आमोद कुमार


आमोद कुमार 
बांदा। लगातार बारिश ने तिंदवारी-बबेरू मार्ग पर शिमौनी नाले को आफत का दरिया बना दिया है। पुलिया से करीब दो फीट ऊपर तेज बहाव के साथ पानी गुजर रहा है, जिससे आवागमन बाधित हो गया है। इसके बावजूद कुछ लोग मजबूरी में बाइक और पैदल नाला पार करने का जोखिम उठा रहे हैं। यहां सवाल सिर्फ रास्ता बंद होने का नहीं, हर कदम पर मंडराती जिंदगी के खतरे का है।सहीगा, बहिगा, शिमौनी, बहादुरपुर टोला, हरदौली समेत कई गांवों के लोगों के लिए यह मार्ग बांदा-बबेरू क्षेत्र से जुड़ने का महत्वपूर्ण रास्ता है। पानी बढ़ने से हजारों ग्रामीणों की आवाजाही प्रभावित है। स्कूली बच्चों, मरीजों, किसानों और रोज कमाकर खाने वाले मजदूरों की मुश्किलें सबसे ज्यादा बढ़ गई हैं।दो फीट पानी, फिर भी जोखिम से पीछे नहीं हट रहे लोग
नाले में पानी पुलिया के ऊपर से तेज धार के साथ बह रहा है। बावजूद इसके कुछ लोग बाइक लेकर अथवा पैदल इसे पार करने की कोशिश कर रहे हैं। तेज बहाव में एक छोटी-सी चूक जिंदगी भर का पछतावा बन सकती है। प्रशासन की ओर से भी ऐसे जलभराव और तेज बहाव वाले रास्तों पर लोगों को जोखिम न लेने की सलाह दी जाती है।रास्ता बंद तो 30 किलोमीटर का चक्कर
जो लोग अपनी जान जोखिम में डालने से बच रहे हैं, उन्हें बांदा होकर बबेरू पहुंचने के लिए करीब 25 से 30 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही है। इससे समय, ईंधन और रोजमर्रा के खर्च का बोझ बढ़ गया है।
ग्रामीणों का कहना है कि यह कोई पहली बरसात नहीं है। हर साल शिमौनी नाला उफनता है और पुलिया पानी में डूब जाती है। पुलिया की कम ऊंचाई के कारण बरसात के मौसम में दो से तीन महीने तक आवागमन प्रभावित रहता है।हर साल पानी बढ़ता है, मगर समाधान क्यों नहीं?
ग्रामीणों की पीड़ा का सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब समस्या हर वर्ष सामने आती है तो स्थायी समाधान अब तक क्यों नहीं निकला? क्या हर बरसात में रास्ता बंद होना और ग्रामीणों का लंबा चक्कर लगाना व्यवस्था की नियति बन चुका है?पानी हर साल अपनी सीमा बताता है, लेकिन पुलिया की ऊंचाई अब भी उसी सीमा पर खड़ी है। जरूरत सिर्फ चेतावनी देने की नहीं, बल्कि ऐसी स्थायी व्यवस्था की है जिससे बरसात में गांवों का संपर्क न टूटे और किसी ग्रामीण को रास्ते के लिए अपनी जान दांव पर न लगानी पड़े।

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