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लव सिंह यादव/अब तक न्याय
जातीय समीकरण, महागठबंधन की उलझनें और जनता का मूड
. जातीय समीकरण : MY बनाम EBC–OBC बनाम सवर्ण समीकरण*
बिहार की राजनीति का केंद्र हमेशा “जाति” रही है — यहाँ कोई भी चुनाव इससे अलग नहीं हो सकता।
जातीय समीकरण केवल वोट बैंक नहीं बल्कि एक सामाजिक संरचना है जो बिहार के जनमानस को दशकों से प्रभावित करती आई है।
लालू यादव ने 1990 के दशक में जो सामाजिक गठजोड़ तैयार किया था, वह अब भी जीवित है।
राजद के लिए यादव वोट (लगभग 14%) और मुस्लिम वोट (लगभग 17%) एक ठोस आधार हैं।
यानी, कुल 30–31% वोटों पर राजद की पारंपरिक पकड़ है।
तेजस्वी यादव इसी आधार पर आगे बढ़ रहे हैं।
परंतु अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या केवल MY समीकरण से सत्ता में वापसी संभव है?
2020 के चुनाव में राजद ने 23% वोट पाए, जबकि भाजपा–जदयू गठबंधन को मिलाकर लगभग 38% वोट मिले।
स्पष्ट है कि बिना नए वर्गों को साथ लाए राजद के लिए जीत मुश्किल है।
तेजस्वी यादव को *EBC (अति पिछड़ा वर्ग)* और *महादलित* समुदायों को जोड़ना होगा, जो अब तक नीतीश कुमार और भाजपा के साथ रहे हैं।
EBC–OBC समीकरण : राजनीति की नई धुरी*
नीतीश कुमार का सबसे बड़ा योगदान यही रहा कि उन्होंने राजनीति को “MY बनाम बाकी” के दायरे से बाहर निकाला।
उन्होंने *अति पिछड़ों* — जैसे नाई, कुशवाहा, तेली, लुहार, कुम्हार, मांझी आदि जातियों — को संगठित किया और उन्हें सत्ता में प्रतिनिधित्व दिया।
इन्हें 2006 के बाद से “EBC वर्ग” (Extremely Backward Class) के रूप में राजनीतिक पहचान मिली।
यह वर्ग आज बिहार की राजनीति में निर्णायक है।
इनकी संख्या लगभग 30% के आसपास मानी जाती है, लेकिन ये जातीय रूप से बिखरे हुए हैं।
इसीलिए जो दल इन्हें जोड़ लेता है, वही सत्ता के करीब पहुँच जाता है।
भाजपा ने हाल के वर्षों में इस वर्ग पर जोर दिया है।
EBC समुदाय को आकर्षित करने के लिए उसने सम्राट चौधरी (कुशवाहा जाति) और नित्यानंद राय (यादव पृष्ठभूमि) जैसे नेताओं को आगे बढ़ाया है।
पार्टी का लक्ष्य है कि “जातिवाद के बिना जातीय संतुलन” साधा जाए — यानी जातियों को सामाजिक प्रतिनिधित्व तो मिले, पर चुनावी विमर्श में जाति की राजनीति न झलके।
भाजपा का स्थायी आधार*
सवर्ण मतदाता — विशेषकर ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत और कायस्थ — आज बिहार में भाजपा की रीढ़ हैं।
भाजपा का लगभग 80% सवर्ण वोट बैंक स्थायी रूप से उसके साथ है।
नीतीश कुमार के साथ रहते हुए भी भाजपा का यह आधार कभी नहीं टूटा।
यह वर्ग भाजपा के लिए वैचारिक और वित्तीय दोनों रूप से मजबूत समर्थन प्रदान करता है।
परंतु, पार्टी अब जानती है कि केवल सवर्णों के दम पर वह बहुमत तक नहीं पहुँच सकती — इसलिए उसका फोकस EBC + सवर्ण + महिला मतदाता के संयोजन पर है।
*महादलित वोट बैंक : नीतीश का सामाजिक प्रयोग*
नीतीश कुमार ने दलित समाज को दो हिस्सों में बाँटा —
1. *दलित*,
2. *महादलित*।
महादलितों में मुसहर, पासी, धोबी, दुसाध जैसी जातियाँ आती हैं।
उन्हें सरकारी योजनाओं के जरिए विशेष लाभ दिया गया — जैसे महादलित आयोग, आवास योजना, साइकिल योजना आदि।
यह नीतीश का “सोशल इंजीनियरिंग मॉडल” था, जिसने उन्हें वर्षों तक सत्ता में टिकाए रखा।
लेकिन अब इस वर्ग में भी नाराजगी है।
कारण — योजनाओं की कमजोर क्रियान्वयन, और राजद द्वारा उनके नेताओं को नए मंच देने की कोशिश।
तेजस्वी यादव इस वर्ग को “आर्थिक समानता” और “रोजगार अवसर” के जरिए जोड़ना चाहते हैं।
महागठबंधन की उलझनें और संभावनाएं*
महागठबंधन (राजद + जदयू + कांग्रेस + वाम दल) 2025 में किस रूप में रहेगा, यह बड़ा सवाल है।
2024 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन का प्रदर्शन कमजोर रहा।
नीतीश कुमार की “नाराजगी” और “अनिश्चित निष्ठा” से राजद नेतृत्व परेशान है।
तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार के बीच भरोसे की कमी बार-बार उजागर होती रही है।
नीतीश कुमार की यह सोच है कि वे महागठबंधन के “नेता” हैं, जबकि तेजस्वी मानते हैं कि वे “भविष्य” हैं।
यह पीढ़ीगत टकराव गठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी है।
