दुनिया के कारोबार में दशकों से डॉलर का दबदबा रहा है, लेकिन अब BRICS इसी निर्भरता को चुनौती देने की तैयारी में है. सवाल ये है कि अगर कारोबार डॉलर से हटेगा, तो BRICS के पास इसका विकल्प क्या होगा?
- दिल्ली में BRICS का मंच सजा है. भारत मेजबानी कर रहा है. 21 देश ब्रिक्स मंच पर हैं. जिस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं. क्योंकि ये कोई आम मंच नहीं बल्कि यहां दुनिया के नए शक्ति संतुलन की नींव रखी जा रही है. जिसे पश्चिमी देश टक टकी लगाए देख रहे हैं. दुनिया की चौधराहट का पुराना हिसाब-किताब अब बदल रहा है. एक तरफ वो पश्चिम है, जिसने दशकों तक दुनिया की अर्थव्यवस्था, डॉलर, संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय नियमों पर अपना दबदबा बनाए रखा. और दूसरी तरफ नई दिल्ली में एक ऐसा मंच खड़ा है, जहां रूस के पुतिन हैं. चीन के शी जिनपिंग हैं. ईरान के पेजेश्कियान हैं. भारत की मेजबानी है और दुनिया की करीब आधी आबादी की आवाज है.
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- ब्रिक्स समिट की तस्वीर देखकर पश्चिमी देश परेशान हैं. पेंटागन में टेंशन का मीटर अप है. क्योंकि BRICS के मंच से जो संदेश निकला, वो सिर्फ अमेरिका और G7 के लिए राजनीतिक बयान नहीं है. बल्कि बदलते ग्लोबल पावर बैलेंस का संकेत है.
- BRICS देशों का वैश्विक GDP में हिस्सा 40 फीसदी
- पुतिन ने सीधे G7 पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि BRICS देशों का वैश्विक GDP में हिस्सा 40 फीसदी से ज्यादा है. जबकि G7 का करीब 29 फीसदी और साथ ही G7 की ताकत पर भी तंज कसा. पिछले 5 वर्षों में दुनिया की जीडीपी में ब्रिक्स देशों का हिस्सा 40% से अधिक रहा है, जबकि तथाकथित G7 मैं नहीं जानता कि वे इसे G7 क्यों कहते हैं. ग्रुप ऑफ सेवन उसका योगदान केवल 29% है. यानी सवाल सिर्फ सात बनाम 11 देशों का नहीं है. सवाल ये है कि 21वीं सदी की दुनिया का पावर सेंटर आखिर होगा कहां.
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- व्यापार पर प्रतिबंध लगाना ठीक नहीं
- इसी अवधि में वैश्विक आर्थिक वृद्धि में आधे से अधिक योगदान ब्रिक्स का रहा है, जबकि G7 का योगदान 18% रहा है. ब्रिक्स देशों के पास दुनिया की आधी से अधिक आबादी और मजबूत घरेलू बाजार हैं. पुतिन ने साफ कहा कि व्यापार पर प्रतिबंध लगाना ठीक नहीं है. आज दुनिया में बड़े पैमाने पर व्यापारिक प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं. दूसरे देशों के खिलाफ आर्थिक दबाव बनाया जा रहा है. वैश्विक सप्लाई चेन को बाधित करने की कोशिश हो रही है. पुतिन के कहा, पश्चिमी देश के कारोबारी और कंपनियां प्रतिस्पर्धा से डरती हैं.
- हमें कहा जाता है कि प्रतियोगिता बहुत महत्वपूर्ण है और इसमें किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए. हमारे पश्चिमी प्रतिस्पर्धी भी अपनी खोई हुई बढ़त वापस पाने के लिए पूरी कोशिश कर रहे हैं. प्रतिस्पर्धा जरूरी है, लेकिन अपनी बढ़त हासिल करने की होड़ में अब पश्चिमी देश ऐसे तरीके अपना रहे हैं जो बहुत ही गलत है.
