बुद्ध का अप्प दीपो भव


 दीपज्योतिः परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः। दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ (हे दीप-ज्योति! आप परम ब्रह्म स्वरूप है। हे दीप, आपकी ज्योति जन का पालन करने वाली है। हे दीप, आप मेरे पापों का हरण करें; हे दीप, मैं आपको और आपकी पवित्र ज्योति को नमन करते हुए आपकी स्तुति करता हूँ।)

भारतीय परंपरा में किसी भी शुभकार्य से पहले दीप प्रज्ज्वलित किया जाता है। दीप प्रज्ज्वलन दीयों में होता है और दिवाली को रौशनी और दीयों का त्योहार माना जाता है। इस त्योहार में दीयों को महत्व दिए जाने के पीछे विज्ञान और आध्यात्म दोनों है। दिवाली से जुड़ा सबसे लोकप्रिय प्रसंग है- रावण वध के बाद भगवान श्रीराम का अयोध्या में प्रवेश करना। उस उल्लास में अयोध्यावासियों ने दीपक जलाए थे। अमित रूप प्रगटे तेहि काला। (श्रीराम असंज्य रूप में ऐसे प्रकट हुए जैसे एक दीये से कई दीपक जल उठे।) इसी आध्यात्मिक और वैज्ञानिक पक्ष की वजह से दीये पुरातन काल से हमारी संस्कृति में सबसे अहम रहे हैं। 

 

 

नागपुर के एजुकेशनिस्ट और पिछले 25 सालों से बच्चों को विज्ञान की बारीकियां समझाने और उन्हें विज्ञान के प्रति जागरूक करने का काम कर रहे पाणिनी तेलंग के मुताबिक, घर के दरवाजे पर दीये जलाने से घर में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ जाता है। जब हम घी या तेल का दीया जलाते हैं तो तेल या घी में मौजूद फैटी एसिड जलते हैं। फैटी एसिड का एक मॉलिक्यूल जलने से कार्बन के 56 और पानी के 52 मॉलिक्यूल निकलते हैं। एक फैटी एसिड मॉलिक्यूल को जलाने के लिए हवा में मौजूद ऑक्सीजन के 79 मॉलिक्यूल खर्च होते हैं।

 

गर्म हवा हल्की होती है। वह ऊपर चली जाती है और ठंडी हवा नीचे आती है। दीये की आग के चलते हवा में मौजूद ऑक्सीजन दीये की ओर तेजी से आती है। इसके चलते दीये के आसपास ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है। दिवाली पर दीये को घर के दरवाजे पर ही जलाना चाहिए। बहुत-से लोग घर में बहुत सारे दीये जलाते हैं। ये ठीक नहीं है। बंद जगह में बहुत सारे दीये जलाने से ऑक्सीजन का खर्च भी बढ़ जाएगा।

एकेटीयू यूनिवर्सिटी के वाइसचांसलर डा. प्रदीप कुमार मिश्रा कहते हैं कि जब भी घी या तेल का दीया जलाते हैं और वह पूरी तरह से जलता है तो आसपास के पर्यावरण में ऑक्सीजन बढ़ता है। भारतीय संस्कृति में दिवाली में दीया जलाने का महत्व था। बारिश के मौसम में हवा में कीट-पतंग बढ़ जाते हैं। दीये जलाने से इनको नियंत्रित करने में मदद मिलती है। 

 

एचबीटीयू के प्रोफेसर आर.के.त्रिवेदी कहते हैं कि किसी चीज को जलने के लिए ऑक्सीजन की जरूरत होती है। मैं इसकी पुष्टि नहीं करता कि दीया जलने से ऑक्सीजन बढ़ेगी। पारंपरिक दीयो को जलाने से फैटी एसिड जलता है जिससे पानी के कण निकलते हैं जो पर्यावरण के प्रदूषण को कम करते हैं। कुल मिलाकर दीया इको-फ्रेंडली है। 

मोतीलाल नेहरु नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के शिक्षक डा. सुशील कुमार कहते हैं कि दीया  जलाने से उसकी लौ का तापमान 400 से 1400 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। तापमान और दिए से निकलने वाले कई रेडिएशन की वजह से हवा में मौजूद वायरस और बैक्टीरिया मर जाते हैं। दिए में जलने वाले तेल से कई तरह की फ्यूम में बैक्टरिया को मारने की खूबी होती है। ये फ्यूम जब शरीर मे जाती है तो हमे फायदा पहुंचाती है।

