• मांगों की अनसुनी पर आशाओं ने छोड़ा काम, आज से अनिश्चितकालीन कार्य बहिष्कार।                               आमोद कुमार 
    बांदा। स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे निचली पायदान पर खड़ी होकर गांव-गांव तक सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की कड़ी जोड़ने वाली आशा कार्यकर्ताओं की आवाज अब आंदोलन में बदल गई है। लंबे समय से लंबित मांगों पर अपेक्षित कार्रवाई न होने से नाराज आशा एवं आशा संगिनियों ने 6 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन कार्य बहिष्कार का ऐलान किया है।
    मुख्य चिकित्सा अधिकारी को सौंपे ज्ञापन में संघ ने कहा कि उनकी मांगों को लेकर लगातार प्रयास किए जाते रहे, लेकिन आश्वासनों और इंतजार के बीच समाधान की राह अब भी दिखाई नहीं दी। ऐसे में कार्यकर्ताओं ने काम रोककर अपनी मांगों को शासन-प्रशासन तक पहुंचाने का फैसला किया है।
    संघ की प्रमुख मांगों में समान काम के लिए समान वेतन, स्थायीकरण, गृह जनपद स्थानांतरण और स्वास्थ्य बीमा शामिल हैं। तर्क यह है कि जब ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था का बड़ा हिस्सा इन कार्यकर्ताओं की सेवाओं पर टिका है, तो उनके श्रम और भविष्य की सुरक्षा का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
    संघ ने साफ चेतावनी दी है कि कार्य बहिष्कार के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं में किसी प्रकार की बाधा या व्यवधान उत्पन्न होता है तो उसकी जिम्मेदारी प्रशासन एवं उच्च प्रशासन की होगी।
    अब सवाल केवल आशा कार्यकर्ताओं की मांगों का नहीं, बल्कि उस स्वास्थ्य व्यवस्था का भी है जिसकी पहली दस्तक अक्सर गांव के दरवाजे पर इन्हीं कार्यकर्ताओं के रूप में पहुंचती है। देखना होगा कि सरकार उनकी आवाज सुनती है या आंदोलन को लंबा खिंचने देती है।

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