सुविधा और पहचान की अनिवार्य शर्त बना चुकी है, लेकिन ऊंचाहार क्षेत्र में आधार से जुड़ी व्यवस्थाएँ आज भी बदहाली का शिकार हैं। स्थिति यह है कि जनता आधार कार्ड बनवाने के लिए दर-दर भटक रही है, पर कहीं सुनवाई नहीं। सवाल उठता है—जब सरकार ने आधार को सर्वोच्च वरीयता दे दी है, तो ऊंचाहार को इस सुविधा से वंचित क्यों रखा जा रहा है? सबसे चिंताजनक बात यह है कि पूरे ऊंचाहार में आधार नामांकन का काम सिर्फ बैंक ऑफ बड़ौदा की एक शाखा में, वह भी सिर्फ एक व्यक्ति द्वारा, किया जा रहा है। पूरे क्षेत्र की भारी आबादी एक ही काउंटर पर निर्भर है। परिणामस्वरूप रोज सुबह से ही लंबी कतारें लग जाती हैं, और दिनभर इंतजार करने के बाद भी सैकड़ों लोग निराश होकर वापस लौट जाते हैं। यह स्थिति न केवल अव्यवस्था को दर्शाती है, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता भी उजागर करती है।स्थानीय लोगों का कहना है कि यह व्यवस्था सरकार के मानक रूप से बिल्कुल अलग है। जब आधार इतना महत्वपूर्ण है, तो जिम्मेदार विभाग और अधिकारी ऊंचाहार में आधार एनरोलमेंट कैंप क्यों नहीं लगवा रहे? क्या अधिकारियों के लिए जनता की तकलीफों का कोई महत्व ही नहीं? क्या योजनाओं के लाभ सिर्फ कागजों में दिए जाएंगे, और जनता वास्तविक सुविधाओं के लिए भटकती रहेगी? लोगों का आरोप है कि आधार न बन पाने कारण पेंशन,राशनकार्ड,छात्रवृत्ति,बैंकिंग सेवाएँ,गैस सब्सिडी,सरकारी योजनाओं में नामांकन जैसी महत्वपूर्ण सेवाएँ अटक रही हैं। इस कारण गरीब और ग्रामीण परिवार सबसे ज्यादा परेशान हैं।ऊंचाहार की जनता का साफ कहना है कि एक व्यक्ति के भरोसे पूरी तहसील को छोड़ देना सुव्यवस्था नहीं, लापरवाही है। यह प्रश्न भी उठ रहा है कि जब आधार सेवा केंद्रों की संख्या बढ़ाना सरकार की प्राथमिकताओं में है, तो स्थानीय अधिकारी इसे लागू क्यों नहीं कर पा रहे? आखिर जिम्मेदारी किसकी है?जनता की मांग है कि ऊंचाहार में तुरंत बहु-स्थानिक आधार कैंप, विद्यालयों में अस्थायी शिविर और दो से तीन स्थायी केंद्र खोले जाएँ, ताकि लोगों को राहत मिल सके। क्योंकि वर्तमान स्थिति जनता नहीं, बल्कि प्रशासन की नाकामी की कहानी कह रही है—और इस नाकामी की कीमत आम लोगों को चुकानी पड़ रही है।
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