भारत के 53वें CJI बने जस्टिस सूर्यकांत: खेतों की मड़ाई से सुप्रीम कोर्ट की सर्वोच्च कुर्सी तक का अद्भुत सफर देश की राजधानी दिल्ली से लगभग 136 किलोमीटर दूर, हरियाणा के हिसार जिले का छोटा-सा गांव पेटवाड़—जहाँ से एक इतिहास लिखा जाना था। तपती दोपहर थी। खेत में गेहूं की मड़ाई चल रही थी। धूप की


भारत के 53वें CJI बने जस्टिस सूर्यकांत: खेतों की मड़ाई से सुप्रीम कोर्ट की सर्वोच्च कुर्सी तक का अद्भुत सफर

देश की राजधानी दिल्ली से लगभग 136 किलोमीटर दूर, हरियाणा के हिसार जिले का छोटा-सा गांव पेटवाड़—जहाँ से एक इतिहास लिखा जाना था। तपती दोपहर थी। खेत में गेहूं की मड़ाई चल रही थी। धूप की तीखी तपिश में पसीने से भीगा एक दुबला-पतला किशोर अपने भाइयों संग थ्रेशर मशीन पर काम कर रहा था। अचानक उसने मशीन रोक दी, आसमान की ओर देखा और तेज आवाज में कहा—“मैं अपनी जिंदगी बदल दूंगा।”

वह लड़का बस मैट्रिक पास था, सरकारी स्कूल में बोरी पर बैठकर पढ़ने वाला एक साधारण छात्र। किसी को यह कल्पना भी नहीं थी कि यही किशोर आगे चलकर भारतीय न्यायपालिका का चेहरा बनेगा और सर्वोच्च अदालत का नेतृत्व करेगा। उस बच्चे का नाम था—सूर्यकांत

आज वही सूर्यकांत भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) के रूप में शपथ लेकर देश की न्यायिक व्यवस्था की बागडोर संभाल चुके हैं।
जस्टिस सूर्यकांत 24 नवंबर 2025 से 9 फरवरी 2027 तक—लगभग 15 महीनों तक—सुप्रीम कोर्ट का नेतृत्व करेंगे।

गांव की मिट्टी से मिली सादगी, संघर्ष और मेहनत की सीख ने सूर्यकांत को असाधारण ऊँचाइयों तक पहुँचाया। बोरी पर बैठकर पढ़ने वाला ग्रामीण बालक आज संविधान की रक्षा और न्याय के वितरण का सर्वोच्च दायित्व निभा रहा है। उनका सफर उन अनगिनत युवाओं के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों में भी बड़े सपने देखने का साहस रखते हैं।भारत के 53वें CJI बने जस्टिस सूर्यकांत: हरियाणा के एक छोटे से गांव से सुप्रीम कोर्ट तक का प्रेरणादायक सफर

धूप की तपिश से भरा खेत, थ्रेशर मशीन की तेज आवाज, और पसीने से तरबतर एक दुबला-पतला किशोर—यह वही क्षण था जब हरियाणा के हिसार जिले के छोटे से गांव पेटवाड़ के इस बालक ने आकाश की ओर देखते हुए संकल्प लिया था—“मैं अपनी जिंदगी बदल दूंगा।” उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यही किशोर आगे चलकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय का 53वाँ प्रधान न्यायाधीश बनेगा। लेकिन दृढ़ निश्चय, कड़ी मेहनत और पारिवारिक मूल्यों ने सूर्यकांत को उस मुकाम तक पहुंचाया, जहां पहुंचना किसी साधारण व्यक्ति के लिए असाधारण उपलब्धि होती है।

गांव की मिट्टी से मिली सादगी और संघर्ष की सीख

साधारण किसान परिवार में जन्मे सूर्यकांत बचपन से ही मेहनत और जिम्मेदारी से परिचित थे। खेतों का काम, पढ़ाई के लिए सीमित साधन और गांव का सरल जीवन—इन सबने उनके व्यक्तित्व में धैर्य, संघर्ष क्षमता और ईमानदारी का अनोखा संयोजन विकसित किया। आर्थिक परिस्थितियाँ बहुत मजबूत नहीं थीं, लेकिन परिवार ने शिक्षा को हमेशा प्राथमिकता दी। यही कारण है कि सूर्यकांत ने कम साधनों में भी पढ़ाई जारी रखी और धीरे-धीरे एक मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि बनाई।

कानून की पढ़ाई और वकालत का सफर

सूर्यकांत ने हिसार से प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद कानून की पढ़ाई की। कॉलेज के समय से ही उन्होंने संविधान, न्याय व्यवस्था और सामाजिक मुद्दों को गहराई से समझना शुरू किया। उनकी वाकपटुता, तर्क क्षमता और मेहनत ने जल्द ही उन्हें युवाओं में एक तेज-तर्रार अधिवक्ता के रूप में पहचान दिलाई।

वे पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में वकालत करने लगे। अपने शुरुआती वर्षों में ही उन्होंने कई महत्वपूर्ण मामलों में बेहतरीन पैरवी की और चर्चित फैसलों का हिस्सा बने। उनकी कानून के प्रति गहरी समझ और न्याय के प्रति समर्पण ने उन्हें हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में स्थापित किया।

न्यायिक सेवा में प्रवेश और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ

वर्षों की मेहनत और उत्कृष्ट कानूनी क्षमता ने सूर्यकांत को न्यायपालिका में प्रवेश का अवसर दिलाया। उन्हें न्यायाधीश के रूप में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में नियुक्त किया गया। उनके निर्णय न्यायपूर्ण, तर्कपूर्ण और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप होते थे। बाद में वे हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने। उनकी सादगीपूर्ण जीवनशैली, प्रशासनिक दक्षता और तेज निर्णय क्षमता ने उन्हें देशभर में एक साफ-सुथरे और दूरदर्शी न्यायाधीश के रूप में पहचान दिलाई।

सुप्रीम कोर्ट तक का सफर

उनके उत्कृष्ट कार्यों और ईमानदार छवि को देखते हुए उन्हें सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश नियुक्त किया गया। यहाँ भी उन्होंने संवैधानिक, सामाजिक और प्रशासनिक विषयों पर कई महत्वपूर्ण फैसले दिए। न्यायपालिका में उनकी निरंतर प्रगति और बेदाग छवि ने उन्हें भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में प्रतिष्ठित किया।

निष्कर्ष

सूर्यकांत का सफर केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने सपनों को पूरा करने का साहस रखते हैं। हरियाणा के एक छोटे से गांव का बालक देश की सर्वोच्च न्यायिक कुर्सी तक पहुंचे—यह कहानी बताती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति, कड़ी मेहनत और ईमानदारी हमेशा सफलता का मार्ग बनाते हैं।

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