शिवराजपुर के सम्मानित नागरिकों को प्यार भरा नमस्कार
साथियों इस समय शिवराजपुर में दो प्रकरण बहुत तेजी से चल रहे हैं
1 श्री राधाकृष्ण मन्दिर
जैसा कि मुझे ज्ञात हुआ है कि वर्तमान थाना प्रशासन द्वारा ये दावा किया जा रहा है कि मन्दिर का निर्माण तत्कालीन थानाध्यक्ष गोपीचंद यादव द्वारा कराया गया और ये थाने की जमीन स्थित है इसलिए इस पूरे परिसर को थाने की ही कस्टडी में होना चाहिए दावा कुछ कुछ ठीक है लेकिन जानकारी के मुताबिक बता दें कि तत्कालीन थानाध्यक्ष गोपीचंद यादव ने इस मन्दिर के निर्माण में अग्रिम भूमिका तो निभाई परन्तु इस कस्बे के सम्मानित व्यापारियों नागरिकों का भी बहुत बड़ा तन मन धन का व्यापक सहयोग रहा जिसको नकारा नहीं जा सकता है रही बात थाने की जगह और दुकानों की तो जब कोई मन्दिर तालाब कुआं धर्मशाला जिस जगह बन जाता है वो सार्वजनिक स्थानों में गिना जाता है वो किसी एक का नहीं रहता और दुकानों का निर्माण इसलिए किया गया था कि इससे पुजारी जो मंदिर में आरती पूजन सफाई देखभाल करेगा उसकी जीविका चलेगी
थाना प्रशासन द्वारा इस मन्दिर में जिम्मेदारी लेना तो आसान है लेकिन उसका निर्वाहन करना बड़ा मुश्किल
चूंकि हमें लगता है कि पूरे प्रदेश में शायद ही कोई ऐसा थाना होगा जहां मन्दिर न हो लेकिन वहां कोई 2 अगरबत्ती जलाने वाला नहीं होगा
इसलिए स्थानीय लोगों की राय से ही थाना प्रशासन को आगे निर्णय लेना चाहिए
2 वार्ड नंबर एक में नगर पंचायत चेयरमैन द्वारा एक अभियान चलाया जा रहा है कि वहां जो भी जमीन खाली पड़ी है और उस जमीन का मालिकाना हक किसी के पास नहीं है वो टाऊन के कब्जे में लेकर उसको मोटा पैसा लेकर अपने पसंदीदा व्यक्ति को आवंटित कर दिया जाय वर्तमान चेयरमैन को जानकारी होनी चाहिए कि ये नगरपंचायत का 90 %हिस्सा पुरानी आबादी है जिसमें लोगों के पास पचासों साल से कब्जे हैं और कब्जे के ही आधार पर टाऊन एरिया मोटा टैक्स गृह कर ओर व्यापार कर ले रही है चूंकि चेयरमैन के बाहरी होने के कारण शिवराजपुर की भौगोलिक स्थिति का ज्ञान नहीं है और उनके गांव और कस्बे में उनका भी तमाम जमीनों पर कब्जा है जिसका मालिकाना हक उनके पास नहीं है फिर भी उन्होंने दर्जनों दुकानों का निजी तौर पर अलॉटमेंट किया है जो जांच का विषय है इसलिए चेयरमैन साहब से अनुरोध है कि जियो और जीने दो की नीति अपनाए आपसे पहले भी कई चेयरमैन हुए हैं और आगे भी होंगे पद किसी का गुलाम नहीं पद का दुरुपयोग नहीं
पद आते जाते रहते हैं
आनन्द प्रकाश वर्मा भैया जी
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