संवाददाता - मंडल ब्यूरो चीफ राजीव कुमार सिंह सिकरवार आगरा उत्तर प्रदेश खेत में मेहनत, खाते में सन्नाटा —2025 में किसान आखिर कहाँ फँस गया? 2025 किसानों के लिए एक ऐसा साल बनकर सामने आया जिसमें राहत की घोषणाएँ तो हुईं, लेकिन ज़मीन पर उनका असर असमान और अधूरा रहा। खेतों में मेहनत करने वा


संवाददाता - मंडल ब्यूरो चीफ 
राजीव कुमार सिंह सिकरवार 
 आगरा उत्तर प्रदेश

खेत में मेहनत, खाते में सन्नाटा —2025 में किसान आखिर कहाँ फँस गया?

2025 किसानों के लिए एक ऐसा साल बनकर सामने आया जिसमें राहत की घोषणाएँ तो हुईं, लेकिन ज़मीन पर उनका असर असमान और अधूरा रहा। खेतों में मेहनत करने वाला किसान मौसम की मार, प्रशासनिक प्रक्रियाओं, तकनीकी शर्तों और बाज़ार की अनिश्चितताओं के बीच उलझा रहा। सरकारी योजनाएँ मौजूद थीं, लेकिन उनके लाभ तक पहुँचने का रास्ता कई बार उतना ही कठिन निकला जितनी खुद खेती।

सरकारी सहायता और अनुदान: नाम सूची में, पैसा प्रतीक्षा में*
इस वर्ष किसान सहायता का सबसे बड़ा माध्यम प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण आधारित योजनाएँ रहीं। सम्मान निधि, बीमा और यंत्रीकरण अनुदान जैसे कार्यक्रम काग़ज़ों में सक्रिय दिखे, लेकिन बड़ी संख्या में किसान सत्यापन, ई-केवाईसी, भूमि अभिलेख और बैंक लिंकिंग जैसी तकनीकी शर्तों के कारण लाभ से वंचित रह गए। सहायता “मौजूद” थी, पर हर किसान तक “पहुँची” नहीं—यही 2025 की सबसे बड़ी विडंबना रही।

मौसम की मार: फसल खड़ी भीगी, कटाई के बाद भी नुकसान,

इस साल मौसम ने खेती की लय कई बार बिगाड़ी। कहीं बेमौसम बारिश ने गेहूं और धान को नुकसान पहुँचाया, तो कहीं कटाई के बाद खेत में पड़ी फसल भीगकर खराब हुई। किसान के लिए यह दोहरी चोट थी—पहले मेहनत की अनिश्चितता और फिर मुआवजे की शर्तों में उलझन। कई मामलों में नुकसान वास्तविक था, लेकिन राहत के दायरे में आना कठिन।

मुआवजा और प्रशासनिक पहल: सर्वे हुए, संतोष अधूरा,

प्रशासन की ओर से नुकसान के आकलन के लिए टीमें भेजी गईं, रिपोर्टें बनीं और पोर्टल पर प्रविष्टियाँ भी हुईं। लेकिन मुआवजा आपदा की श्रेणी, नुकसान के प्रतिशत और समयसीमा से बंधा रहा। जिन किसानों की फसल 33 प्रतिशत से कम आंकी गई, या जिनका नुकसान कटाई के बाद हुआ—उनके लिए राहत अक्सर सवाल बनकर रह गई।

कृषि विभाग और किसान: संवाद रहा, भरोसा डगमगाया,
कृषि विभाग ने बीमा, सलाह और योजनाओं के लिए संवाद किया, शिविर लगे और अपीलें जारी हुईं। पर किसान के अनुभव में यह तालमेल कई बार निर्देशात्मक और लक्ष्य-आधारित लगा। किसान यह महसूस करता रहा कि यदि वह किसी तकनीकी चरण में चूका, तो पूरी सहायता रुक सकती है।

पंचायत स्तर पर खाद आपूर्ति और कालाबाजारी के आरोप*
खाद की उपलब्धता 2025 में भी एक संवेदनशील मुद्दा बनी रही। पंचायत और विक्रेता स्तर पर शिकायतें सामने आईं। प्रशासन ने जांच कर कुछ मामलों में लाइसेंस निरस्तीकरण जैसी कार्रवाई की, जिससे संदेश तो गया, लेकिन किसानों के मन में यह सवाल बना रहा कि क्या अगली बुआई में खाद समय पर और सही दाम पर मिलेगी?
किसानों की अन्य समस्याएँ: लागत, बाज़ार और भविष्य की चिंता,
खेती की लागत बढ़ती गई—बीज, खाद, डीज़ल, मजदूरी सब महँगे हुए। बाज़ार में दाम की अनिश्चितता और भंडारण की कमी ने जोखिम और बढ़ाया। कुछ किसान नई फसलों और बागवानी की ओर बढ़े, लेकिन सहायक ढाँचा अभी उतना मज़बूत नहीं बन सका।

राहत की उम्मीद, लेकिन भरोसे की कमी,
2025 किसानों के लिए पूरी तरह निराशाजनक नहीं था, लेकिन भरोसा पैदा करने वाला भी नहीं बन सका। योजनाएँ थीं, कार्रवाई भी दिखी, पर किसान का अनुभव यही रहा कि मेहनत खेत में होती है और संघर्ष दफ़्तरों में। साल के अंत में किसान के पास कुछ सहायता की रसीदें हैं—और उससे कहीं ज़्यादा सवाल।

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