बारा, प्रयागराज। यमुनानगर क्षेत्र के बारा तहसील अंतर्गत ग्राम सभा छतहरा के मौजा सोनौरी की पावन धरा इन दिनों भक्ति, श्रद्धा और दिव्यता के आलोक से आलोकित है। श्री राम कथा के दूसरे दिवस जब पूज्या शास्त्री शाकाम्भरी द्विवेदी ‘मानस मंजरी’ ने व्यासपीठ से वाणी प्रवाहित की, तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो स्वयं माँ सरस्वती उनके श्रीमुख में विराजमान हों। कथा का प्रारंभ भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य विवाह प्रसंग से हुआ। शास्त्री जी ने जैसे ही शिव- बारात का अलौकिक वर्णन किया, पंडाल में उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। “वक्रतुंड महाकाय” और “हर- हर महादेव” के जयघोष से सम्पूर्ण वातावरण गुंजायमान हो उठा। उन्होंने कहा— “अनिमंत्रितो न गच्छेत्” — बिना निमंत्रण किसी के द्वार नहीं जाना चाहिए, यही शिव-विवाह प्रसंग की शिक्षाप्रद प्रेरणा है। हिमाचल नगरी में शिव-बारात के आगमन का दृश्य जब शब्दों में साकार हुआ, तो श्रोताओं की आंखों के सामने मानो वह दिव्य लीला सजीव हो उठी। भूत-प्रेतों से सजी बारात और भोलेनाथ का विरक्त स्वरूप सुनकर श्रोता कभी हंसे, कभी भाव-विभोर हुए। इसके पश्चात शास्त्री जी ने प्रभु श्रीराम के अवतरण की मंगलमयी कथा सुनाई। “भये प्रकट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी” की पंक्तियों के साथ जैसे ही राम जन्म का प्रसंग आरंभ हुआ, पूरा पंडाल “जय श्रीराम” के उद्घोष से गूंज उठा। वातावरण में ऐसा आध्यात्मिक कंपन था मानो स्वयं अयोध्या नगरी का उत्सव सोनौरी में अवतरित हो गया हो।
शास्त्री शाकाम्भरी द्विवेदी जी ने कहा— “रामो विग्रहवान् धर्मः” — श्रीराम स्वयं धर्म के साकार स्वरूप हैं। उनका जीवन मर्यादा, त्याग, करुणा और सत्य का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने उपस्थित राम भक्तों को प्रेरित किया कि वे प्रभु के आदर्शों को आत्मसात कर अपने जीवन को धन्य बनाएं। कथा स्थल पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु उमड़े। महिलाओं की भक्ति-भरी आंखें, युवाओं का उत्साह और बुजुर्गों की श्रद्धा— सब मिलकर एक अलौकिक संगम का दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। पूरा पंडाल दीपमालाओं और पुष्प सज्जा से सुसज्जित था। इस पावन अवसर पर छैल बिहारी दास ‘मानस केसरी’, शिवबाबू प्रजापति, शिवम द्विवेदी, मिलन प्रजापति, महेंद्र बाबू, कृष्ण, अंजनी प्रजापति सहित भारी संख्या में श्रद्धालु भक्तजन उपस्थित रहे। दूसरे दिवस की कथा ने यह सिद्ध कर दिया कि जब वाणी में श्रद्धा, भाव में भक्ति और हृदय में राम का नाम हो, तब साधारण भूमि भी तीर्थ बन जाती है। सोनौरी की यह पावन धरा सचमुच इन दिनों “राममयम् जगत्” का साक्षात अनुभव करा रही है।
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