“बिहार की राजनीति : 2025 विधानसभा चुनाव, जातीय समीकरण और नीतीश–तेजस्वी–भाजपा की बदलती रणनीति”
जातीय समीकरण, महागठबंधन की उलझनें और जनता का मूड
: बिहार की राजनीति का चौराहा)
*1. भूमिका : बिहार की राजनीति का चौराहा*
बिहार की राजनीति हमेशा से भारत की लोकतांत्रिक कथा का सबसे जीवंत अध्याय रही है। यह वह भूमि है जहाँ राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, जातीय समीकरण और वैचारिक टकराव का संगम है। यहाँ चुनाव केवल सरकार बदलने का माध्यम नहीं, बल्कि यह तय करता है कि समाज की धारा किस दिशा में बहेगी।
2025 के विधानसभा चुनाव से पहले बिहार एक बार फिर राजनीतिक उबाल के दौर में है। नीतीश कुमार के "जनता दल (यू)" की दिशा पर अनिश्चितता है, तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) खुद को युवाओं की नई उम्मीद के रूप में प्रस्तुत करने में जुटा है, जबकि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपनी “मिशन 2025” रणनीति के तहत बिना चेहरे के चुनावी तैयारी में व्यस्त है।
राजनीतिक रूप से, बिहार इस समय “त्रिकोणीय” नहीं बल्कि “बहुकोणीय” स्थिति में है। नीतीश कुमार बार-बार पाला बदलने की अपनी प्रवृत्ति से “विश्वसनीयता संकट” झेल रहे हैं; तेजस्वी यादव को जातीय समर्थन तो है, पर व्यापक जनाधार में अब भी चुनौती है; भाजपा मजबूत संगठन और केंद्र के समर्थन के दम पर “एकल बहुमत” का सपना देख रही है।
ऐसे में सवाल उठता है —
क्या 2025 में बिहार एक बार फिर “मंडल बनाम कमंडल” की लड़ाई देखेगा, या अब राजनीति रोजगार, विकास और सुशासन के नए एजेंडे पर लौटेगी?
*2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : समाजवाद से गठबंधन युग तक*
बिहार की राजनीति को समझने के लिए उसके इतिहास में झांकना जरूरी है।
1960 के दशक में जब देशभर में कांग्रेस का वर्चस्व था, तब बिहार में समाजवादी राजनीति ने जड़ें जमानी शुरू कीं। डॉ. राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और करपूरी ठाकुर जैसे नेताओं ने राजनीति को सामाजिक न्याय और समान अवसर के विचार से जोड़ा।
फिर आया *1974 का जेपी आंदोलन*, जिसने पूरे देश की राजनीति बदल दी। इसी आंदोलन से निकले नेताओं में लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, सुशील मोदी, रामविलास पासवान जैसे नाम शामिल थे — जिन्होंने आगे चलकर बिहार की दशा-दिशा तय की।
1990 में *लालू प्रसाद यादव* ने सत्ता संभाली और “भूराबाल” (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला) के वर्चस्व को चुनौती दी। उनका “MY समीकरण” — यानी मुस्लिम + यादव — वर्षों तक राजनीति का स्थायी आधार बना रहा।
“भूरा बाल साफ करो” का नारा सामाजिक क्रांति का प्रतीक था, जिसने पिछड़ों और दलितों को राजनीतिक ताकत दी, लेकिन साथ ही शासन में अराजकता, भ्रष्टाचार और जातीय विभाजन की छाया भी बढ़ी।
2005 में *नीतीश कुमार* ने “सुशासन बाबू” की छवि के साथ सत्ता संभाली। विकास, शिक्षा, सड़क, बिजली और कानून-व्यवस्था में सुधार ने उन्हें जनता का नायक बना दिया।
लेकिन समय के साथ यह छवि कमजोर पड़ने लगी। सत्ता की लंबी उम्र ने उनके आसपास राजनीतिक थकान और वैचारिक असमंजस का घेरा खींच दिया।
3. नीतीश कुमार का बदलता चेहरा : विकास बनाम विकल्प*
नीतीश कुमार शायद भारत के सबसे चतुर और साथ ही सबसे विरोधाभासी नेताओं में गिने जाते हैं।
उन्होंने राजनीति में “गठबंधन की कला” को विज्ञान बना दिया है। कभी भाजपा के साथ रहे, फिर लालू यादव के साथ गए, फिर वापस भाजपा के साथ लौट आए — और अब एक बार फिर महागठबंधन में उनकी स्थिति “ना घर की, ना घाट की” जैसी है।
नीतीश का सबसे बड़ा गुण उनका “मैनेजमेंट” है — चाहे प्रशासनिक हो या राजनीतिक।
उनकी छवि एक ऐसे नेता की रही है जो शांतिपूर्वक शासन चलाते हैं, मगर पिछले कुछ वर्षों में यह छवि दरकने लगी है।
लोग अब उन्हें “यू-टर्न कुमार” के नाम से भी बुलाने लगे हैं, जो हर चुनाव से पहले अपनी दिशा बदलते हैं।
