बारिश ने बढ़ाई बाढ़ की आशंका, प्रशासन को आयुक्त की दो टूक—“लापरवाही की गुंजाइश नहीं”
जनसुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता, संवेदनशील इलाकों पर पैनी नजर; व्यवस्थाएं दुरुस्त रखने के निर्देश। आमोद कुमार
कागजों की हरियाली पर डीएम की कैंची, पौधारोपण की जमीन पर होगी परीक्षा
तीन विभागों की खराब सत्यापन प्रगति पर स्पष्टीकरण। आमोद कुमार
बांदा। पर्यावरण संरक्षण अगर सिर्फ फाइलों में दर्ज आंकड़ों और सरकारी बैठकों की शोभा बनकर रह जाए तो धरती पर हरियाली नहीं, केवल कागज हरा होता है। इसी विरोधाभास पर जिलाधिकारी अमित आसेरी ने अब सीधी चोट की है। जिला पर्यावरण समिति एवं जिला गंगा समिति की बैठक में उन्होंने पौधारोपण की जमीनी हकीकत जांचने के साथ लापरवाही बरतने वाले विभागों को आईना दिखाया।
कलेक्ट्रेट सभागार में हुई बैठक में वर्ष 2026 के पौधारोपण अभियान की समीक्षा के दौरान ग्राम विकास, सहकारिता/उद्योग और नगर विकास विभाग की सत्यापन प्रगति खराब मिली। आंकड़ों की इस सुस्ती पर डीएम ने स्पष्टीकरण मांगते हुए काम में तेजी लाने के निर्देश दिए। साफ है कि पौधों की संख्या गिनाकर जिम्मेदारी से बचने का दौर अब आसान नहीं होगा।डीएम ने निर्देश दिया कि लगाए गए प्रत्येक पौधे की जियोटैगिंग, ट्री-गार्ड, सुरक्षा और सिंचाई व्यवस्था का स्थलीय सत्यापन किया जाए। अधिकारी यह भी देखें कि जिन स्थानों पर पौधे लगाए जाने का दावा किया गया है, वहां वास्तव में पौधे खड़े हैं या सिर्फ कागजों पर उनकी जड़ें मजबूत हैं। एक सप्ताह में सत्यापन रिपोर्ट मांगी गई है।
कूड़े के ढेर पर विकास की चमक फीकी
बैठक में ठोस, प्लास्टिक और जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन की स्थिति भी परखी गई। पीडब्ल्यूडी को जिले में कचरे की डंपिंग और प्रबंधन की विस्तृत रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए। बीडीओ से भी पूछा गया कि उनके क्षेत्रों में कचरा आखिर कहां डाला जा रहा है और क्या वे स्थान निर्धारित मानकों के अनुरूप हैं।क्योंकि शहरों और गांवों के बाहर खड़े कूड़े के पहाड़ विकास के उन दावों पर सबसे बड़ा सवाल हैं, जिन्हें अक्सर कागजों पर चमकाया जाता है।प्लास्टिक के खिलाफ सिर्फ अपील नहीं, अमल की जरूरत
सार्वजनिक स्थलों और बाजारों में पॉलिथीन के इस्तेमाल पर प्रभावी नियंत्रण के निर्देश दिए गए। मंडियों और बड़े बाजारों में दुकानदारों एवं वेंडरों को कपड़े तथा पर्यावरण अनुकूल बैग अपनाने के लिए प्रेरित करने के साथ इसका पालन भी सुनिश्चित करने को कहा गया।
सब्जी से लेकर रोजमर्रा की सामग्री तक प्लास्टिक में बांटकर प्रकृति के नाम पर भाषण देना उस दोहरे चरित्र को उजागर करता है, जिसमें सुविधा इंसान की और कीमत पर्यावरण की चुकानी पड़ती है।
नदियां सिर्फ नक्शे की लकीर नहीं
‘एक जिला, एक नदी’ थीम के तहत नदियों की स्वच्छता और संरक्षण कार्यों की समीक्षा की गई। यमुना किनारे चिन्हित 25 वेटलैंड्स के संरक्षण और प्रबंधन की जानकारी ली गई। गंगा आरती की व्यवस्थाओं पर भी चर्चा हुई।
