- बीमारी के हजार नाम हो सकते हैं. कैंसर, डायबिटीज, हृदय रोग, ब्लड प्रेशर, किडनी की बीमारी. हर बीमारी की अपनी जांच होती है, अपनी रिपोर्ट होती है, अपनी दवा होती है. डॉक्टर उसका नाम जानना चाहता है, क्योंकि सही नाम से सही इलाज तक पहुंचा जा सकता है. लेकिन स्वास्थ्य का कोई खास नाम नहीं होता. जब शरीर स्वस्थ होता है, तो दिल बस धड़कता है, फेफड़े बस सांस लेते हैं, पैर बस चलते हैं.
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- हमें स्वास्थ्य का पता अक्सर तब चलता है, जब उसमें कुछ बिगड़ जाता है. जो ठीक है, वह चुपचाप अपना काम करता रहता है. शायद जीवन की बहुत-सी सच्चाइयों का स्वभाव भी ऐसा ही है.
- अधर्म के बहुत रूप
- धर्म भी शायद कुछ ऐसा ही है. अधर्म के बहुत रूप हो सकते हैं. झूठ, हिंसा, लालच, घृणा, धोखा, अन्याय, अहंकार. बाहर से ये अलग दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर एक ही दिशा में जाते हैं. वे मनुष्य को उसकी सच्चाई से दूर ले जाते हैं. धर्म के भी अनेक नाम हैं. कोई उसे सत्य कहता है, कोई करुणा, कोई सेवा, कोई प्रेम, कोई न्याय और कोई अपना कर्तव्य. रास्ते अलग हो सकते हैं, प्रार्थनाएं अलग हो सकती हैं, भाषा अलग हो सकती है. लेकिन जब धर्म सचमुच जीवन में उतरता है, तो मनुष्य के भीतर कुछ बदलता है. वह थोड़ा कम कठोर होता है, थोड़ा अधिक जिम्मेदार होता है और दूसरे के दुख के लिए उसके भीतर थोड़ी अधिक जगह बनती है.
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- सत्य के नाम पर बहस
- यहीं एक बड़ी उलझन शुरू होती है. हमें चीजों को समझने के लिए नाम चाहिए, लेकिन धीरे-धीरे हम नाम को ही चीज समझने लगते हैं. हम सत्य के नाम पर बहस करते हैं, लेकिन सत्य बोलना भूल जाते हैं. हम करुणा की बात करते हैं, लेकिन सामने खड़े दुखी आदमी को देखने का समय नहीं होता. हम धर्म की रक्षा करते हैं, लेकिन अपने व्यवहार में उस धर्म को जगह नहीं देते. तब नाम बचा रहता है और आत्मा चली जाती है. शायद यही मनुष्य की सबसे पुरानी भूलों में से एक है. हम रास्ते की पूजा करने लगते हैं और यह देखना भूल जाते हैं कि उस रास्ते पर चलकर हम कहां पहुंच रहे हैं.
- अपने ऊपर एक छोटा-सा प्रयोग
- एक बार अपने ऊपर एक छोटा-सा प्रयोग किया जा सकता है. कुछ देर के लिए अपना नाम भूल जाइए. अपना पद भूल जाइए. अपना धर्म, अपनी जाति, अपनी उपलब्धियां, अपनी संपत्ति, अपनी पहचान सब एक तरफ रख दीजिए. फिर केवल यह देखिए कि आपके सामने कोई कमजोर व्यक्ति आता है तो आपके भीतर क्या होता है. कोई आपसे असहमत होता है तो आप कैसे बदलते हैं. कोई ऐसा व्यक्ति आपके सामने आता है, जिससे आपको कुछ मिलने वाला नहीं है, तब आप उसके साथ कैसा व्यवहार करते हैं. शायद वहीं हमारे धर्म की असली जांच होती है. मंदिर में नहीं, प्रार्थना में नहीं, घोषणा में नहीं, बल्कि उस क्षण में जब हमारे पास किसी दूसरे मनुष्य को छोटा समझने की पूरी शक्ति होती है और फिर भी हम उसे सम्मान देते हैं.
- कर्मों से मनुष्य की पहचान
- पुरानी बुद्धि ने अलग-अलग भाषाओं में एक ही बात कही है कि मनुष्य की पहचान उसके शब्दों से कम और उसके कर्मों से अधिक होती है. एक वृक्ष अपने बारे में कुछ नहीं कहता. उसका फल बता देता है कि वह क्या है. उसी तरह एक मनुष्य को भी बार-बार अपने बारे में बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिए. उसके आसपास के लोग धीरे-धीरे बता देते हैं कि उसके भीतर क्या है. उसके साथ रहने के बाद लोग थोड़े सुरक्षित महसूस करते हैं या थोड़े डरे हुए? उन्हें सम्मान मिलता है या अपमान? उन्हें अपने होने की जगह मिलती है या हर समय खुद को साबित करना पड़ता है? शायद यही वह आईना है जिससे हम अक्सर बचते हैं.
- ‘हम सच बोलना चुनते हैं’
- स्वास्थ्य भी अपना परिचय नहीं देता. वह बस शरीर को उसका काम करने देता है. धर्म भी शायद ऐसा ही है. वह अपना नाम लेकर दरवाजे पर खड़ा नहीं होता. वह किसी दूसरे के दुख को देखकर हमारे भीतर उठने वाली छोटी-सी करुणा में दिखाई देता है. वह उस क्षण दिखाई देता है जब हम झूठ बोलकर बच सकते थे, लेकिन सच बोलना चुनते हैं. वह तब दिखाई देता है जब बदला लेना आसान था, लेकिन हमने अपने भीतर की आग को आगे नहीं बढ़ाया. वह तब दिखाई देता है जब हमारे पास शक्ति थी, लेकिन हमने उसका इस्तेमाल किसी को दबाने के बजाय संभालने के लिए किया.
- शायद इसलिए जीवन की सबसे बड़ी चीजें अक्सर दिखाई नहीं देतीं. सांस का कोई धर्म नहीं होता. दिल की कोई जाति नहीं होती. सूरज की रोशनी किसी से उसकी पहचान नहीं पूछती. पानी किसी का नाम नहीं पूछता. और शायद सत्य भी अपना परिचय नहीं देता. वह बस सत्य होता है. तो फिर सवाल यह नहीं कि हमारा धर्म क्या कहलाता है. सवाल शायद यह है कि हमारे साथ रहने के बाद दूसरे इंसान के भीतर क्या बचता है और क्या वह चीज हमारे नाम से बड़ी है?
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