विकास की रफ्तार और पर्यावरण के बीच टकराव एक बार फिर सुर्खियों में है। पीलीभीत-टनकपुर राष्ट्रीय राजमार्ग 731(क) के चौड़ीकरण को हरी झंडी मिलने के बाद अब शहर के दायरे में खड़े लगभग 1400 हरे-भरे पेड़ों का भविष्य अधर में लटक गया है,


विकास की रफ्तार और पर्यावरण के बीच टकराव एक बार फिर सुर्खियों में है। पीलीभीत-टनकपुर राष्ट्रीय राजमार्ग 731(क) के चौड़ीकरण को हरी झंडी मिलने के बाद अब शहर के दायरे में खड़े लगभग 1400 हरे-भरे पेड़ों का भविष्य अधर में लटक गया है, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने पेड़ों को काटने के प्रस्ताव पर संज्ञान लिया है और उत्तर प्रदेश शासन व वन विभाग को उचित कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता अधिवक्ता शिवम कश्यप ने न केवल जिलाधिकारी बल्कि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT), सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल और प्रयागराज हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भी पत्र भेजकर इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि यदि सरकार और न्यायपालिका इस मामले में ठोस कदम उठाए तो विकास और पर्यावरण दोनों के बीच संतुलन कायम किया जा सकता है।
पीलीभीत-टनकपुर राष्ट्रीय राजमार्ग का चौड़ीकरण निस्संदेह विकास की दिशा में एक बड़ा कदम है, लेकिन 1400 पेड़ों का बलिदान पर्यावरण के लिए गहरी चोट साबित होगा।

दरअसल 26 जुलाई को, सुप्रीम कोर्ट के जनहित याचिका प्रकोष्ठ के सहायक रजिस्ट्रार ने उत्तर प्रदेश वन विभाग को शिवम कश्यप की याचिका पर कार्रवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। जिसमें उत्तर प्रदेश शासन और वन विभाग के प्रमुख अधिकारियों से विस्तृत रिपोर्ट मांगी। प्रमुख मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) अनुराधा वेमुरी ने पीलीभीत टाइगर रिजर्व के फील्ड निदेशक और बरेली क्षेत्र के मुख्य संरक्षक से पेड़ों को काटने के पीछे के तर्क और आवश्यकता पर विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने को कहा। इस पर कार्रवाई करते हुए मुख्य वन संरक्षक पीपी सिंह ने 26 अगस्त को पीलीभीत में अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की। दरअसल, राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण के इस क्रम में मार्च में लोक निर्माण विभाग (राष्ट्रीय राजमार्ग प्रभाग) ने पीलीभीत में लगभग आठ किलोमीटर हिस्से में सड़क किनारे लगे पेड़ों को चिह्नित करने के लिए पत्र लिखा था। इसके बाद वन विभाग ने 1,400 पेड़ों को चिह्नित कर लिया। इनमें से कई पेड़ 50 साल से अधिक पुराने है। पीलीभीत शहर से गुजरने वाले भिंड-लिपुलेख एनएच 731 के 8 किलोमीटर लंबे हिस्से पर खड़े हैं। पेड़ों को काटने की यह योजना मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और नेपाल में 840 किलोमीटर लंबी एक राजमार्ग परियोजना से जुड़ी है। इसका पहला चरण मैनपुरी से पीलीभीत तक 183.38 किलोमीटर लंबा है। मार्च में, लोक निर्माण विभाग के राष्ट्रीय राजमार्ग विंग के अधिशासी अभियंता शशांक भार्गव ने पीलीभीत के प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) को चेनेज 79.350 और 107 के बीच सड़क किनारे पेड़ों को चिह्नित करने का निर्देश दिया था। आवश्यकता की समीक्षा किए बिना, डीएफओ भरत कुमार डीके ने आदेश उप-प्रभागीय वनाधिकारी अंजनी कुमार श्रीवास्तव को भेज दिया। जिन्होंने 1,400 पेड़ों को काटने के लिए चिह्नित कर दिया। जब उनसे पूछा गया कि बाईपास के बावजूद पेड़ों को क्यों काटा जाना चाहिए, तो भार्गव ने कहा, हम शहर के केंद्र को चौड़ीकरण से नहीं छोड़ सकते। जिस पर शिवम कश्यप ने चिपको आंदोलन को पुनर्जीवित करने की धमकी दी है यदि कटाई आगे बढ़ती है, तो पेड़ों को काटने की वैधता और आवश्यकता दोनों पर सवाल उठाते। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने मामले में सख्ती दिखाई है कि इस प्रक्रिया पर पारदर्शी रिपोर्ट पेश करें।

शिवम कश्यप ने बताया की अब जब सुप्रीम कोर्ट भी इसमें शामिल है, तो अधिकारी केवल अपनी मनमानी पूरी करने के लिए 1,400 कीमती हरे पेड़ों को नष्ट करने की हिम्मत नहीं कर सकते।

राजकुमार वर्मा 
पीलीभीत

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Rajesh Kumar Siddharth

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राजेश कुमार सिद्धार्थ अबतक मीडिया ग्रुप के संपादक-इन-चीफ हैं, जिन्हें 25 वर्षों से अधिक का पत्रकारिता जगत में अनुभव प्राप्त है, और जो अपनी कुशल नेतृत्व क्षमता से अबतक मीडिया ग्रुप

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