दलित आंदोलन की शुरुआत 19वीं शताब्दी में हुई थी, जिसमें ज्योतिबा फुले ने 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की और 1897 में महाराष्ट्र में एक आंदोलन शुरू किया। हालांकि, 1972 में दलित पैंथर्स जैसे उग्रवादी आंदोलनों के साथ दलित आंदोलन ने अधिक व्यापक और संगठित रूप धारण किया, जो जाति-आधारित भेदभा


दलित आंदोलन की शुरुआत 19वीं शताब्दी में हुई थी, जिसमें ज्योतिबा फुले ने 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की और 1897 में महाराष्ट्र में एक आंदोलन शुरू किया। हालांकि, 1972 में दलित पैंथर्स जैसे उग्रवादी आंदोलनों के साथ दलित आंदोलन ने अधिक व्यापक और संगठित रूप धारण किया, जो जाति-आधारित भेदभाव के खिलाफ गुस्सा व्यक्त कर रहा था। 

 

प्रारंभिक दौर और प्रारंभिक आंदोलन

19वीं सदी:

आधुनिक दलित आंदोलन की शुरुआत हुई, जिसमें ज्योतिबा फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की। 

 

1873:

सत्यशोधक समाज की स्थापना ने जाति-विरोधी भेदभाव के खिलाफ एक महत्वपूर्ण आंदोलन की शुरुआत की। 

 

1924:

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने दलितों को संगठित करने के लिए मराठी पाक्षिक बहिष्कृत भारत की शुरुआत की। 

 

आधुनिक दौर के आंदोलन

1972:

दलित पैंथर्स की स्थापना हुई, जो दलित युवाओं द्वारा शुरू किया गया एक उग्रवादी संगठन था और इसने संविधान लागू होने के बाद भी दलितों के साथ हो रहे भेदभाव और अमानवीय व्यवहार पर गुस्सा जाहिर किया। 

 

1956:

डॉ. अम्बेडकर के नेतृत्व में हुए दलित बौद्ध आंदोलन में, लाखों दलितों ने बौद्ध धर्म अपनाकर हिंदू धर्म और उसकी जाति व्यवस्था को चुनौती दी। 

 

1930s:

डॉ. अम्बेडकर और गांधी के बीच दलितों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की मांग को लेकर बहस हुई। 

 

1980s:

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के उदय के साथ दलित आंदोलन को राजनीतिक गति मिली। 

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