नदियों को पूजने की परंपरा लंबी है, लेकिन उन्हें बचाने की जिम्मेदारी अक्सर छोटी पड़ जाती है। प्रशासन की असली परीक्षा इसी अंतर को खत्म करने में है।
खेती में मिट्टी बची तो भविष्य बचेगा
डीएम ने उपनिदेशक कृषि से प्राकृतिक एवं जैविक खेती के पिछले और वर्तमान वर्ष के क्षेत्रफल की तुलनात्मक रिपोर्ट मांगी। किसानों को प्राकृतिक और जैविक खेती से जोड़ने वाली योजनाओं तथा उनके प्रभाव की जानकारी भी मांगी गई।
उन्होंने सत्यापन की गति बढ़ाने और अधिक किसानों को इस पद्धति से जोड़ने के लिए प्रभावी कार्ययोजना तैयार करने को कहा।
अब आदेशों की स्याही नहीं, जमीन पर परिणाम चाहिए
जिलाधिकारी ने सभी विभागों को चेताया कि पर्यावरण, स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन जैसे विषयों पर लापरवाही किसी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी। बैठकों में लिए गए फैसले अगर फाइलों में ही दम तोड़ दें तो उनका कोई अर्थ नहीं। निर्देशों के अनुपालन में शिथिलता मिलने पर जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जाएगी।दरअसल, पर्यावरण की लड़ाई भाषणों से नहीं, जिम्मेदारी और जवाबदेही से जीती जाएगी। पौधारोपण की संख्या से ज्यादा जरूरी है कि पौधे जीवित रहें, कूड़ा उठाने से ज्यादा जरूरी है कि उसका वैज्ञानिक निस्तारण हो और नदी की आरती से ज्यादा जरूरी है कि नदी में गंदगी न पहुंचे। अब देखना यह है कि विभाग इस चेतावनी को भी एक और सरकारी कागज समझते हैं या धरती पर इसका असर दिखाई देता है।, एक सप्ताह में खुलेगी पौधारोपण की हकीकत; कचरा और प्लास्टिक पर भी प्रशासन का शिकंजा
बांदा। पर्यावरण संरक्षण अगर सिर्फ फाइलों में दर्ज आंकड़ों और सरकारी बैठकों की शोभा बनकर रह जाए तो धरती पर हरियाली नहीं, केवल कागज हरा होता है। इसी विरोधाभास पर जिलाधिकारी अमित आसेरी ने अब सीधी चोट की है। जिला पर्यावरण समिति एवं जिला गंगा समिति की बैठक में उन्होंने पौधारोपण की जमीनी हकीकत जांचने के साथ लापरवाही बरतने वाले विभागों को आईना दिखाया।
कलेक्ट्रेट सभागार में हुई बैठक में वर्ष 2026 के पौधारोपण अभियान की समीक्षा के दौरान ग्राम विकास, सहकारिता/उद्योग और नगर विकास विभाग की सत्यापन प्रगति खराब मिली। आंकड़ों की इस सुस्ती पर डीएम ने स्पष्टीकरण मांगते हुए काम में तेजी लाने के निर्देश दिए। साफ है कि पौधों की संख्या गिनाकर जिम्मेदारी से बचने का दौर अब आसान नहीं होगा।डीएम ने निर्देश दिया कि लगाए गए प्रत्येक पौधे की जियोटैगिंग, ट्री-गार्ड, सुरक्षा और सिंचाई व्यवस्था का स्थलीय सत्यापन किया जाए। अधिकारी यह भी देखें कि जिन स्थानों पर पौधे लगाए जाने का दावा किया गया है, वहां वास्तव में पौधे खड़े हैं या सिर्फ कागजों पर उनकी जड़ें मजबूत हैं। एक सप्ताह में सत्यापन रिपोर्ट मांगी गई है।
कूड़े के ढेर पर विकास की चमक फीकी
