बांदा। सरकारी योजनाओं के कागजों पर ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की तस्वीर भले ही चमकदार


दो हजार में गांव बदलने का जिम्मा, अब 20 हजार की मांग

समूह सखियों का कलेक्ट्रेट में प्रदर्शन, बोलीं—महंगाई बढ़ती गई, मानदेय वहीं का वहीं

बांदा। सरकारी योजनाओं के कागजों पर ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की तस्वीर भले ही चमकदार नजर आती हो, लेकिन उस तस्वीर को जमीन पर उतारने वाली समूह सखियों की जेब अब भी खाली है। गांव-गांव घूमकर स्वयं सहायता समूहों को मजबूत करने और महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने वाली समूह सखियों को इसके बदले महज दो हजार रुपये मासिक मानदेय मिल रहा है। महंगाई के दौर में यह रकम मेहनत की कीमत कम और व्यवस्था का व्यंग्य अधिक नजर आती है।

बुधवार को इसी पीड़ा को लेकर समूह सखियां कलेक्ट्रेट पहुंचीं और प्रदर्शन कर जिलाधिकारी को संबोधित ज्ञापन सौंपा। उनका कहना है कि राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के तहत उन्हें गांवों में लगातार काम करना पड़ता है। समूहों की बैठक से लेकर महिलाओं को रोजगार से जोड़ने और योजनाओं की जानकारी देने तक की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है, लेकिन मेहनत के बदले मिलने वाला मानदेय आज की जरूरतों के सामने बौना साबित हो रहा है।

समूह सखियों ने दो हजार से बढ़ाकर 20 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय करने की मांग की। उनका कहना है कि जब काम का दायरा बढ़ाया जा सकता है तो मेहनत की कीमत क्यों नहीं? यही नहीं, समय से मानदेय भुगतान, कार्य के लिए मोबाइल भत्ता और मानदेय सीधे व्यक्तिगत बैंक खातों में भेजने की मांग भी उठाई गई।

विडंबना यह है कि जिन महिलाओं के सहारे गांव की महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का सपना दिखाया जा रहा है, उन्हीं की आर्थिक मजबूरी पर व्यवस्था की नजर अब तक नहीं पड़ी है।

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Bhanu Pratap Dixit

अब तक टीवी न्यूज़ चैनल

भानु प्रताप दीक्षित अबतक टीवी के ऑफिस में कार्यरत हैं। उन्हें पत्रकारिता में 6 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे सीनियर को-एडिटर के पद पर अपनी जिम्मेदारियाँ निभा रहे हैं।

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