सोमवार दोपहर, शाहजहांपुर मेडिकल कॉलेज के ट्रॉमा सेंटर का यह दृश्य कई सवाल खड़े करता है।


 करीब 70 वर्षीय एक बुजुर्ग मरीज को बड़ी मुश्किल से गैलरी में बेड मिला, लेकिन वहां पंखा तक नहीं था। उनकी बुजुर्ग पत्नी खुद खड़े-खड़े हाथ वाले पंखे से उन्हें हवा करती रहीं। उम्र और थकान के बावजूद पति की सेवा में जुटी रहीं। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देने वाला है।

दूसरी ओर, मरीजों के तीमारदारों का कहना है कि अस्पताल में एक स्ट्रेचर तक के लिए पूरे परिसर में भटकना पड़ता है। स्ट्रेचर मिल जाए तो बेड नहीं, और बेड मिल जाए तो बुनियादी सुविधाओं का अभाव।

आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी मरीजों को ऐसी परिस्थितियों का सामना क्यों करना पड़ रहा है? जनप्रतिनिधियों और जिम्मेदार अधिकारियों को यह सब क्यों नहीं दिखाई देता?

स्वास्थ्य सेवाएं केवल इमारतों से नहीं, बल्कि मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं और मानवीय संवेदनाओं से बेहतर बनती हैं।

क्या इस व्यवस्था में सुधार की जरूरत नहीं है? अपनी राय जरूर दें।

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