कली और नारी – 50 दोहे गुलाबी आभा है इस पर छाई, अति सुंदर यह अधखिली जाई। रात को यह रति बन जाती, सुगंध अपनी चहुं ओर फैलाती। अंततः मिट जाती है कली जाई, हो जैसे छवि हर नारी की भाई। जन्म लिया तो कोमल कली, ममता की मूरत, प्रेम भरी। संग ले आई लोरी मधुराई, घर आंगन में खुशबू छाई। बाल्य में भोल


कली और नारी – 50 दोहे

  1.  

गुलाबी आभा है इस पर छाई,
अति सुंदर यह अधखिली जाई।

  1.  

रात को यह रति बन जाती,
सुगंध अपनी चहुं ओर फैलाती।

  1.  

अंततः मिट जाती है कली जाई,
हो जैसे छवि हर नारी की भाई।

  1.  

जन्म लिया तो कोमल कली,
ममता की मूरत, प्रेम भरी।

  1.  

संग ले आई लोरी मधुराई,
घर आंगन में खुशबू छाई।

  1.  

बाल्य में भोली, हंसती खेली,
मां के आंचल में दुनिया झेली।

  1.  

यौवन आया, कली मुस्काई,
भोर की किरणों सी लाज समाई।

  1.  

सपनों में बुन ली नई कहानी,
मन के आंगन खिले जवानी।

  1.  

पिया मिलन को तरसती प्यारी,
छवि सी सजी सखी दुलारी।

  1.  

फूल बनी जब साजन डोले,
सखियों संग सब रीतें बोले।

  1.  

घर छोड़ा जब आंसू छलके,
संग चली सौगंधें पलके।

  1.  

ससुराल में भी सूरज जैसी,
प्यार से जगमग करती वैसी।

  1.  

सेवा, स्नेह, समर्पण प्यारा,
नारी करती घर उजियारा।

  1.  

पल में ममता, पल में लज्जा,
हर रूप में जग की सज्जा।

  1.  

बेटी बनी तो बगिया महकी,
बहन बनी तो रक्षा लेखी।

  1.  

पत्नी बनी तो घर की रानी,
मां बनी तो जग की वाणी।

  1.  

दर्द छिपाकर हंसी लुटाती,
हर विपदा को स्वयं हर जाती।

  1.  

कभी रानी लक्ष्मी का जोश,
कभी मीरा की प्रेमित ओस।

  1.  

कभी झांसी की तलवार धरे,
कभी अन्नपूर्णा अन्न भरे।

  1.  

कभी सावित्री सत्य की मूरत,
कभी सीता की त्याग सुरभित।

  1.  

हर रूप में शक्ति का सागर,
नारी बिना जग सूना डगर।

  1.  

कली सी कोमल, शीतल छाया,
कभी अग्नि बन, दुष्ट मिटाया।

  1.  

धरती जैसी सहनशीलता,
नभ सी उसकी गहराईता।

  1.  

नारी हंसी तो वसंत उतरता,
क्रोध करे तो काल भी डरता।

  1.  

ममता की गंगा उसमें बहती,
दया की धारा सदा कहती।

  1.  

नारी ही जीवन की रचना,
उससे ही होती सृष्टि सना।

  1.  

जिस घर में नारी का मान,
वहां बसते सच्चे भगवान।

  1.  

जो नारी का करे अपमान,
वह मिटता अपनी पहचान।

  1.  

नारी केवल रूप नहीं,
संस्कारों की धूप सही।

  1.  

कभी प्रेरणा, कभी करुणा,
कभी तपस्या, कभी यज्ञणा।

  1.  

कली की लाज, सुघर मुस्कान,
नारी में मिलता है जान।

  1.  

कली झरे तो फूल बने,
नारी दुखे तो कुल सने।

  1.  

जिसके त्याग से जग चलता,
उसका सम्मान न क्यों पलता?

  1.  

हर युग में उसकी गाथा रही,
सीमा पार भी व्यथा सही।

  1.  

भूले जग ने उसका बल,
फिर भी रखती स्नेह अचल।

  1.  

कली मुरझाए तो दुख होता,
नारी रोए तो मन रोता।

  1.  

कली की खुशबू क्षणभर की,
नारी की सूरत अमर धरती।

  1.  

कली टूटे तो माला टूटे,
नारी रूठे तो दुनिया रूठे।

  1.  

मां के चरणों में ईश्वर बसा,
उसका उपकार जग न तौला।

  1.  

नारी के बिना न गीत बने,
न ऋतु खिले, न मीत बने।

  1.  

कभी बेटी की हंसी सुहानी,
कभी मां की गोद पुरानी।

  1.  

कभी सखी बन साथ निभाए,
कभी गुरु बन राह दिखाए।

  1.  

कली की तरह सहे पतझर,
नारी भी झेले जीवन भर।

  1.  

फिर भी रखे विश्वास नया,
हर अंधकार में प्रकाश नया।

  1.  

कली सी सजी, सुगंध भरी,
नारी है सृष्टि की लड़ी।

  1.  

जहां नारी का मान बढ़ाया,
वहां ईश ने सुख बरसाया।

  1.  

नारी ही जीवन का सार,
उससे ही चलता संसार।

  1.  

कली झरे पर बीज रहे,
नारी मरे पर तेज रहे।

  1.  

उसके बिना जग सूना है,
नारी ही सृष्टि का ताज सुहाना है।

  1.  

नमन उसे जो जननी बनती,
कली से फूल, सृष्टि गढ़ती।

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