जौनपुर उत्तर प्रदेश पुलिस आरक्षी भर्ती परीक्षा" के दृष्टिगत परीक्षा की निष्पक्षता, पारदर्शिता एवं सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित
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भारतीय मनीषा और अवधारणाओं को सहज प्रासंगिक रूप से शिक्षा में शामिल करना होगा कि वे अतिरिक्त भार न बनकर हमारी आवश्यकताओं एवं चुनौतियों का सामना करने में हमें समर्थ बना सकें।
गिरीश्वर मिश्र। देश में रह-रहकर बौद्धिक वर्ग में डीकोलोनाइजेशन यानी वि-उपनिवेशीकरण की चर्चा छिड़ती रहती है, लेकिन वह किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाती। यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि जब भी वि-उपनिवेशीकरण की मुहिम छिड़े तो उसका आधार भी भारतीय होना चाहिए। हमें इस तथ्य को पहचान कर भारत में समकालीन उच्च शिक्षण संस्थानों और उनके उत्पादों, अनुसंधान प्रयासों एवं स्नातकों के लिए पाठ्यक्रम तैयार करना ही प्राथमिकता होनी चाहिए। इस संदर्भ में देखा जाए तो उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम को नवाचारों के माध्यम से सजीव करने की आवश्यकता तो बहुत दिनों से महसूस की जाती रही है, परंतु कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका। यह प्रवृत्ति देशज विकास के प्रयासों में सदैव बाधक ही रहेगी। स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों बाद भी देश की शैक्षणिक प्रणाली पर औपनिवेशिक पकड़ को समाप्त करना एक कठिन कार्य सिद्ध हो रहा है।
वर्तमान में कई भारतीय संस्थानों के पाठ्यक्रम भारतीय परिप्रेक्ष्य की वास्तविकताओं या इसकी समस्याओं के ज्ञान को पूरी तरह से प्रतिबिंबित नहीं करते। उच्च संस्थानों की प्रणालियों में भारतीय ज्ञान के वि-उपनिवेशीकरण के प्रयासों को तभी स्पष्ट और सक्रिय रूप से समर्थन दिया जा सकेगा, जब छात्रों को यह सिखाया जाए कि मौलिकता की राह पर कैसे चलें? उन्हें भारतीय परिस्थितियों के लिए विशेष और विशिष्ट समाधान की दिशा में सोचने के लिए भी शिक्षित करना होगा। भारतीय ज्ञान की वर्तमान व्यवस्था के वि-उपनिवेशीकरण से ही पूर्ण स्वराज की प्राप्ति संभव हो सकेगी। अब नवोन्मेषी विचारों और कार्यक्रमों की शुरुआत करने से पहले सोचने के लिए ज्ञान मीमांसकीय रूप से स्वतंत्र होना होगा। ज्ञान मीमांसकीय मुक्ति मानसिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक स्वतंत्रता को जन्म देती है।
शिक्षा के उच्च संस्थानों ने भारतीय विचार-दृष्टि की गतिशीलता पर अपनी पकड़ खो दी है। इसका एक विशेष कारण है ज्ञान को समायोजित करने के लिए भारतीय भाषाओं को विकसित करने में विफलता। आज भी अंग्रेजी प्रामाणिक भाषा है और ज्ञान की दुनिया में उसी का वर्चस्व है। मन में हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं में सोचते हुए उन विचारों को अंग्रेजी में उल्था कर प्रस्तुत करना समयसाध्य ही नहीं, बहुधा निष्प्रभावी एवं अप्रामाणिक भी सिद्ध होता है। मौलिक सोच का अवसर इसलिए भी जाता रहता है कि हम अपने विचार और उसकी कोटियां विदेश से आयातित किए हुए हैं और उसमें ‘फिट’ किए बगैर सोचने-विचारने की प्रक्रिया ही नहीं शुरू हो पाती है।
