दलित कौन हैं और बहुजन कौन हैं – कांशीराम का दृष्टिकोण


 

दलित कौन हैं और बहुजन कौन हैं – कांशीराम का दृष्टिकोण
 

प्रस्तावना

भारतीय समाज की संरचना हजारों वर्षों से वर्ण और जाति व्यवस्था पर आधारित रही है। इस व्यवस्था ने समाज को ऊँच-नीच, श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ और शासक-शासित के वर्गों में बाँट दिया। एक ओर जहाँ कुछ वर्गों को जन्म से ही सम्मान, अधिकार और अवसर मिले, वहीं दूसरी ओर बहुसंख्यक वर्गों को गुलामी, तिरस्कार और अपमान का जीवन जीना पड़ा। यही वर्ग धीरे-धीरे “दलित” और “बहुजन” के रूप में पहचाने जाने लगे।

इन शब्दों को केवल समाजशास्त्रीय या राजनीतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि एक आंदोलनकारी चेतना के रूप में समझना चाहिए। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने दलितों को आत्म-सम्मान और अधिकार की लड़ाई के लिए संगठित किया। बाद में कांशीराम ने इस चेतना को व्यापक रूप देकर उसे “बहुजन आंदोलन” में परिवर्तित किया।

कांशीराम के अनुसार –

यह लेख इसी वैचारिक दृष्टिकोण का विस्तृत विश्लेषण है।

1. दलित शब्द की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

“दलित” शब्द संस्कृत की धातु “दल” से बना है, जिसका अर्थ होता है — टूटा हुआ, कुचला हुआ या दबाया गया।
प्राचीन भारतीय समाज में जब जाति व्यवस्था ने लोगों को वर्णों में बाँटा, तब जिन लोगों को “अवर्ण” कहा गया, वे इस व्यवस्था से पूरी तरह बाहर कर दिए गए। ये ही लोग आगे चलकर “अस्पृश्य” या “अछूत” कहलाए।

सदियों तक इन्हें शिक्षा, रोजगार, मंदिर, जल-स्रोत और सामाजिक जीवन के अधिकारों से वंचित रखा गया। यह केवल सामाजिक अन्याय नहीं था, बल्कि मानवता के विरुद्ध अपराध था।

19वीं शताब्दी में महात्मा ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, पेरियार और बाद में डॉ. अंबेडकर ने “दलित” शब्द को संघर्ष और आत्मसम्मान का प्रतीक बना दिया।

अंबेडकर ने कहा था —

2. दलितों की सामाजिक स्थिति

भारत में दलितों को सदियों तक एक विशेष सामाजिक श्रेणी में बंद कर दिया गया।

उन्हें मंदिरों में प्रवेश की अनुमति नहीं थी,

सार्वजनिक कुओं का पानी पीना अपराध था,

ऊँची जातियों के सामने खड़ा होना भी अपमान माना जाता था,

शिक्षा पर रोक थी,

और किसी भी प्रकार के सामाजिक-सांस्कृतिक नेतृत्व से वंचित रखा गया।

कांशीराम इस स्थिति को “ब्राह्मणवादी व्यवस्था की मानसिक गुलामी” कहते थे। उनके अनुसार, धर्मग्रंथों और परंपराओं का उपयोग दलितों को दबाए रखने के लिए किया गया।

3. डॉ. अंबेडकर की वैचारिक विरासत

कांशीराम के राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा डॉ. भीमराव अंबेडकर थे।
अंबेडकर ने कहा था —

कांशीराम ने इस नारे को अपने जीवन का मार्गदर्शक बनाया।
उन्होंने महसूस किया कि अंबेडकर ने दलितों को विचार दिया, लेकिन उस विचार को जन-शक्ति और संगठन में बदलना अब समय की मांग थी।

कांशीराम ने कहा —

4. कांशीराम की दृष्टि में “दलित”

कांशीराम के अनुसार,

उन्होंने दलित की परिभाषा को व्यापक किया। उनके अनुसार –

जो सामाजिक रूप से बहिष्कृत है,

जो आर्थिक रूप से शोषित है,

और जो राजनीतिक रूप से वंचित है,
वह सब “दलित” कहलाता है।

इस प्रकार कांशीराम ने दलित शब्द को केवल जातिगत सीमाओं से बाहर निकालकर संघर्षशील वर्गों का प्रतिनिधि शब्द बना दिया।

5. “बहुजन” शब्द की उत्पत्ति

“बहुजन” शब्द सबसे पहले बौद्ध धर्म में मिलता है।
बुद्ध ने कहा था — “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” — अर्थात बहुसंख्यकों के हित और सुख के लिए कार्य करना।

कांशीराम ने इसी शब्द को आधुनिक राजनीतिक अर्थ में पुनर्जीवित किया।
उनके अनुसार —

इस 85% में शामिल हैं –

अनुसूचित जातियाँ (दलित),

अनुसूचित जनजातियाँ (आदिवासी),

अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC),

अल्पसंख्यक,

गरीब किसान, मजदूर और महिलाएं।

6. दलित से बहुजन तक का सफर

कांशीराम ने महसूस किया कि यदि केवल दलित समुदाय संघर्ष करेगा, तो वह 15% सवर्णों की सत्ता नहीं बदल सकता।
इसलिए उन्होंने दलित आंदोलन को बहुजन आंदोलन का रूप दिया।

उन्होंने कहा —

यह परिवर्तन केवल शब्दों में नहीं था, बल्कि एक रणनीतिक दृष्टिकोण था।
उन्होंने कहा —