भाजपा के साथ रहते हुए उन्होंने विकास और सुशासन पर ध्यान दिया।
लेकिन जैसे ही वे राजद के साथ लौटे, बिहार फिर से “जातीय समीकरणों की राजनीति” में डूबता दिखा।
भाजपा अब उन्हें “अविश्वसनीय” कहकर जनता के सामने पेश कर रही है, जबकि राजद के भीतर भी उनके प्रति विश्वास की कमी है।
2025 का चुनाव उनके लिए अस्तित्व की लड़ाई जैसा होगा।
वे जानते हैं कि अब जनता विकास की भाषा तो सुनती है, पर उसे *राजनीतिक स्थिरता और भरोसे की निरंतरता* भी चाहिए।
उनका “सुशासन मॉडल” अब उतना प्रभावी नहीं रहा क्योंकि युवा मतदाता इसे पुराने दौर की कहानी मानते हैं।
4. तेजस्वी यादव का उभार : युवाओं की उम्मीद या जातीय मजबूरी?*
तेजस्वी यादव ने 2020 के विधानसभा चुनाव में जिस तरह प्रदर्शन किया, उसने सभी राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया था।
राजद ने 75 सीटें जीतकर भाजपा-जदयू गठबंधन को कड़ी टक्कर दी।
वह युवा हैं, सहज बोलते हैं, और बेरोज़गारी को मुख्य मुद्दा बनाने में सफल रहे।
तेजस्वी की सबसे बड़ी ताकत है — उनका जातीय आधार।
लगभग 14% यादव और 17% मुस्लिम मतदाता अब भी बड़े पैमाने पर राजद के साथ हैं।
लेकिन यह भी सच है कि यही “MY समीकरण” अब उनकी सीमा बन गया है।
राजद को सत्ता तक पहुंचने के लिए यादव-मुस्लिम के अलावा *EBC (अति पिछड़ा वर्ग), **महादलित* और *महिला मतदाताओं* में भी पैठ बनानी होगी।
तेजस्वी का राजनीतिक सफर अभी आरंभिक है, लेकिन उनका आत्मविश्वास उन्हें एक संभावित मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाता है।
हालाँकि, उनके सामने दो बड़ी चुनौतियाँ हैं —
1. *लालू यादव की विरासत से बाहर निकलना*, और
2. *अपनी व्यक्तिगत विश्वसनीयता बनाना*।
भ्रष्टाचार मामलों में फंसे परिवार की छवि अब भी जनता के मन में बैठी है।
तेजस्वी को यह साबित करना होगा कि वे केवल “लालू के बेटे” नहीं बल्कि “बिहार के भविष्य” हैं।
राजद का नया नारा — “नौकरी नहीं तो वोट नहीं” — युवाओं में लोकप्रिय हुआ है, लेकिन भाजपा और जदयू इसे “झूठे वादों की राजनीति” कहकर खारिज करते हैं।
फिर भी, तेजस्वी ने पहली बार बिहार के चुनावी विमर्श को जाति से हटाकर रोजगार और पलायन जैसे ठोस मुद्दों पर मोड़ा है — यह उनके राजनीतिक परिपक्वता का संकेत है।
*5. भाजपा की रणनीति : बिना चेहरे के चुनाव, मगर मिशन पूर्ण बहुमत*
भाजपा आज बिहार में अपने सबसे संगठित दौर में है।
2014 के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी ने बिहार की राजनीति में स्थायी आधार बना लिया है।
2020 के चुनाव में जदयू से अलग होकर भी भाजपा ने बेहतर प्रदर्शन किया, और अब 2025 में वह अपने दम पर सरकार बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
दिलचस्प यह है कि भाजपा ने बिहार में *किसी चेहरे को आगे नहीं किया* है।
नित्यानंद राय, सम्राट चौधरी, गिरिराज सिंह, संजय जायसवाल जैसे कई नेता हैं, लेकिन पार्टी ने स्पष्ट रूप से “मोदी के नाम” पर चुनाव लड़ने का संकेत दिया है।
पार्टी का फोकस है — “डबल इंजन सरकार का विकास मॉडल” और “स्थिरता बनाम अवसरवाद” का नैरेटिव।
भाजपा नीतीश कुमार के लगातार पलटने को अपना सबसे बड़ा चुनावी हथियार बना रही है।
उसकी प्रचार रणनीति साफ है —
> “एक स्थिर सरकार चाहिए, जो दिल्ली से भिड़े नहीं, बल्कि विकास के साथ चले।”
भाजपा का संगठन गाँव-गाँव तक सक्रिय है, और आरएसएस की शाखाएँ अब सिर्फ वैचारिक नहीं, बल्कि *चुनावी बूथ प्रबंधन केंद्र* में बदल चुकी हैं।
इसके साथ ही भाजपा ने *अति पिछड़े वर्ग (EBC)* और *महादलित समुदायों* पर फोकस बढ़ा दिया है — जो पहले नीतीश कुमार का आधार थे।
भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि क्या वह बिना नीतीश के “स्थानीय चेहरा” बनाए जनता का भरोसा जीत पाएगी?
2025 का चुनाव इस सवाल का निर्णायक उत्तर देगा।
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