जब कुर्सियाँ बिकने लगें, तो सिस्टम जनता की नहीं—अपने खरीदारों की सेवा करता है


इंदौर में न्यूज़ 24 के पत्रकार हेमंत शर्मा और उनके कैमरा मैन पर आरटीओ कार्यालय के भीतर हुआ हमला किसी अचानक भड़की हुई वारदात का परिणाम नहीं था। यह उस लंबे समय से सड़ रहे सिस्टम की गंध है, जिसकी बदबू पर चमक-दमक की चादर डालकर शहर को “स्वच्छ” बताने की कोशिश की जाती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ सड़कें साफ होने से शहर स्वच्छ कहलाता है? क्या सरकारी दफ्तरों में पसरा भ्रष्टाचार स्वच्छता की परिभाषा से बाहर है?

आरटीओ दफ्तर में व्याप्त खुली दलाली, वसूली और भ्रष्टाचार को हेमंत शर्मा ने स्टिंग ऑपरेशन में सार्वजनिक किया था। यही सच कुछ लोगों को चुभ गया। और यही कारण है कि दफ्तर के अंदर ही पत्रकार पर हमला कर दिया गया, कैमरा तोड़ दिया गया, ताकि सच दुनिया तक न पहुंचे। पर कैमरा तोड़ने से सच नहीं टूटता—सच टूटता तब है जब सिस्टम डर के आगे झुक जाए।

पर असल सवाल इससे भी बड़ा है—
यह गुंडागर्दी करने की हिम्मत इन लोगों को मिलती कहाँ से है?
और जवाब बिल्कुल सीधा है—
जहाँ पोस्टिंग पैसे से होती है, वहाँ सिस्टम जनता की नहीं, अपने “खरीदारों” की सेवा करता है।

जब कोई अधिकारी अपनी कुर्सी “योग्यता” से नहीं, बल्कि “रक़म” से हासिल करता है, तो वह जनता की समस्याएँ सुलझाने नहीं बैठता—
वह सिर्फ अपने खर्चे निकालने बैठता है।

इसीलिए दफ्तर “सर्विस सेंटर” नहीं रहते,
वसूली केंद्र बन जाते हैं।
इसीलिए दलाल फलते-फूलते हैं।
इसीलिए भ्रष्टाचार फाइलों में सुरक्षित रहता है।
इसीलिए पत्रकारों को पीटा जाता है।
इसीलिए सच बोलना अपराध बन जाता है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह सब उसी इंदौर में हो रहा है, जिसे जनता ने हाल ही में 9 की 9 सीटें भाजपा को सौंपकर सत्ता पर पूरा भरोसा दिया था। दो कैबिनेट मंत्री स्वयं इसी शहर से हैं—और ठीक इसी शहर में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला हो जाता है। क्या यह घटना अकेली है, या सरकार की नाक के नीचे पल रहे उन संरक्षित तत्वों की निशानी है जो सत्य उजागर होने से घबराते हैं?

यह हमला गुंडों का नहीं,
सत्ता से संरक्षित सिस्टम की हिम्मत का हमला था।

और यही वह बिंदु है जहां सवाल सरकार से भी उठते हैं—
अगर सरकारी दफ्तरों में पत्रकारों को पीटा जाता है,
अगर दलाल दफ्तरों में कब्ज़ा जमाए बैठे हैं,
अगर भ्रष्टाचार उजागर करने वाले ही अपराधी बना दिए जाते हैं,

तो फिर यह सरकार किसके लिए काम कर रही है?
जनता के लिए?
या उन लोगों के लिए जिन्होंने पोस्टिंग और संरक्षण के नाम पर सिस्टम को गिरवी रख दिया है?

इंदौर का यह हमला सिर्फ एक पत्रकार पर नहीं था—
यह जनता की आवाज़ पर वार था।
यह पारदर्शिता पर हमला था।
यह उन सभी पर प्रहार था जो सच को बचाए रखने की कोशिश करते हैं।

और अब सवाल शहर पूछ रहा है—
जब पोस्टिंग बिक रही है, जब दफ्तर वसूली केंद्र बन चुके हैं, जब गुंडे सरकारी दफ्तरों में ही “राज” करते हैं — तब ईमानदारी की उम्मीद किससे की जाए?

इंदौर की सड़कों को साफ कर देने से शहर स्वच्छ नहीं होगा।
सिस्टम की सफाई करनी होगी।
वरना भ्रष्टाचार की इस गंदगी में अगला निशाना कौन होगा—
यह किसी को पता नहीं।

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