अपने शिक्षण संस्थानों में होने वाले बौद्धिक प्रयासों, शिक्षण प्रक्रिया और अनुसंधान में भारतीय भाषाओं को संस्थागत रूप से न अपना पाना मौलिकता के रास्ते में एक बहुत बड़ा रोड़ा है। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि कई देश जो तकनीकी प्रगति में छलांग लगा रहे हैं, आविष्कारों में प्रगति कर रहे हैं और अकादमिक उत्कृष्टता की सीमाओं को तोड़ रहे हैं, वे ही देश हैं जिन्होंने अपने शैक्षिक पाठ्यक्रम को अपने अनुसार अनुकूलित एवं विकसित किया है। दुर्भाग्य से हमने अपने सोच को उन सीमाओं के भीतर ही सीमित करके बांध लिया है, जो पश्चिमी शिक्षा से विरासत के रूप में हमें मिला। साथ ही हम व्यावहारिक और उपयोगी विकल्प खोजने के लिए पर्याप्त उत्सुक भी नहीं हैं। चाहे जो भी हो, यूरोकेंद्रित ज्ञान माडल में डूबे रहने से हमारे विचारों का उपनिवेशीकरण लगातार बढ़ता रहा है और यह हमेशा देशज विकास के उन प्रयासों में बाधा भी उत्पन्न कर रहा है, जो आत्मनिर्भर देश की जरूरत है।
भारतीय संस्कृति के संरक्षण और समकालीन अनुसंधान और वैचारिक वास्तविकताओं में उन विचारों एवं सिद्धांतों के समावेश के अलावा, भारतीय विश्वविद्यालयों को भारतीय प्रतिभा और ज्ञान मीमांसा को ईमानदारी से चित्रित करने के लिए मौजूदा पाठ्यक्रमों और शैक्षिक कार्यक्रमों का सुनियोजित विस्तार करना होगा। तभी वे देश को सक्षम और तत्पर बनने में कामयाब हो सकेंगे। हमारे पाठ्यक्रम और उनकी मूल्यांकन पद्धति भारतीय विश्वदृष्टि के पीछे छिपे तर्क और उनकी समीक्षा पर प्रश्न पूछने और उनका विस्तार करने में सक्षम होने चाहिए। ये पाठ्यक्रम छात्रों और लोगों की रुचि को इस तरह से आकर्षित करने वाले होने चाहिए, जो भारतीय ज्ञान परंपरा से चुनकर नाम गिनाने की कवायद की औपचारिकताएं मात्र न निभा रहे हों, बल्कि उनके माध्यम से सोचने के लिए प्रेरित हों।
इस दिशा में आवश्यक है कि वे स्वयं अपनी और राष्ट्रीय चेतना का आह्वान भी कर सकें। भारतीय मनीषा और अवधारणाओं को सहज प्रासंगिक रूप से शिक्षा में शामिल करना होगा कि वे अतिरिक्त भार न बनकर हमारी आवश्यकताओं एवं चुनौतियों का सामना करने में हमें समर्थ बना सकें। इसलिए, उच्च शिक्षा पाठ्यक्रम में नए विचारों के समन्वय और संयोजन के माध्यम से प्राणवान बनाकर नई जान फूंकना आवश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य हो चला है। वैश्वीकरण के इस दौर में ऐसे कदम उठाने इसलिए भी जरूरी हैं, क्योंकि वे ऐसी वैचारिक संरचनाओं को नया आकार देने में सहायक होंगे जो संरचनाएं वैश्विक ज्ञान समुदाय में भारतीयों की स्थिति को बेहतर बना सकेंगी।
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जौनपुर उत्तर प्रदेश पुलिस आरक्षी भर्ती परीक्षा" के दृष्टिगत परीक्षा की निष्पक्षता, पारदर्शिता एवं सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित
राजेश कुमार सिद्धार्थ
छत्तीसगढ़ जिला इकाई जांजगीर-चांपा द्वारा सतनाम भवन, शिवरीनारायण में आयोजित जिला स्तरीय कार्यकर्ता सम्मेलन एवं सम्मान समारोह उत्साहपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में जिले सहित विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में
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