- भारत में विधायक का चुनाव अक्सर बहुत स्थानीय मुद्दों पर लड़ा जाता है. एक बंद पड़ी नाली. एक पानी की पाइपलाइन, जो कभी बिछी ही नहीं. एक सड़क, जो हर मानसून में डूब जाती है. वोटर अपने उम्मीदवार को ठीक इन्हीं आधारों पर चुनते हैं, और यह पूरी तरह वाजिब बात है. ये समस्याएं रोज़मर्रा की ज़िंदगी को सीधे प्रभावित करती हैं. पर उस नाली और वोट डालने के बीच कहीं, कुछ और भी होता है, जो कहीं बड़ा है और जिसकी चर्चा बहुत कम होती है.
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- एक विधायक का सबसे साफ दिखने वाला काम अपनी राज्य विधानसभा के भीतर होता है. वे उन विषयों पर कानून बनाते हैं जो संविधान ने राज्यों के लिए रखे हैं, जैसे पुलिस, कृषि, सार्वजनिक स्वास्थ्य और ज़मीन. वे मंत्रियों से सवाल पूछते हैं, राज्य के बजट पर बहस करते हैं, और विधानसभा में अपनी संख्या के दम पर तय करते हैं कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा, या कौन मुख्यमंत्री नहीं रह पाएगा.
- इलेक्टोरल कॉलेज का सदस्य
- यह सब तो अपेक्षित है. जो चीज ज्यादातर लोगों को हैरान करती है, वह कुछ और ही है. भारत का हर विधायक उस निर्वाचक मंडल यानी इलेक्टोरल कॉलेज का भी सदस्य होता है, जो देश का राष्ट्रपति चुनता है. हर चुना हुआ सांसद भी इसी मंडल का हिस्सा होता है. जब भारत नया राष्ट्रपति चुनता है, तो आम नागरिक सीधे वोट नहीं डालते. उनकी जगह उनके विधायक और सांसद वोट डालते हैं, एक ऐसी व्यवस्था में जिसे संविधान ने जानबूझकर इस तरह बनाया कि राष्ट्रपति हर राज्य और संसद के दोनों सदनों के चुने हुए प्रतिनिधियों के प्रति जवाबदेह रहे, न कि सीधे एक राष्ट्रीय वोट के प्रति.
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- विधायक के वोट की कीमत
- यहीं से यह सच में दिलचस्प हो जाता है. हर विधायक के वोट की कीमत बराबर नहीं होती. हर विधायक के वोट को एक खास संख्यात्मक मूल्य दिया जाता है, जो उसके राज्य की जनसंख्या और उस विधानसभा में विधायकों की कुल संख्या के आधार पर तय होता है. सबसे हाल के राष्ट्रपति चुनाव में, उत्तर प्रदेश के एक विधायक के वोट की कीमत 208 थी. सिक्किम के एक विधायक के वोट की कीमत सिर्फ 7 थी. इसकी तुलना में, एक सांसद के वोट की कीमत 700 थी, चाहे वह किसी भी राज्य से चुना गया हो.
- 1971 की जनगणना का आंकड़ा
- इतना फर्क क्यों? जिस राज्य में लगभग उतनी ही विधानसभा सीटों में कहीं ज़्यादा लोग बसे हों, वहां हर विधायक का वोट भारी कर दिया जाता है, ताकि राष्ट्रपति चुनते समय बड़ी आबादी की आवाज कम न पड़े, भले ही हर राज्य को अपनी विधानसभा और अपनी आवाज़ अलग से मिलती रहे. यह पसंद-नापसंद का नहीं, संतुलन का फॉर्मूला है, और यह 1971 की जनगणना के आंकड़ों पर टिका है, ताकि जिस राज्य ने बाद के दशकों में अपनी आबादी की रफ्तार सफलतापूर्वक धीमी की, उसे इस हिसाब में चुपचाप नुकसान न उठाना पड़े.
- जरा सोचिए, लखनऊ या गंगटोक के किसी एक वोटर के लिए इसका क्या मतलब है. इन दोनों में से किसी के हाथ में कभी राष्ट्रपति चुनाव का बैलट पेपर नहीं आता. पर जिस इंसान को उन्होंने अपनी गली ठीक कराने या विधानसभा में कोई स्वास्थ्य योजना पास कराने के लिए चुना, वही इंसान हर पांच साल में एक बहुत बड़े फैसले का भी हिस्सा बनता है, वह फैसला जो यह तय करता है कि राष्ट्रपति भवन में कौन बैठेगा.
- भारतीय लोकतंत्र का असल में काम
- यह कोई छोटी सी औपचारिकता नहीं है, जो संविधान के किसी कोने में दबी पड़ी हो. यह भारतीय लोकतंत्र का एक असल में काम करने वाला हिस्सा है, जो हर बार राष्ट्रपति चुनाव के वक्त चुपचाप दोहराया जाता है, और ज़्यादातर नागरिक इसे कभी अपने ही स्थानीय वोट से जोड़कर नहीं देखते. इसका यह मतलब नहीं कि स्थानीय मुद्दे मायने नहीं रखते, या वोटरों का अपनी गली की परवाह करना गलत है.
- घर के पास की बंद नाली उस परिवार के लिए छोटी बात नहीं है, जो उसके बगल में रहता है. पर एक विधायक एक ही पद में दो बिल्कुल अलग तरह की ज़िम्मेदारियां संभालता है, एक जो उसके निर्वाचन क्षेत्र की सीमा पर खत्म हो जाती है, और दूसरी जो सीधे भारत के राष्ट्रपति तक पहुंचती है.
- गली ठीक कराने वाला इंसान
- ज़्यादातर चुनाव प्रचार सिर्फ पहली तरह की बात करते हैं. दूसरी का ज़िक्र लगभग कभी नहीं होता. शायद इसकी वजह सीधी है. एक बंद नाली को आप उंगली उठाकर दिखा सकते हैं. पर हर पांच साल में एक बंद प्रक्रिया के भीतर डाला गया इलेक्टोरल कॉलेज का वोट, वैसे नहीं दिखाया जा सकता. अगली बार जब आपके राज्य में विधानसभा चुनाव हों, तो शायद याद रखने लायक बात यह है कि आप सिर्फ अपनी गली ठीक कराने वाला इंसान नहीं चुन रहे.
- आप उस प्रक्रिया का एक छोटा, पर वजनदार हिस्सा भी चुन रहे हैं, जो आगे चलकर तय करता है कि पूरे देश का राष्ट्रपति कौन बनेगा. एक ऐसे वोट के लिए यह एक अजीब सी पहुंच है, जो ज़्यादातर लोग सिर्फ एक सड़क के बारे में सोचकर डालते हैं.
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