलयालम नाम बोलने में कठिनाई होती थी. उन्होंने एक पत्रकार को कुछ संकोच से बताया कि इसलिए बच्चों को आसान नाम दे दिया. चार ज़िलों के हज़ारों बच्चों और अब बड़े हो चुके उनके पाठकों के लिए वह तभी से अंकल मूसा हैं.
उनका बचपन केरल में बीता, जहां गांव के पुस्तकालय जीवन का हिस्सा थे. बाद में मुंबई में आयकर निरीक्षक और प्रशिक्षक बने. सुरक्षित सरकारी नौकरी थी, लेकिन स्वामी विवेकानंद के शिक्षा संबंधी विचार उन्हें खींचते थे. बच्चे के भीतर मौजूद क्षमता को बाहर लाना ही शिक्षा है. 1979 में उन्होंने नौकरी छोड़ी और विवेकानंद केंद्र के एक स्कूल में काम करने अरुणाचल पहुंचे. उस जगह के बारे में वह बहुत कम जानते थे.
जब पुस्तकालय बनाने निकले…
लोहित घाटी के स्कूलों में बिजली नहीं थी. बच्चों के लिए वहां टिके रहने के आकर्षण भी कम थे. उन्हें लगा कि सीखने में खुशी मिलेगी, तभी बच्चे सीखते रहेंगे. उन्होंने छात्रावास में कहानियां पढ़कर सुनानी शुरू कीं. रॉबिन हुड जैसी परिचित कहानियां सुनाईं, लेकिन बच्चों को रुचि नहीं हुई. उन्होंने बच्चों को दोष नहीं दिया. समझा कि किताबों का चुनाव बदलना होगा. वह देशभर से कम दाम पर बच्चों की किताबें खरीदते, बक्सों में भरते और बसों, साझा जीपों तथा ट्रकों से खुद लेकर पहाड़ियों तक आते. अब बच्चे सुनने लगे. शिक्षक सोने से पहले पढ़कर सुनाते. उनका उद्देश्य था कि बच्चे खुश होकर सोएं.
घर से दूर, बिना बिजली वाले छात्रावास में बच्चा कहानी सुनकर सो रहा है. वह किताब उसके पास पहुंचने के लिए बक्से में हज़ारों किलोमीटर चली है. बच्चे को इस मेहनत का पता नहीं. उसे कहानी की खुशी मिलती है. करीब बीस साल उन्होंने शिक्षक और बाद में प्रशासन की ज़िम्मेदारी निभाई. छुट्टियों में बच्चों को किताबों के थैले देकर घर भेजते, ताकि गांवों में छोटे पुस्तकालय चलें. फिर सबके लिए खुले पुस्तकालय बनाने निकले. शुरुआत कठिन थी. किताबें थीं, रखने की जगह नहीं.
एसोसिएशन ऑफ राइटर्स एंड इलस्ट्रेटर्स फॉर चिल्ड्रन से लगभग नौ हज़ार किताबें भी मिलीं. कुछ साल प्रदर्शनियों और पढ़ने के अभियानों से काम चला. अधिकारी प्रशांत लोखंडे की मदद से 2007 में तेज़ू में पहला सामुदायिक पुस्तकालय खुला. बांबूसा पुस्तकालय में युवा स्वयंसेवक एटालो मेगा जुड़े. पुस्तकालय स्कूल के बाद खुलते, ताकि बच्चे वहां खुशी से आएं.
बच्चों को सीखने के बजाय परीक्षा पास करना सिखाया जाता
अंकल मूसा चाहते थे कि लोग खुद इस काम में भाग लें. जैसे मिलकर खेती करते और त्योहार मनाते हैं, वैसे पुस्तकालय भी चलाएं. हर पुस्तकालय स्थानीय समूह को सौंपा गया. न स्वयंसेवकों को वेतन मिलता है, न पूरा समय देने वाले अंकल मूसा को. धीरे-धीरे लोहित यूथ लाइब्रेरी नेटवर्क में तेरह पुस्तकालय जुड़े. तेज़ू, वाकरो, नामसाई, रोइंग और अंजॉ की पहाड़ियों तक लगभग दस हज़ार पाठकों को किताबें मिलने लगीं.
वह काम पूरा नहीं मानते. उन्हें चिंता है कि बच्चों को सीखने के बजाय परीक्षा पास करना सिखाया जाता है. कई बच्चे अंग्रेज़ी पढ़ना ठीक से नहीं सीख पाते. 2020 में पद्मश्री के लिए चुने जाने पर उन्होंने कहा कि अभी समाज के छोटे हिस्से तक पहुंचे हैं. वह उन आदिवासी लड़कियों का मार्गदर्शन भी करने लगे थे, जो अपने परिवार से पहली बार उच्च शिक्षा की ओर बढ़ रही थीं.
मिलने वाले उन्हें दुबला-पतला, चमकती आंखों वाला, स्नेह से भरा व्यक्ति बताते हैं. वह बच्चों की प्रशंसा करते हैं. कभी अच्छा पढ़ने पर किसी सहयोगी का भेजा छोटा चेक देते हैं. आज पुस्तकालय चलाने वाले कई युवा कभी उन्हीं छात्रावासों में उनसे कहानियां सुनते थे. उनका नियम वही है. पाठक किताबों तक नहीं पहुंच पाएं, तो किताबें पाठकों तक पहुंचनी चाहिए. हमारे बचपन में भी कोई हमारे लिए किताब लेकर आया था. क्या हमें उसका नाम याद है?
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