बांदा। गोवंश संरक्षण के नाम पर योजनाएं बनती हैं, बजट जारी होता है और कागजों पर व्यवस्थाएं भी मुकम्मल दिखाई देती हैं। लेकिन जब बारिश की बूंदों के बीच गोवंश कीचड़ में फंसा नजर आए और उसके लिए सूखी जमीन तक मयस्सर न हो तो सवाल सिर्फ अव्यवस्था का नहीं, व्यवस्था की नीयत और निगरानी का भी बन जाता है। तिंदवारी विकासखंड की ग्राम पंचायत पैलानी स्थित गौशाला को लेकर ग्रामीणों ने ऐसे ही गंभीर सवाल खड़े किए हैं।स्थानीय लोगों का आरोप है कि गौशाला में पर्याप्त चारा-पानी की व्यवस्था नहीं है और बारिश से बचाव के लिए भी इंतजाम नाकाफी हैं। लगातार बारिश के कारण परिसर में कीचड़ जमा होने से गोवंशों को परेशानी हो रही है। ग्रामीणों ने कुछ गोवंशों की मौत का दावा करते हुए आशंका जताई है कि भूख, बीमारी और देखरेख की कमी इसकी वजह हो सकती है। हालांकि मौत के वास्तविक कारणों की पुष्टि पशु चिकित्सा जांच के बाद ही हो सकेगी।कीचड़ में संरक्षण का दावा, शवों पर व्यवस्था मौन?
ग्रामीणों का आरोप है कि मृत गोवंशों के शव भी समय पर नहीं हटाए जाते। उनका कहना है कि कई बार शवों को कुत्तों द्वारा नोचने की स्थिति बनी, जिससे दुर्गंध और गंदगी फैलती है। बस्ती के बीच स्थित गौशाला होने के कारण ग्रामीणों के मुताबिक यह समस्या केवल गौशाला तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आसपास के लोगों के लिए भी परेशानी का कारण बनती है।यहां सवाल सीधा है—जिस व्यवस्था का उद्देश्य बेसहारा गोवंश को आश्रय देना है, क्या वह बारिश में उसके लिए सूखी जमीन, पर्याप्त चारा और सुरक्षित छत भी सुनिश्चित नहीं कर सकती? यदि संसाधन उपलब्ध हैं तो उनका असर जमीन पर क्यों नहीं दिखाई देता और यदि संसाधन पर्याप्त नहीं हैं तो उनकी कमी दूर करने की जिम्मेदारी किसकी है?
सरकारी धन की राह और गौशाला की हालत के बीच कितना फासला?
ग्रामीणों ने ग्राम प्रधान और सचिव पर गौशाला के नाम पर मिलने वाले सरकारी धन के समुचित इस्तेमाल में लापरवाही के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि धन का सही उपयोग हो तो चारा-पानी, शेड, जलनिकासी और सफाई जैसी बुनियादी व्यवस्थाओं की हालत बेहतर हो सकती है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।ग्रामीणों ने गौशाला के सरकारी अभिलेखों, खर्च और मौके की व्यवस्थाओं का सत्यापन कराने के साथ गोवंशों की मौत के कारणों की जांच की मांग की है। साथ ही दोषी पाए जाने पर जिम्मेदारी तय करने की मांग उठाई है।
रिश्तों की छत या व्यवस्था की छत?
ग्राम प्रधान के स्थानीय मंत्री से कथित अच्छे संबंधों के कारण कार्रवाई नहीं होने का आरोप भी लगाया गया है। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, इसलिए यह जांच का विषय है। लेकिन यही आरोप प्रशासन के सामने एक और जरूरी सवाल रखता है—क्या सरकारी व्यवस्था में कार्रवाई रिश्तों के प्रभाव से तय होती है या नियमों और तथ्यों से?
अब जरूरत बयानबाजी की नहीं, मौके की पड़ताल की है। प्रशासनिक टीम यदि गौशाला का स्थलीय निरीक्षण कर चारा-पानी, शेड, जलनिकासी, सफाई, मृत गोवंशों के निस्तारण और सरकारी धन के खर्च का रिकॉर्ड मिलाए तो तस्वीर खुद सामने आ सकती है।क्योंकि गौशाला की असली कहानी फाइलों में दर्ज आंकड़े नहीं, बारिश में खड़ा वह गोवंश लिखता है जिसे संरक्षण के नाम पर आश्रय मिला है। सरकारी धन की एक-एक पाई और गोवंश की एक-एक मौत—दोनों का हिसाब जरूरी है। जांच ही तय करेगी कि पैलानी गौशाला में शिकायतें महज आरोप हैं या व्यवस्था की वह दरार, जिसे कागजी दावों ने अब तक ढक रखा था।

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