आशा और निराशा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. यह काफी हद तक हमारे नजरिए पर भी निर्भर करता है. जीवन में कुछ भी सार्थक करना है तो आशा और आत्मविश्वास का दामन नहीं छोड़ना है.


आशा है तो हौसले हैं, हौसले हैं तो उम्मीद है तो सफलता है. इसके विपरीत निराशा है. निराशा एक घने अंधेरे की तरह है. ये दोनों व्यक्ति के मनोभाव हैं. लेकिन कुछ लोग निराशा के अंधेर में ही खोए रहते हैं. वह इस अंधेरे को ही जीवन का सत्य मान बैठते हैं. इसके उलट कुछ लोग घनघोर निराशा की स्थिति में भी रोशनी खोजते हैं. वे यकीन करते हैं कि अंधेरा है तो रोशनी भी होगी. निराशा है तो उम्मीद भी होगी. असफलता है तो सफलता भी होगी.

 

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि कभी जब निराशा छाने लगे तो एक बहुत सरल सा उपाय है कि जीवन में किए हुए किसी बहुत अच्छे काम याद करने की कोशिश करें. धीरे-धीरे निराशा के बादल छंटने लगेंगे और जीवन में रोशनी फिर चमकने लगेगी.

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