दिल्ली में सत्य निकेतन बिल्डिंग गिरने के बाद लोगों का गुस्सा शांत करने के लिए कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई की बिजलियां गिराई जा रही हैं लेकिन क्या ये गारंटी हैं, ऐसे हादसे फिर नहीं होंगे. सच यही है- सत्य निकेतन के जैसे दिल्ली में कई बिल्डिंग जगह-जगह ऐसे हादसे का इंतजार कर रही है. इसीलिए आज हम आपको सत्य निकेतन हादसे का पूरा सच बताएंगे.
उससे पहले हादसे से जुड़े अब तक के अपडेट जान लेते हैं. इस हादसे में मौत की संख्या बढ़कर अब 7 हो चुकी है. PG के मालिक हरि राम बंसल को राजस्थान से पकड़ लिया गया है. दिल्ली सरकार ने MCD के डिप्टी कमिश्नर और 4 इंजीनियर्स को सस्पेंड किया है. साथ ही सरकार ने मजिस्ट्रेट जांच के आदेश भी दिए हैं और आज उपराज्यपाल ने डीडीए, MCD और दिल्ली पुलिस के अधिकारियों के साथ बैठक की है.
लेकिन क्या इसमें कुछ नया है. नहीं -ये सब 2023 में मुखर्जी नगर में हुए हादसे के बाद भी हुआ. यही 2024 में ओल्ड राजेंद्र नगर में छात्रों की मौत के बाद किया गया. ये सब कुछ इसी साल मालवीय नगर में हुए अग्निकांड के बाद भी हुआ. तो बदला क्या, सिर्फ तस्वीरें.
हादसे का सीसीटीवी वीडियो वायरल
हादसे का एक नया सीसीटीवी वीडियो सोशल मीडिया पर तैर रहा है. ठीक उस वक्त का जब 6 सितंबर को 1.30 बजे 5 मंजिला बिल्डिंग गिरी. जिसके बिल्कुल पास में एक शख्स बैठा था. उसने जैसे ही ये देखा कि बिल्डिंग गिरने वाली है. वो भागता है और तभी धूल के गुबार में गुम हो जाता है. इस हादस में 6 छात्र जो पढ़ने आए थे. जिनकी जिंदगी अभी बाकी थी. जो कुछ बन सकते थे. मौत का सिर्फ आंकड़ा बन कर रह गए. किसी इंसान का आंकड़ा बन जाना शोक का विषय है, लेकिन हमारे और आपके लिए, लापरवाह और बेइमान सिस्टम के लिए नहीं.
40 साल पुरानी बिल्डिंग सेफ्टी ऑडिट नहीं
अब तक की जांच में पता चला है जो बिल्डिंग गिरी वो 40 साल पुरानी थी लेकिन सेफ्टी ऑडिट नहीं हुआ था. इजाजत 3 मंजिल बनाने की थी, लेकिन 5 मंजिल बना दी गई. बिल्डिंग कमजोर थी इसके बावजूद बेसमेंट में खुदाई का काम चल रहा था. दावा है एक पिलर के खिसकने से पूरी की पूरी इमारत ढह गई. इसके अलावा उस बेसमेंट में पहले से बारिश का पानी भरा हुआ था, इजाजत रेजिडेंशियल की थी लेकिन PG चलाया जा रहा था और ये भी सामने आया है कि इमरजेंसी एग्जिट और दूसरे सुरक्षा इंतजाम भी नहीं थे.
क्या भविष्य में कुछ बदलेगा?
अब इस हादसे के बाद सवाल ये है कि क्या भविष्य में कुछ बदलेगा? क्या बेइमानी की कोई इमारत फिर नहीं गिरेगी? जिसके नीचे छात्र दबकर नहीं मरेंगे? पैटर्न देखकर लगता है नहीं. क्योंकि हमेशा की तरह इस हादसे के बाद की स्क्रिप्ट भी बिल्कुल वैसी ही है जैसा हर बार होता है.