- उधर पीएम मोदी ने भी ब्रिक्स की ताकत की झलक पूरी दुनिया को दिखाई. साथ ही ये साफ कर दिया कि आज की तारीख में ब्रिक्स एक ऐसा संगठन है जो पश्चमी अर्थव्यवस्था और सिस्टम को चुनौती देेने के लिए पूरी तरह से तैयार है.
- 40 फीसदी वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व
- नई दिल्ली में BRICS की मेज पर तस्वीर साफ है. BRICS अब सिर्फ चार-पांच देशों का आर्थिक क्लब नहीं रहा..बल्कि ये 11 देशों का समूह है, जो दुनिया की करीब आधी आबादी और करीब 40 फीसदी वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है. और इसी आंकड़े को पुतिन ने पश्चिम के सामने राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया.
- उधर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने भी ग्लोबल सप्लाई चेन बाधित होने पर चिंता जताई. मसूद पेजेश्कियान ने कहा कि आज दुनिया अपने सबसे जटिल दौर से गुजर रही है. भू-राजनीतिक अनिश्चितता, आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान और राजनीतिक दबाव बनाने के लिए आर्थिक हथियारों के बढ़ते इस्तेमाल ने उस आर्थिक माहौल को और जटिल बना दिया है, जिसमें देश काम करते हैं.
- पश्चिम हुआ करता था दुनिया में फैसलों का केंद्र
- जिस दुनिया में फैसलों का केंद्र पश्चिम हुआ करता था. उस दुनिया में अब भारत, चीन, रूस, ब्राजील, ईरान और दूसरे उभरते देश अपनी हिस्सेदारी मांग रहे हैं. और इसने अमेरिका समेत पश्चिमी देशों को परेशान कर दिया है. अगर आंकड़ों पर गौर करें तो G7 में 7 सदस्य देश हैं, वहीं BRICS मे 11 हैं. वैश्विक आबादी की बात की जाए तो G7 की हिस्सेदारी 10 फीसदी है, जबकि BRICS की 50 फीसदी है. वहीं G7 की GDP 29% है, जबकि BRICS की लगभग 40 फीसदी है.
- पश्चिमी देशों के लिए बड़ी चुनौती
- ऊर्जा की बात करें तो G7 के सदस्य देशों को खाड़ी और अन्य पर निर्भर रहना पड़ता है तो वहीं BRICS देश 40 फीसदी से ज्यादा उर्जा उत्पादन खुद करते हैं. वहीं कारोबार की बात की जाए तो G7 के सदस्य देश डॉलर में कारोबार करते हैं तो वहीं BRICS देश अपने स्थानीय मुद्राओं में. आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि BRICS की ये ताकत पश्चिमी देशों के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर सकती है.
- दुनिया के कारोबार में दशकों से डॉलर का दबदबा रहा है, लेकिन अब BRICS इसी निर्भरता को चुनौती देने की तैयारी में है. सवाल ये है कि अगर कारोबार डॉलर से हटेगा, तो BRICS के पास इसका विकल्प क्या होगा? इसका पहला जवाब है, लोकल करेंसी में कारोबार, यानी डॉलर के बीच में आए बिना एक-दूसरे की मुद्रा में सीधे सेटलमेंट की कोशिश की.
- 11 देशों में चल रहा UPI सिस्टम
- केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि आज, हमारा UPI सिस्टम 11 देशों में चल रहा है और मैं ब्रिक्स के सदस्य देशों और साझीदार देशों से आग्रह करूंगा कि हम अपनी भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ें, एक-दूसरे की स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करें, डिजिटल व्यापार को वैश्विक बनाएं, और उभरती हुई इकॉनमी के भविष्य के लिए मिलकर निर्माण करें.
- BRICS के भीतर लंबे समय से चर्चा है कि व्यापार में डॉलर पर निर्भरता कम कैसे की जाए. राष्ट्रीय मुद्राओं में कारोबार बढ़े. वैकल्पिक पेमेंट सिस्टम बनें और ऐसी सप्लाई चेन तैयार हो जो पश्चिमी वित्तीय सिस्टम के बाहर भी चल सके. यही वो जगह है जहां BRICS का आर्थिक प्रोजेक्ट. धीरे-धीरे भू-राजनीतिक प्रोजेक्ट बनता दिखाई देता है.
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