लखनऊ। दीपावली के पर्व पर मिट्टी के दीयों की परंपरा एक बार फिर लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। बाजारों में छोटे-बड़े आकार के दीये, सजावटी दीपक और मिट्टी से बने पारंपरिक उत्पाद दिखाई दे रहे हैं। त्योहार के कारण कुम्हारों और मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कारीगरों के काम में तेजी आई है।
कई परिवार दीपावली से कई सप्ताह पहले ही दीये बनाने और उन्हें रंगने का काम शुरू कर देते हैं। मिट्टी तैयार करने से लेकर चाक पर दीये बनाने, सुखाने, पकाने और रंगने तक की प्रक्रिया में काफी मेहनत लगती है। इसके बावजूद कारीगरों की उम्मीदें दीपावली के बाजार से जुड़ी रहती हैं।
मिट्टी के दीये भारतीय परंपरा, ग्रामीण हस्तकला और स्थानीय रोजगार के प्रतीक हैं। इनके माध्यम से छोटे कारीगरों को अपनी कला दिखाने और परिवार की आय बढ़ाने का अवसर मिलता है। नागरिकों से अपील की जा रही है कि त्योहार पर स्थानीय कुम्हारों से मिट्टी के दीपक खरीदकर उनके श्रम का सम्मान करें।
दीपावली का वास्तविक संदेश तभी सार्थक होगा, जब त्योहार की खुशियों में समाज के प्रत्येक वर्ग की भागीदारी सुनिश्चित हो। गरीब, मजदूर, कारीगर और छोटे व्यापारियों तक भी त्योहार की समृद्धि पहुंचे।
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