ब्यूरो चीफ रोमेद्र कुमार सोनवानी बालोद जिला


होली पर सभ्यता की औपचारिकता गई तेल लेने, हमें तो अपनी मस्ती-खोरी ही प्यारी है
आजकल के लड़के सफ़ेद कुर्ते पहनकर, गाल पर दो उंगली गुलाल मलते हैं और हैप्पी होली की सेल्फी डालकर समझते हैं कि जंग जीत ली. अरे, इन्हें क्या पता कि असली होली तो वो थी जब 25 साल पहले हम रेहची में विनाशकारी मोड में होते थे. एक महीना पहले से ही ऑपरेशन खूंटा चोरी चालू हो जाता था. रात के अंधेरे में बैलगाड़ियों से लकड़ियां पार करना किसी एडवेंचर फिल्म से कम नहीं था. मोहल्ले के सभी दोस्त जब जुटते थे, तो पूरा इलाका जानता था कि इस बार होली की लपटें आसमान छुएंगी. वह दौर चंग की थाप और आल्हा के सुरों से गुंजायमान रहता था. भागीरथी फाग गाते, तो पांव खुद-ब-खुद थिरकने लगते. वो पुराने फव्वारे, जिनके छर्रे हम हफ्ता भर पहले तेल डालकर चमकाते थे, आज की प्लास्टिक की बंदूकों से लाख गुना बेहतर थे. और वो कुंए के सामने , पहले दिन साफ किया गया बड़ा हौदा ( पानी की टंकी ) ! सुबह जो भी उसकी शामत आई. उसे पकड़कर टंकी में ऐसा जल-समाधि देते थे कि बंदा अपना नाम-पता तक भूल जाए. पकड़ने-धकेलने और हुड़दंग करने में जो मर्यादाएं टूटती थीं, वही तो असली भाईचारा था. भाभी लोग छुपती फिरती थीं, पर मजाल है कि कोई बच जाए! फिर भंग की तरंग में गोता लगा , साइकिलों पर लदकर , नहाने के लिये , शिवनाथ नदी की तरफ कूच करना और रास्ते भर बेतहाशा गाली-गलौज और माशूकों के किस्से... उफ़! वो अलौकिक आनंद था. जिसने वो गालियां, वो मस्ती और वो कीचड़ नहीं झेला, वो आज का “सभ्य जवान” होली की तासीर क्या समझेगा? जिसने कभी अपनी सभ्यता को ताक पर रखकर मस्ती नहीं की, उसने सच्ची की होली खेली ही नहीं !
????HAPPY HOLI????

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