बैठक में ठोस, प्लास्टिक और जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन की स्थिति भी परखी गई। पीडब्ल्यूडी को जिले में कचरे की डंपिंग और प्रबंधन की विस्तृत रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए। बीडीओ से भी पूछा गया कि उनके क्षेत्रों में कचरा आखिर कहां डाला जा रहा है और क्या वे स्थान निर्धारित मानकों के अनुरूप हैं।क्योंकि शहरों और गांवों के बाहर खड़े कूड़े के पहाड़ विकास के उन दावों पर सबसे बड़ा सवाल हैं, जिन्हें अक्सर कागजों पर चमकाया जाता है।प्लास्टिक के खिलाफ सिर्फ अपील नहीं, अमल की जरूरत
सार्वजनिक स्थलों और बाजारों में पॉलिथीन के इस्तेमाल पर प्रभावी नियंत्रण के निर्देश दिए गए। मंडियों और बड़े बाजारों में दुकानदारों एवं वेंडरों को कपड़े तथा पर्यावरण अनुकूल बैग अपनाने के लिए प्रेरित करने के साथ इसका पालन भी सुनिश्चित करने को कहा गया।सब्जी से लेकर रोजमर्रा की सामग्री तक प्लास्टिक में बांटकर प्रकृति के नाम पर भाषण देना उस दोहरे चरित्र को उजागर करता है, जिसमें सुविधा इंसान की और कीमत पर्यावरण की चुकानी पड़ती है।नदियां सिर्फ नक्शे की लकीर नहीं
‘एक जिला, एक नदी’ थीम के तहत नदियों की स्वच्छता और संरक्षण कार्यों की समीक्षा की गई। यमुना किनारे चिन्हित 25 वेटलैंड्स के संरक्षण और प्रबंधन की जानकारी ली गई। गंगा आरती की व्यवस्थाओं पर भी चर्चा हुई।नदियों को पूजने की परंपरा लंबी है, लेकिन उन्हें बचाने की जिम्मेदारी अक्सर छोटी पड़ जाती है। प्रशासन की असली परीक्षा इसी अंतर को खत्म करने में है।खेती में मिट्टी बची तो भविष्य बचेगा डीएम ने उपनिदेशक कृषि से प्राकृतिक एवं जैविक खेती के पिछले और वर्तमान वर्ष के क्षेत्रफल की तुलनात्मक रिपोर्ट मांगी। किसानों को प्राकृतिक और जैविक खेती से जोड़ने वाली योजनाओं तथा उनके प्रभाव की जानकारी भी मांगी गई।
उन्होंने सत्यापन की गति बढ़ाने और अधिक किसानों को इस पद्धति से जोड़ने के लिए प्रभावी कार्ययोजना तैयार करने को कहा।
अब आदेशों की स्याही नहीं, जमीन पर परिणाम चाहिए
जिलाधिकारी ने सभी विभागों को चेताया कि पर्यावरण, स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन जैसे विषयों पर लापरवाही किसी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी। बैठकों में लिए गए फैसले अगर फाइलों में ही दम तोड़ दें तो उनका कोई अर्थ नहीं। निर्देशों के अनुपालन में शिथिलता मिलने पर जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जाएगी।दरअसल, पर्यावरण की लड़ाई भाषणों से नहीं, जिम्मेदारी और जवाबदेही से जीती जाएगी। पौधारोपण की संख्या से ज्यादा जरूरी है कि पौधे जीवित रहें, कूड़ा उठाने से ज्यादा जरूरी है कि उसका वैज्ञानिक निस्तारण हो और नदी की आरती से ज्यादा जरूरी है कि नदी में गंदगी न पहुंचे। अब देखना यह है कि विभाग इस चेतावनी को भी एक और सरकारी कागज समझते हैं या धरती पर इसका असर दिखाई देता है।
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जनसुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता, संवेदनशील इलाकों पर पैनी नजर; व्यवस्थाएं दुरुस्त रखने के निर्देश। आमोद कुमार
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