7 मौत पर नेताओं ने शोक जताया है साथ ही राजनीति हो रही है. मुमकिन है मृतकों के परिवारों को मुआवजे वाली सांत्वना दे दी जाए, जैसे हर बार सरकार तुरंत कड़े एक्शन का भरोसा देती है. शुरुआती जांच में 5-6 अधिकारी सस्पेंड कर दिए जाते हैं. फिर जांच वाली रस्में शुरू होती है. हाई-लेवल कमिटी बनती है.. यही पैटर्न इस बार भी दिख रहा है. अब लाइट, कैमरा, एक्शन मोड में बिल्डिंगों की जांच की जाएगी.
हादसे के बाद ही जागती है सरकार
चुस्ती फुर्ती दिखाने के लिए रेड वाली औपचारिकताएं होंगी, प्रशासन अलर्ट है. ये दिखाने के लिए 4-5 बिल्डिंगें सील की जाएंगी. इसके कुछ दिन बाद सब लोग ये हादसा भूल जाएंगे. हमेशा की तरह जांच की फाइलें धूल खाएंगी और फिर कहीं कोई नई इमारत गिरेगी. तो क्यों हर बार किसी ना किसी हादसे के बाद ही अधिकारी और सरकार नींद से जागते हैं.
जानें कौन-कौन हैं इस हादसे के जिम्मेदार
आज हम आपको इस हादसे पर जिम्मेदारी की एक चेन भी दिखाते हैं. जिसमें सब गुनहगार बताए जा रहे हैं. पहला जिम्मेदार PG का मालिक हरिराम बंसल, जिसने नियम कानून तोड़कर बिल्डिंग बनाई. जिम्मेदारी की इस चेन में बिल्डिंग और स्ट्रक्चरल इंजीनियर का नाम भी है.
फिर नंबर आता है MCD के उन अधिकारियों का जिन्होंने हर लापरवाही पर अपनी आंख बंद कर ली और आखिर में दोषी वो सरकार जिस पर दिल्ली को सिस्टम के साथ चलाने की जिम्मेदारी है. पर यहां तो जिम्मेदारी ने ही मलबे के नीचे दबकर दम तोड़ दिया. लेकिन क्या सत्य निकेतन में अभी ऐसे और भी हादसे इंतजार कर रहे हैं. यहां कितनी बिल्डिंग खतरे का अलार्म बजा रही हैं.
कोर्ट ने MCD से लेकर सरकार तक की लगाई क्लास
आज इस हादसे पर आज दिल्ली हाई कोर्ट में भी सुनवाई हुई. इस दौरान हाई कोर्ट ने विशेष तौर पर MCD की क्लास लगाई है. हाई कोर्ट ने कहा, ये हादसा सिर्फ दुर्भायपूर्ण ही नहीं गंभीर चिंता का विषय है. इसके लिए सिर्फ इमारत का मालिक नहीं, DU और MCD भी जिम्मेदार है. ऑथोरिटी जिम्मेदारी से काम करती तो ये हादसा न होता. दिल्ली सरकार भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती है. हाईकोर्ट ने MCD और दिल्ली यूनिवर्सिटी से जवाब मांगा.
अदालत ने पूछा, PG हॉस्टल के रेग्युलेशन पर नियम हैं या नहीं ? जबकि DU से पूछा बाहर से आने वाले छात्रो के लिए DU और सरकार की तरफ से कितने हॉस्टल उपलब्ध हैं. हाईकोर्ट का कहना है कि अथॉरिटी जिम्मेदारी से काम करती है तो ये हादसा न होता. हाईकोर्ट ने ये भी टिप्पणी की है कि दिल्ली सरकार भी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती है.कोर्ट ने MCD और दिल्ली यूनिवर्सिटी से 10 दिनों में जवाब मांगा है.
