आमोद कुमार


आमोद कुमार 
बांदा। जिस जिले ने इस वर्ष भीषण गर्मी की तपिश झेली, जहां धरती अंगारों की तरह दहकी और लोगों ने लू के थपेड़ों में जीवन बिताया, उसी बांदा की हरियाली आज कुल्हाड़ियों के सामने बेबस खड़ी दिखाई दे रही है। सवाल यह है कि जब प्रकृति पहले ही चेतावनी दे चुकी है, तब भी पेड़ों का यह निर्मम संहार आखिर किसकी मौन सहमति से जारी है?पेड़ों को बचाने की मांग लेकर युवा और छात्र नेता जिला वन अधिकारी के दरवाजे पहुंचे। उनका आरोप है कि जनपद से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में लकड़ी ट्रकों के जरिए बाहर भेजी जा रही है। गिरवां, नरैनी, करतल और शहर के रिंग रोड क्षेत्र में संचालित लकड़ी के टालों में पेड़ों की कटाई किसी अपवाद की तरह नहीं, बल्कि एक नियमित कारोबार का रूप ले चुकी है।
विडंबना यह है कि जिस बांदा में वन क्षेत्र पहले ही बेहद सीमित बताया जाता है, वहीं शेष बचे वृक्ष भी विकास और कारोबार की आड़ में बलि चढ़ते दिखाई दे रहे हैं। यदि यही सिलसिला चलता रहा तो आने वाली पीढ़ियां पेड़ों की छांव नहीं, केवल तस्वीरें और सरकारी वृक्षारोपण अभियानों के दावे देख पाएंगी। यह केवल पेड़ों की कटाई नहीं, बल्कि भविष्य की सांसों पर चलती कुल्हाड़ी है।हालांकि जिला वन अधिकारी पंकज शुक्ला का कहना है कि शासन को पत्र भेजकर पेड़ों की कटान पर रोक लगाने और निगरानी का दायरा बढ़ाने का अनुरोध किया गया है। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि जब तक पत्र फाइलों में घूमते रहेंगे, तब तक कितने और पेड़ धराशायी हो जाएंगे? क्या कार्रवाई हमेशा पेड़ कटने के बाद ही होगी, या कभी ऐसी व्यवस्था भी बनेगी जो कुल्हाड़ी चलने से पहले उसे रोक सके?प्रकृति चेतावनी नहीं देती, वह परिणाम देती है। यदि आज हरियाली की रक्षा नहीं की गई तो कल सूखी धरती, बढ़ता तापमान, जल संकट और दमघोंटू वातावरण किसी सरकारी रिपोर्ट का विषय नहीं, बल्कि बांदा की कठोर हकीकत होंगे। अब फैसला प्रशासन को करना है कि वह पेड़ों का प्रहरी बनेगा या कटान का मूक दर्शक।

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