आमोद कुमार
बांदा। इतिहास केवल तारीखों का संग्रह नहीं होता, वह उन व्यक्तित्वों की जीवित स्मृति भी होता है जिन्होंने अपने संघर्ष, त्याग और सेवा से समाज की दिशा तय की। ऐसे ही एक जननायक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और "शेरे-ए-बुंदेलखंड" स्वर्गीय रामसनेही भारतीय के नाम पर ग्राम पंचायत पल्हरी में भव्य स्मृति द्वार बनाने की मांग अब राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर जोर पकड़ने लगी है।जनता दल (यूनाइटेड) उत्तर प्रदेश की प्रदेश उपाध्यक्ष एवं बुंदेलखंड प्रभारी शालिनी सिंह पटेल ने मंडलायुक्त चित्रकूटधाम मंडल के माध्यम से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ज्ञापन भेजकर यह मांग उठाई है कि पल्हरी के मुख्य प्रवेश मार्ग पर "स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, शिक्षाप्रेमी एवं शेरे-ए-बुंदेलखंड स्वर्गीय रामसनेही भारतीय स्मृति द्वार" का निर्माण कराया जाए।इतिहास को पहचान मिलनी चाहिए विकासखंड बबेरू की ग्राम पंचायत पल्हरी कोई सामान्य गांव नहीं है। यह वह धरती है, जहां से लगभग 13 से 14 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने देश की आजादी के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। इसी मिट्टी में जन्मे रामसनेही भारतीय ने न केवल अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया, बल्कि जेल यात्राएं भी कीं और स्वतंत्रता के बाद अपना पूरा जीवन किसानों, मजदूरों, गरीबों, दलितों और वंचित वर्गों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया।जनता के विश्वास का प्रमाण यह भी है कि वे बबेरू विधानसभा से दो बार विधायक और तीन बार जिला परिषद अध्यक्ष चुने गए। शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान भी उल्लेखनीय रहा। उन्होंने ग्रामीण अंचलों में शिक्षा की अलख जगाकर हजारों युवाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
लेकिन सवाल यह है...
जिस गांव ने रामसनेही भारतीय, कैप्टन बद्री प्रसाद, राम शिरोमणि वर्मा और स्वर्गीय के.के. भारतीय जैसे जनप्रतिनिधि और स्वतंत्रता सेनानी देश को दिए, क्या वहां उनकी स्मृति को संरक्षित करने वाला एक भव्य प्रतीक भी नहीं होना चाहिए?क्या हम अपने नायकों को केवल भाषणों और पुण्यतिथियों तक सीमित रखना चाहते हैं, या फिर उनकी विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए स्थायी स्मारक भी बनाएंगे?पल्हरी केवल एक गांव नहीं, बल्कि संघर्ष की वह पाठशाला है, जहां आजादी के सपनों ने जन्म लिया था। वहां का हर रास्ता, हर चौपाल और हर आंगन उन लोगों की कहानी कहता है, जिन्होंने अपने निजी सुखों को त्यागकर समाज और राष्ट्र के लिए जीवन समर्पित कर दिया।रामसनेही भारतीय केवल एक नाम नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की उस जिद का प्रतीक हैं, जो अन्याय के सामने झुकती नहीं और समाज के कमजोर वर्गों को साथ लेकर चलती है।एक स्मृति द्वार केवल ईंट और पत्थरों का ढांचा नहीं होता। वह इतिहास का प्रहरी होता है, जो आने वाली पीढ़ियों से कहता है"यह वह धरती है, जहां ऐसे लोग पैदा हुए थे जिन्होंने सत्ता नहीं, समाज को अपना धर्म माना था।"यदि यह मांग स्वीकार होती है, तो यह केवल एक व्यक्ति को सम्मान नहीं होगा, बल्कि बांदा और बुंदेलखंड की स्वतंत्रता संग्राम की गौरवशाली विरासत को सहेजने की दिशा में एक सार्थक और ऐतिहासिक कदम होगा।
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