बांदा। जब शिक्षा पाठ्यपुस्तकों की सीमाओं से निकलकर जीवन मूल्यों, संस्कारों और


बांदा। जब शिक्षा पाठ्यपुस्तकों की सीमाओं से निकलकर जीवन मूल्यों, संस्कारों और सांस्कृतिक चेतना से जुड़ती है, तभी वह अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करती है। इसी भाव को साकार करता हुआ बड़ोखर क्षेत्र स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय लुकतरा कंपोजिट का वार्षिकोत्सव एवं प्रवेशोत्सव एक प्रेरक उदाहरण बनकर उभरा।09 अप्रैल 2026 को आयोजित इस कार्यक्रम ने यह सिद्ध कर दिया कि विद्यालय केवल ज्ञानार्जन का केंद्र नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण की प्रयोगशाला भी है। सरस्वती वंदना से आरंभ हुए इस आयोजन में विद्यार्थियों की प्रतिभा, आत्मविश्वास और रचनात्मकता का मनोहारी प्रदर्शन देखने को मिला। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से बच्चों ने न केवल अपनी अभिव्यक्ति को स्वर दिया, बल्कि भारतीय परंपराओं की जीवंतता को भी मंच पर साकार किया।कार्यक्रम का एक प्रमुख आयाम वार्षिक परीक्षा परिणामों की घोषणा और मेधावी छात्रों का सम्मान रहा। यह केवल पुरस्कार वितरण नहीं, बल्कि परिश्रम, अनुशासन और समर्पण के मूल्यांकन का प्रतीक था, जिसने विद्यार्थियों में आगे बढ़ने की प्रेरणा और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना को सुदृढ़ किया।मुख्य अतिथि ग्राम प्रधान तुलसीराम यादव एवं विशिष्ट अतिथि खंड शिक्षा अधिकारी किशन कुमार मिश्रा सहित अन्य गणमान्य व्यक्तियों के विचारों ने आयोजन को वैचारिक ऊँचाई प्रदान की। उनके उद्बोधनों में शिक्षा के साथ नैतिकता, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व पर विशेष बल दिया गया, जो वर्तमान समय की आवश्यकता को रेखांकित करता है।विद्यालय के प्रधानाध्यापक श्याम बाबू के कुशल नेतृत्व में शिक्षकगण—डॉ. अश्वनी यादव, राजेश तिवारी, भावेश शर्मा, राजेंद्र साहू—ने इस आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मंच संचालन की सजीवता और कार्यक्रम की सुव्यवस्था ने पूरे आयोजन को प्रभावशाली बनाए रखा।यह वार्षिकोत्सव केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि उस व्यापक दृष्टिकोण का प्रतीक था, जिसमें शिक्षा, संस्कार और समाज एक सूत्र में पिरोए नजर आते हैं। ऐसे आयोजन यह संदेश देते हैं कि यदि विद्यालयों में इस प्रकार की गतिविधियाँ निरंतर होती रहें, तो न केवल प्रतिभाएँ निखरेंगी, बल्कि एक जागरूक, संस्कारित और जिम्मेदार समाज की सुदृढ़ नींव भी स्थापित होगी।

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