अभिनव सांस्कृतिक संगठन के तत्वावधान में पहली जनवरी को अपने 48वें स्थापना दिवस पर कार्यालय कालादांडा प्रयागराज में रंगमंच की गंगा – कितनी पावन, कितनी पतित विषय पर एक विचारोत्तेजक गोष्ठी का आयोजन सम्पन्न हुआ।


 उत्तर प्रदेश
प्रयागराज। अभिनव सांस्कृतिक संगठन के तत्वावधान में पहली जनवरी को अपने 48वें स्थापना दिवस पर कार्यालय कालादांडा प्रयागराज में रंगमंच की गंगा – कितनी पावन, कितनी पतित विषय पर एक विचारोत्तेजक गोष्ठी का आयोजन सम्पन्न हुआ। गोष्ठी में रंगमंच की वर्तमान स्थिति, उसकी वैचारिक शुचिता, सामाजिक दायित्व और समकालीन चुनौतियों पर गंभीर विमर्श किया गया।
    गोष्ठी में प्रख्यात अन्तर्राष्ट्रीय चित्रकार रवीन्द्र कुशवाहा ने रंगमंच की तुलना गंगा के प्रवाह से करते हुए कहा कि इसमें पवित्रता अत्यधिक और विकृतियाँ कम हैं थोड़ी सावधानी बरती जाए तो विकृतियां खत्म हो सकती हैं। वरिष्ठ निर्देशक अजय मुखर्जी ने रंगमंच की सामाजिक प्रतिबद्धता पर बल देते हुए कहा कि रंगकर्म तभी सार्थक है जब वह जनसरोकारों से जुड़ा रहे। वरिष्ठ रंगकर्मी सुबोध सिंह, गुरुविंदर सिंह तथा राकेश वर्मा ने समकालीन रंगमंच में व्यावसायिक दबाव, मौलिकता के संकट और दर्शक-संवेदना पर अपने विचार रखे। वक्ताओं ने चिंता व्यक्त की कि आज रंगमंच को अपनी पावन परंपरा और वैचारिक गरिमा को बनाए रखने के लिए निरंतर संघर्ष करना पड़ रहा है।
कार्यक्रम में ऋचा शुक्ला, समृद्धि गौड़, शादमा खातून, अभिषेक सिंह रेडियो कम्पेयर एवं रंगकर्मी तथा प्रमिल अस्थाना अभिनव के प्रथम सचिव, अजय मुखर्जी विनोद रस्तोगी संस्थान से, आलोक नगर द थर्ड बेल संस्था से, राकेश वर्मा समयांतर संस्था से, अभिनव संस्था की वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रतिमा श्रीवास्तव तथा संस्थापक सचिव प्रवीण अस्थाना सहित प्रयागराज के अनेक महत्वपूर्ण और सक्रिय रंगकर्मियों की उल्लेखनीय व्याख्यान रहे। गोष्ठी के दौरान खुली चर्चा में युवा कलाकारों ने भी सक्रिय सहभागिता की। गोष्ठी का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि रंगमंच की गंगा को वैचारिक रूप से निर्मल, सामाजिक रूप से प्रासंगिक और सृजनात्मक रूप से जीवंत बनाए रखने के लिए सामूहिक प्रयास किए जाएंगे। भूपेंद्र कुमार ब्यूरो प्रयागराज 
अब तक न्याय

 

उत्तर प्रदेश
प्रयागराज। अभिनव सांस्कृतिक संगठन के तत्वावधान में पहली जनवरी को अपने 48वें स्थापना दिवस पर कार्यालय कालादांडा प्रयागराज में रंगमंच की गंगा – कितनी पावन, कितनी पतित विषय पर एक विचारोत्तेजक गोष्ठी का आयोजन सम्पन्न हुआ। गोष्ठी में रंगमंच की वर्तमान स्थिति, उसकी वैचारिक शुचिता, सामाजिक दायित्व और समकालीन चुनौतियों पर गंभीर विमर्श किया गया।
    गोष्ठी में प्रख्यात अन्तर्राष्ट्रीय चित्रकार रवीन्द्र कुशवाहा ने रंगमंच की तुलना गंगा के प्रवाह से करते हुए कहा कि इसमें पवित्रता अत्यधिक और विकृतियाँ कम हैं थोड़ी सावधानी बरती जाए तो विकृतियां खत्म हो सकती हैं। वरिष्ठ निर्देशक अजय मुखर्जी ने रंगमंच की सामाजिक प्रतिबद्धता पर बल देते हुए कहा कि रंगकर्म तभी सार्थक है जब वह जनसरोकारों से जुड़ा रहे। वरिष्ठ रंगकर्मी सुबोध सिंह, गुरुविंदर सिंह तथा राकेश वर्मा ने समकालीन रंगमंच में व्यावसायिक दबाव, मौलिकता के संकट और दर्शक-संवेदना पर अपने विचार रखे। वक्ताओं ने चिंता व्यक्त की कि आज रंगमंच को अपनी पावन परंपरा और वैचारिक गरिमा को बनाए रखने के लिए निरंतर संघर्ष करना पड़ रहा है।
कार्यक्रम में ऋचा शुक्ला, समृद्धि गौड़, शादमा खातून, अभिषेक सिंह रेडियो कम्पेयर एवं रंगकर्मी तथा प्रमिल अस्थाना अभिनव के प्रथम सचिव, अजय मुखर्जी विनोद रस्तोगी संस्थान से, आलोक नगर द थर्ड बेल संस्था से, राकेश वर्मा समयांतर संस्था से, अभिनव संस्था की वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रतिमा श्रीवास्तव तथा संस्थापक सचिव प्रवीण अस्थाना सहित प्रयागराज के अनेक महत्वपूर्ण और सक्रिय रंगकर्मियों की उल्लेखनीय व्याख्यान रहे। गोष्ठी के दौरान खुली चर्चा में युवा कलाकारों ने भी सक्रिय सहभागिता की। गोष्ठी का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि रंगमंच की गंगा को वैचारिक रूप से निर्मल, सामाजिक रूप से प्रासंगिक और सृजनात्मक रूप से जीवंत बनाए रखने के लिए सामूहिक प्रयास किए जाएंगे। भूपेंद्र कुमार ब्यूरो प्रयागराज 
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