7. संगठन निर्माण: BAMCEF से BSP तक

कांशीराम ने बहुजन चेतना को संगठित करने के लिए तीन बड़े संगठन बनाए —

BAMCEF (Backward and Minority Communities Employees Federation) – 1978 में स्थापित, उद्देश्य था शिक्षित वर्ग को समाज सेवा की दिशा में प्रेरित करना।

DS-4 (Dalit Shoshit Samaj Sangharsh Samiti) – 1981 में स्थापित, उद्देश्य था सामाजिक जागरूकता और संगठन निर्माण।

BSP (Bahujan Samaj Party) – 1984 में गठित, उद्देश्य था राजनीतिक शक्ति हासिल करना।

उनका नारा था —

8. कांशीराम का राजनीतिक दर्शन

कांशीराम का मानना था कि राजनीति ही समाज परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम है।
वे कहा करते थे —

उन्होंने दलितों और बहुजनों को समझाया कि केवल आंदोलन या प्रदर्शन से मुक्ति नहीं मिलेगी, सत्ता में भागीदारी से ही स्थायी परिवर्तन आएगा।
उन्होंने कहा —

9. दलित और बहुजन: अंतर और एकता

बिंदुदलितबहुजन
परिभाषासामाजिक रूप से उत्पीड़ित वर्गसभी शोषित, वंचित और बहुसंख्यक वर्ग
संख्यालगभग 16%लगभग 85%
लक्ष्यआत्मसम्मान और समानतासत्ता और संसाधनों पर नियंत्रण
नेताडॉ. भीमराव अंबेडकरकांशीराम
दृष्टिकोणजाति से मुक्तिबहुजन एकता और सशक्तिकरण

कांशीराम ने कहा —

10. कांशीराम की रणनीति

कांशीराम ने बहुजन आंदोलन को तीन चरणों में विभाजित किया:

चेतना फैलाओ – लोगों को अपने अधिकारों और इतिहास से परिचित कराओ।

संगठन बनाओ – समाज को संगठित करो ताकि उसकी शक्ति बढ़े।

सत्ता हासिल करो – राजनीति के माध्यम से नीतिगत परिवर्तन करो।

उन्होंने कहा —

11. कांशीराम का नारा

उनका प्रसिद्ध नारा था —

यह नारा न केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रतीक है, बल्कि लोकतांत्रिक समानता का सिद्धांत भी है।
उन्होंने इसे भारत के सामाजिक ढांचे को चुनौती देने वाले नारे के रूप में प्रस्तुत किया।

12. बहुजन आंदोलन का उद्देश्य

कांशीराम का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं था। उनका असली लक्ष्य था —

सामाजिक न्याय की स्थापना,

आर्थिक समानता,

शिक्षा और रोजगार में प्रतिनिधित्व,

और जाति आधारित भेदभाव का अंत।

उन्होंने कहा —

13. महिलाएं और बहुजन आंदोलन

कांशीराम ने महिलाओं को आंदोलन की धुरी बनाया।
उन्होंने कहा —

इसी विचार से उन्होंने मायावती जैसी नेता को उभारा, जो आगे चलकर देश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनीं।
उनके लिए यह केवल राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि बहुजन चेतना की विजय थी।

14. आलोचनाएं और कांशीराम का उत्तर

कांशीराम पर यह आरोप लगाया गया कि वे जाति आधारित राजनीति करते हैं।
उन्होंने इसका जवाब देते हुए कहा —

उनके अनुसार, जाति को खत्म करने के लिए पहले जाति आधारित एकता बनाना जरूरी है ताकि शोषित वर्ग सत्ता तक पहुँच सके।

15. बहुजन और संविधान

कांशीराम ने बार-बार कहा —

उनका मानना था कि संविधान में निहित समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों को जमीन पर लागू करना ही बहुजन राजनीति का उद्देश्य है।

16. वर्तमान संदर्भ में कांशीराम की प्रासंगिकता

आज भी भारतीय समाज में असमानता, जातिगत भेदभाव, आर्थिक विषमता और राजनीतिक उपेक्षा मौजूद है।
ऐसे में कांशीराम की यह बात अत्यंत प्रासंगिक है —

उनकी विचारधारा आज भी सामाजिक न्याय की राजनीति का आधार है।

17. बहुजन एकता का संदेश

कांशीराम का अंतिम संदेश था —

उनका सपना था कि भारत में बहुजन समाज संविधान के मूल्यों पर आधारित एक समानता परक राष्ट्र बनाए।
उनके अनुसार, “दलित” संघर्ष की शुरुआत है और “बहुजन” उस संघर्ष की पराकाष्ठा।

निष्कर्ष

कांशीराम ने भारतीय राजनीति और समाज को नई दिशा दी।
उन्होंने “दलित” शब्द को दया और करुणा की नहीं, बल्कि गौरव और संघर्ष की पहचान बना दिया।
और “बहुजन” शब्द को सत्ता, संगठन और स्वाभिमान का प्रतीक।

उनके शब्दों में —

आज जब भारत में सामाजिक न्याय की बात होती है, तो कांशीराम के विचार हर मंच पर गूंजते हैं।
उनकी विचारधारा केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि बहुसंख्यक जनता की सामूहिक चेतना बन चुकी है।

संक्षेप में:

दलित: वह वर्ग जो शोषित, उत्पीड़ित और बहिष्कृत रहा।

बहुजन: वह विशाल समुदाय जो दलित, पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यक और गरीब वर्गों को मिलाकर बनता है।

कांशीराम का संदेश: “दलित बनो, फिर बहुजन बनो, और बहुजन बनकर सत्ता हासिल करो।”

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