शालिनी सिंह पटेल ने प्रशासनिक उदासीनता पर उठाए तीखे सवाल
बांदा जनपद के मुरवल गांव में 10 वर्षीय मासूम सतवीर उर्फ सतु की हत्या को ग्यारह दिन बीत चुके हैं। समय का यह अंतराल मात्र दिनों की गिनती नहीं, एक गरीब परिवार के हृदय पर प्रतिदिन पड़ने वाली पीड़ा की पुनरावृत्ति है। वही प्रश्न बार-बार उठता है—आखिर न्याय की राह इतनी लंबी क्यों है?जनता दल यूनाइटेड की प्रदेश उपाध्यक्ष एवं बुंदेलखंड प्रभारी शालिनी सिंह पटेल के नेतृत्व में पार्टी का प्रतिनिधिमंडल आज पीड़ित परिवार के द्वार पहुँचा। आँगन में पसरा सन्नाटा, दीवारों पर जमे मौन और माँ कमलेश की बिलखती आंखें—सबकुछ इस कुंठित व्यवस्था की कहानी स्वयं कह रहा था। एक गरीब मजदूर परिवार का सहारा छिन गया, और प्रशासनिक तंत्र मानो अपने उत्तरदायित्व से दृष्टि चुरा रहा हो।जब प्रतिनिधिमंडल ने फोन पर अपर पुलिस अधीक्षक, बांदा से अब तक की कार्रवाई पूछी, तो जवाब औपचारिकताओं के बोझ तले दबा हुआ मिला—न गर्मजोशी, न तत्परता, न न्याय दिलाने की वह संवेदनशीलता जिसकी अपेक्षा जनता अपने संरक्षकों से करती है।
यहीं से प्रश्न उपजता है—
क्या कानून का दरवाज़ा सबके लिए समान वेग से खुलता है?
या आर्थिक-सामाजिक हैसियत उसके किवाड़ों को धकेलने की क्षमता प्रदान करती है?
शालिनी सिंह पटेल का वक्तव्य इस विडंबना को और स्पष्ट करता है“यदि यही बच्चा किसी बड़े अधिकारी या प्रतिष्ठित परिवार का होता, तो गिरफ्तारी चौबीस घंटे में होती, प्रशासनिक अमला सक्रिय हो जाता,जनप्रतिनिधियों की कारों का काफिला गांव में उतर आता। पर यह बच्चा एक गरीब मजदूर का बेटा था—इसलिए न्याय की चाल धीमी पड़ गई। क्या अब न्याय भी हैसियत देखकर प्रदान किया जाएगा?”कानून की दृष्टि भले सबको समान कहती हो, पर व्यवहार में हुई यह देरी व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। एक मासूम की हत्या केवल अपराध नहीं, समाज की सामूहिक चेतना पर लगा धब्बा है। और ग्यारह दिनों की निष्क्रियता इस धब्बे को और गहरा करती जाती है।
शालिनी सिंह पटेल ने स्पष्ट कहा“जनता दल यूनाइटेड मासूम सतवीर के न्याय के लिए अडिग रहेगा। जब तक दोषियों को पकड़कर न्याय की नींव मजबूत नहीं होती, हम अपनी आवाज़ थामेंगे नहीं।”न्याय की कसौटी यही है—कि वह समय पर, निष्पक्ष और निर्भीक होकर दिया जाए।
कहीं ऐसा न हो कि देर का अंधेरा न्याय की रोशनी को ही निगल जाए।
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