 

पंचतत्वों को प्रदर्शित करता है दीया

दीया मिट्टी से बना होता है, जो पृथ्वी का प्रतीक है। उसमें जलने वाला तेल और बाती भी जमीन से ही मिलती है। वहीं पृथ्वी के चारों ओर अंतरिक्ष है। ऐसे में दीये के चारों ओर अंतरिक्ष की कल्पना की गई है। दीये में अग्नि भी है, उसे जलने के लिए वायु चाहिए और तेल के जलने की प्रक्रिया में पानी के मॉलिक्यूल भी बनते हैं। ऐसे में एक दीया उन पंचतत्वों का प्रतीक माना गया है जिनसे दुनिया बनी है।

 

अंधकार से रौशनी का दर्शन है दीपक

बृहदारण्यकोपनिषद् के श्लोक की एक पंक्ति ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ भी दीप की महिमा बताती है, जिसका अर्थ है- अंधकार से प्रकाश यानी रौशनी की तरफ बढ़ो। पौराणिक ग्रंथों में इसका अर्थ बताया गया है कि अंधकार यानी बुराई और बुरी आदतों को त्यागकर प्रकाश यानी सत्य के पथ पर उन्मुख होना ही वास्तविक साधना और अध्यात्म है। भविष्यपुराण में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को दीप दान के बारे में बताने का जिक्र है, जिसमें वे दीप दान की विधि के साथ दीपक को बुझाने, हटाने व चुराने तीनों को ही निषेध बताते हैं। दीपदान करने वाले की गति दीपक की लौ की तरह ऊपर की तरफ होती है, इसलिए पुण्य अवसरों पर स्त्री व पुरुषों को दीप दान जरूर करना चाहिए।

 

बुद्ध का अप्प दीपो भव

महात्मा बुद्ध ने आह्वान करते हुए ‘अप्प दीपो भव’ का संदेश इसी अर्थ में दिया था कि व्यक्ति स्वयं अपने लिए प्रकाश का स्रोत बने। दीप की नियति होती है कि वह स्वभाव से विराट और निष्कलुष होता है। वह अभय की भावना के साथ नि:संकोच रूप से चतुर्दिक सबको प्रकाशित करता है। यह करते हुए दीपक को अपने अस्तित्व की चिंता नहीं रहती। वह बताता है कि दूसरों के लिए सर्वस्व लुटा देना ही जीवन का अभिप्राय है।

 

दीया जलाने के हैं कई वैज्ञानिक कारण

-दिवाली मानसून के बाद आती है। मानसून के दौरान, हवा नम होती है और बैक्टीरिया से भर जाती है। दीये से होने वाली गर्मी हवा में मौजूद बैक्टीरिया, वायरस आदि को नष्ट कर देती है।

-दीया जलाने से कोई ऐसा तत्व या केमिकल नहीं निकलता जिससे वातावरण को नुकसान पहुंचे।

-दीया जलाने में किसी तरह के जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल नहीं किया जाता है।

 

-तेल में मौजूद मैग्नीशियम हवा में मौजूद सल्फर और कार्बन ऑक्साइड के साथ प्रतिक्रिया करके सल्फेट और कार्बोनेट बनाता है। भारी तत्व जमीन पर गिरते हैं, जिससे हवा हल्की हो जाती है और सांस लेना आसान हो जाता है।

मोमबत्ती जलाते समय रखें ध्यान

अगर आप मधुमक्खियों के छत्ते से निकलने वाले मोम से बनी मोमबत्ती जला रहे हैं तो उससे प्रदूषण नहीं होता है। लेकिन अगर आप पेट्रोलियम वैक्स से बनी मोमबत्ती जला रहे हैं तो उससे निकलने वाले कई तरह के केमिकल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं। दक्षिण कैरोलिना स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 2009 के एक अध्ययन में दावा किया कि पेट्रोलियम वैक्स से बनी मोमबत्तियों में पैराफिन मोम से टोल्युइन जैसे हानिकारक पदार्थ निकलते हैं।

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