सत्य निकेतन PG हादसे के बाद सामने आए एग्रीमेंट में मालिक ने दुर्घटना की जिम्मेदारी से इनकार किया. जानिए, क्या ऐसी शर्त से आपराधिक कार्रवाई और हर्जाने से बचा जा सकता है?


दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में पांच मंजिला PG इमारत गिरने से सात लोगों की मौत के बाद छात्रों से कराए गए एग्रीमेंट की एक शर्त ने सुरक्षा और जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. सामने आए दस्तावेज में लिखा है कि PG प्रशासन परिसर में रहने वाले व्यक्ति के साथ होने वाली किसी दुर्घटना या जोखिम के लिए जिम्मेदार नहीं होगा. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस तरह की शर्त लिखवा लेने से भवन मालिक कानूनी कार्रवाई से बच सकता है? आइए इसे डिटेल में समझते हैं.

एग्रीमेंट में क्या-क्या लिखा था?

PG एग्रीमेंट में हॉस्टल की सीट की अवधि, दो महीने की सिक्योरिटी और एक महीने का एडवांस किराया देने जैसी शर्तें शामिल थीं. इसमें यह भी लिखा था कि लॉकिंग पीरियड पूरा होने से पहले हॉस्टल छोड़ने पर जमा फीस और सिक्योरिटी वापस लेने का दावा नहीं किया जा सकेगा. इसके अलावा समय पर फीस जमा करने, दीवारों पर पोस्टर या लिखाई नहीं करने और फर्नीचर या अन्य सामान को नुकसान होने पर सिक्योरिटी से रकम काटने जैसी शर्तें भी थीं, लेकिन इसी दस्तावेज में सबसे अहम शर्त यह थी कि PG प्रशासन किसी दुर्घटना या जोखिम के लिए जिम्मेदार नहीं होगा. यह शर्त छात्रों की सुरक्षा की जिम्मेदारी को अपने आप खत्म नहीं कर देती. किसी छात्र से जोखिम स्वीकार करवाना और मालिक को कानून से पूरी तरह मुक्त कर देना, दोनों अलग बातें हैं.

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क्या ऐसे क्लॉज से आपराधिक मामला खत्म हो जाता है?

नहीं, अगर जांच में यह सामने आता है कि इमारत की हालत, निर्माण में लापरवाही, सुरक्षा नियमों की अनदेखी या किसी अन्य गैरकानूनी काम के कारण मौत हुई, तो जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई हो सकती है. निजी एग्रीमेंट किसी व्यक्ति को अपराध करने या लापरवाही से मौत होने पर कानून के तहत जवाबदेही से मुक्त नहीं करता. भारतीय न्याय संहिता (BNS) में लापरवाही से मौत और गैर-इरादतन हत्या जैसे अपराधों के प्रावधान हैं. लेकिन इस मामले में कौन-सी धारा लागू होगी, यह जांच में सामने आने वाले तथ्यों पर निर्भर करेगा. सिर्फ एग्रीमेंट की शर्त देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि मालिक दोषी है या नहीं. इस हादसे के बाद इमारत की उम्र, निर्माण की अनुमति और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठे हैं. अगर जांच में अवैध निर्माण या भवन सुरक्षा नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो उसके लिए अलग से कार्रवाई हो सकती है. ऐसी स्थिति में यह तर्क कि छात्रों ने पहले ही जोखिम स्वीकार किया था, निर्माण नियमों के उल्लंघन का बचाव नहीं बन जाता.

क्या छात्रों के परिवार हर्जाना मांग सकते हैं?

हां, आपराधिक कार्रवाई के अलावा पीड़ित परिवार सिविल हर्जाने का दावा भी कर सकते हैं. लापरवाही के कारण नुकसान होने पर हर्जाने का सवाल उठ सकता है. एग्रीमेंट की शर्त का असर मामले के तथ्यों और अदालत के फैसले पर निर्भर करेगा. भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 23 के अनुसार, ऐसा समझौता जिसका उद्देश्य कानून के खिलाफ हो, किसी कानून के प्रावधानों को बेअसर करता हो या सार्वजनिक नीति के खिलाफ हो, शून्य हो सकता है. इसलिए किसी शर्त की वैधता उसके शब्दों से नहीं बल्कि उसके कानूनी असर और परिस्थितियों से तय होगी.

जांच में किन सवालों के जवाब जरूरी?

इस हादसे में सिर्फ मालिक की भूमिका ही नहीं, बल्कि भवन की अनुमति, निर्माण की निगरानी, सुरक्षा प्रमाणपत्र, बिजली और अग्नि सुरक्षा व्यवस्था तथा संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी भी जांच का हिस्सा होनी चाहिए. दिल्ली पुलिस ने भवन मालिक हरिराम बंसल को राजस्थान के भिवाड़ी से पकड़ा है. वहीं, रिपोर्ट के अनुसार दक्षिणी जोन के डिप्टी कमिश्नर और चार इंजीनियरों को जांच पूरी होने तक निलंबित किया गया है. दिल्ली के मेयर प्रवेश वाही ने कहा है कि फिलहाल किसी को सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि मजिस्ट्रेट जांच चल रही है. उनके मुताबिक, जांच रिपोर्ट आने के बाद ही जिम्मेदारी तय होगी. PG एग्रीमेंट में लिखा हम जिम्मेदार नहीं होंगे वाला क्लॉज मालिक के लिए ऐसी ढाल नहीं है, जो उसे हर आपराधिक या सिविल दायित्व से बचा दे. लेकिन यह भी जरूरी है कि दोष और सजा का फैसला जांच और अदालत के आधार पर ही हो. छात्रों से ऐसा एग्रीमेंट लिखवाना सुरक्षा की जिम्मेदारी खत्म करने का प्रमाण नहीं माना जा सकता.

हाईकोर्ट ने MCD और DU से भी मांगा जवाब

इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार, MCD और दिल्ली यूनिवर्सिटी को नोटिस जारी कर PG में रहने वाले छात्रों की संख्या, हॉस्टल की उपलब्धता और भवन की मंजूरियों का ब्योरा मांगा है. कोर्ट ने MCD से पूछा है कि PG हॉस्टल के नियमन के लिए क्या नियम हैं और हादसे वाली इमारत सभी जरूरी मंजूरियों के साथ बनी थी या नहीं. साथ ही, दिल्ली में PG भवनों की वैधता और उनमें रहने वाले छात्रों की संख्या की रिपोर्ट भी मांगी गई है. कोर्ट ने संबंधित विभागों को 10 दिन में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है. हाईकोर्ट ने कहा कि हादसे के लिए सिर्फ भवन मालिक ही नहीं, बल्कि MCD और दिल्ली यूनिवर्सिटी की जिम्मेदारी पर भी सवाल उठते हैं.

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