कांग्रेस की भूमिका यहाँ बेहद सीमित है — उसके पास न तो संगठन है, न ही प्रभावी चेहरा।
वाम दल (भाकपा, माले) कुछ क्षेत्रों में सक्रिय हैं, खासकर सीवान, भोजपुर और जहानाबाद में, लेकिन वे निर्णायक स्थिति में नहीं हैं।
महागठबंधन के पास एकजुट वोट बैंक तो है, लेकिन “सामूहिक रणनीति” का अभाव है।
2025 के लिए यदि यह गठबंधन नीतीश के अनुभव और तेजस्वी की ऊर्जा को समन्वित कर सके, तो भाजपा को टक्कर दे सकता है — वरना यह “अंदरूनी घर्षण” में कमजोर पड़ जाएगा।
*8. जनता का मूड : रोजगार, भ्रष्टाचार और पलायन के सवाल*
बिहार के मतदाता अब केवल जातीय नारों से नहीं, बल्कि ठोस मुद्दों से प्रभावित होते हैं।
2025 का चुनाव युवाओं का चुनाव कहा जा रहा है — क्योंकि 18 से 35 वर्ष आयु वर्ग के मतदाता 55% से अधिक हैं।
इन युवाओं की प्राथमिकताएँ साफ हैं:
1. *रोजगार*
2. *शिक्षा की गुणवत्ता*
3. *पलायन पर रोक*
4. *भ्रष्टाचार में कमी*
रोजगार का संकट*
बिहार का बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से कई गुना अधिक है।
राज्य सरकार की नौकरियों में भर्ती प्रक्रिया धीमी है और निजी निवेश लगभग नगण्य।
तेजस्वी यादव ने 2020 में “10 लाख नौकरियों” का वादा किया था, जिसने युवाओं को आकर्षित किया, लेकिन अब लोग पूछ रहे हैं — “कहाँ हैं वे नौकरियाँ?”
भाजपा इस मुद्दे को भुनाने की तैयारी में है।
वह “केंद्र की योजनाओं” और “प्रधानमंत्री रोजगार मिशन” को बिहार के विकास से जोड़ने का प्रचार कर रही है।
दूसरी ओर, महागठबंधन यह दिखाना चाहता है कि राज्य में “संविधानसम्मत आरक्षण” और “स्थानीय अवसर” ज्यादा जरूरी हैं।
*भ्रष्टाचार और सुशासन का मुद्दा*
भ्रष्टाचार बिहार की राजनीति का स्थायी विषय है।
लालू यादव के शासनकाल की छवि “चारा घोटाले” से अब भी नहीं मिट पाई है।
नीतीश कुमार ने सुशासन की शुरुआत की थी, लेकिन अब उनके अफसरशाही पर भी सवाल उठने लगे हैं।
भाजपा अपने प्रचार में “भ्रष्टाचार मुक्त सरकार” का वादा कर रही है।
वहीं राजद का कहना है कि भाजपा “केंद्रीय एजेंसियों” का दुरुपयोग कर रही है और लोकतंत्र को कुचल रही है।
लेकिन जनता की नज़र में असल सवाल यह है — “क्या बिहार में शासन सचमुच जनता की सेवा के लिए है, या सिर्फ नेताओं की कुर्सी के लिए?”
*पलायन और विकास की असमानता*
बिहार से हर साल लाखों लोग रोज़गार की तलाश में दिल्ली, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत जाते हैं।
यह पलायन बिहार की अर्थव्यवस्था की एक दुखद हकीकत बन गया है।
बिहार के गाँवों में खेत तो हैं, पर खेती लाभदायक नहीं; शहर हैं, पर उद्योग नहीं; कॉलेज हैं, पर नौकरी नहीं।
यही वजह है कि पलायन अब *राजनीतिक मुद्दा* बन गया है।
तेजस्वी यादव इसको केंद्र में रख रहे हैं, जबकि भाजपा “बिहार के लिए विशेष पैकेज” की घोषणा कर सकती है।
नीतीश कुमार का दावा है कि उन्होंने सड़क, बिजली और स्कूल दिए हैं; अब अगला कदम “उद्योग और निवेश” का है।
लेकिन आम मतदाता कहता है — “बिजली तो आई, पर नौकरी नहीं आई।”
यानी विकास की चमक तो दिखी है, पर उसका लाभ सीमित वर्गों तक ही पहुँचा है।
*9. सोशल मीडिया और युवा मतदाता की भूमिका*
बिहार की राजनीति अब सोशल मीडिया से अछूती नहीं रही।
राज्य के लगभग हर जिले में फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप ग्रुप्स पर राजनीतिक चर्चाएँ होती हैं।
राजद और भाजपा दोनों ने “आईटी सेल” तैयार किए हैं जो युवाओं तक अपनी बात पहुँचाने में सक्रिय हैं।
भाजपा का डिजिटल प्रचार संगठित और पेशेवर है — वह “मोदी ब्रांड” को केंद्र में रखती है।
राजद का डिजिटल अभियान भावनात्मक और स्थानीय है — “हम बिहारी हैं, हमें रोजगार चाहिए” जैसे नारों के साथ।
नीतीश कुमार की डिजिटल मौजूदगी सीमित है, जो उनके लिए नुकसानदायक हो सकती है।
युवा मतदाता अब “टीवी बहसों” से ज़्यादा “रील्स और ट्वीट्स” से प्रभावित होता है।
2025 में यह वर्ग निर्णायक साबित हो सकता है।
अगर युवा तेजस्वी के रोजगार वादों पर भरोसा करते हैं, तो राजद को बढ़त मिलेगी।
अगर भाजपा केंद्र की योजनाओं और स्थिरता के नाम पर भरोसा जगा पाती है, तो वह लाभ में रहेगी।
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