दिल्ली सरकार की नीति और नीयत पर प्रश्न चिन्ह
इस हादसे के बाद विपक्ष दिल्ली सरकार की नीति और नीयत पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है. इस पूरे मामले को लेकर राहुल गांधी ने भी एक पोस्ट किया और लिखा- हर बार BJP सरकार का वही शर्मनाक पैटर्न है. हादसों से पहले रोकथाम नहीं और उसके बाद बयानबाजी होती है. कुछ छोटे अफसरों पर जिम्मेदारी डाल दी जाती है और असली गुनहगार जवाबदेही मुक्त रहते हैं. वहीं AAP का कहना है सरकार काम करने की बजाय रीलबाजी कर रही है.
खतरनाक बिल्डिंगों को गिराया जाएगा
सीएम रेखा गुप्ता ने हादसे पर कहा, यहां आसपास की इमारतें भी जो खतरनाक स्थिति में हैं उन्हें भी खाली कराया गया है. खास तौर पर ये जो बिल्डिंग खड़ी है, यहां से मलबा हटने के बाद निश्चित रूप से इसको भी गिराया जाएगा. कोई भी खतरनाक बिल्डिंग को छोड़ा नहीं जाएगा और जितनी भी इमारतें ऐसी पाई जाएंगी उन सब का स्ट्रक्चरल ऑडिट होगा और उन पर भी एक्शन होगा. सख्त निर्देश दे दिए गए हैं सभी अधिकारियों को, नगर निगम को एक भी अधिकारी उसमें छोड़ा नहीं जाएगा.
एक इंसान आंकड़ा कैसे बन जाता है?
इस खबर को खत्म करने से पहले एक सवाल छोड़कर जाना जरूरी है आखिर एक इंसान आंकड़ा कैसे बन जाता है? एक इंसान जिसका एक नाम होता है, एक चेहरा होता है. जिसके शरीर में रक्त, हाड़ और मांस ही नहीं…सपने, बुद्धि और भावनाएं भी होती हैं. घर से निकलते वक्त कोई मां उससे कहती होगी फोन कर देना. कोई पिता फीस का हिसाब लगा रहा होगा. कोई दोस्त अगले रविवार का प्लान बना रहा होगा और फिर किसी की लापरवाही, किसी नियम की अनदेखी, किसी फाइल पर बंद आंखें, उस पूरे इंसान को एक संख्या में बदल देती हैं.
मृतक नंबर 1 या 2, 3, 4, 5, 6, 7 बस इतना… हमारे सार्वजनिक वाहनों में एक पुरानी लाइन लिखी होती है सवारी अपने सामान की स्वयं जिम्मेदार है. लगता है अब शहर की खतरनाक इमारतों पर भी एक बोर्ड लगा देना चाहिए. यहां रहने वाले अपनी जान के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं. व्यवस्था इसकी जिम्मेदारी नहीं लेती. क्योंकि छात्र मकान का किराया दे सकता है लेकिन क्या उसे स्ट्रक्चरल इंजीनियर भी होना चाहिए?
व्यवस्था पर बड़ा सवाल
क्या उसे खुद पता लगाना चाहिए कि दीवार कितनी कमजोर है, बेसमेंट में क्या हो रहा है, नक्शा वैध है या नहीं और जिस छत के नीचे वो सो रहा है. वो अगली सुबह तक साबुत रहेगी भी या नहीं ? अगर नागरिक को अपनी सुरक्षा की सारी जांच खुद ही करनी है. तो फिर नगर निगम, नियम, नक्शे, निरीक्षण और प्रशासन आखिर किस काम के हैं? सात मौतों पर कार्रवाई जरूर होगी. जांच भी होगी. कुछ लोग और निलंबित होंगे. शायद कुछ गिरफ्तारियां भी होंगी. लेकिन सबसे जरूरी काम ये है कि उन सात लोगों को सिर्फ 7 मत होने दीजिए. क्योंकि जब व्यवस्था इंसानों को संख्या समझने लगती है तब हादसे खत्म नहीं होते सिर्फ अगले आंकड़े का इंतजार होता है.
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