ज्ञानेश कुमार के पास 2 कानूनी कवच मौजूद हैं. ज्ञानेश के खिलाफ महाभियोग पास कराने के लिए विपक्ष को 2 तिहाई बहुमत की जरूरत होगी, जो संभव नहीं है. इसी तरह उनके खिलाफ पुलिसिया एक्शन नहीं लिया जाता है.


  • चुनाव आयुक्त एसएस संधु और विवेक जोशी के 14 डिसेंट नोट सामने आने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष ने मोर्चा खोल दिया है. एक तरफ कांग्रेस समेत कई बड़ी विपक्षी पार्टियों ने ज्ञानेश के खिलाफ संसद में महाभियोग लाने की घोषणा की है.
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  • वहीं दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल के कृष्णानगर से सांसद महुआ मोइत्रा ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ थाने में शिकायत दर्ज कराई है. एक और मामला सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा है. एक वकील ने भारत के अटॉर्नी जनरल को पत्र लिखकर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अवमानना कार्रवाई चलाने की मांग की है.
  • हालांकि, विपक्ष की इन तमाम कवायदों का फिलहाल ज्ञानेश कुमार या उनकी कुर्सी पर असर पड़ने की गुंजाइश बहुत कम है. मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर ज्ञानेश कुमार को मजबूत कानूनी और संवैधानिक प्रोटेक्शन मिला हुआ है.
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  • ज्ञानेश कुमार के पास 2 मजबूत सुरक्षा कवज
  • बतौर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल 2029 के शुरुआत तक है. यानी अभी 2 साल कम से कम ज्ञानेश अपने पद पर रहेंगे. उन्हें पद से हटाने के लिए कांग्रेस ने महाभियोग लाने का फैसला किया है. कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश के मुताबिक पहले भी 2 बार कोशिश की गई है. अब हम नए सिरे से इसके लिए प्रयास करेंगे.
  • संविधान के अनुच्छेद 324 (5) के मुताबिक चुनाव आयोग के आयुक्त या मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के जजों की तरह महाभियोग के तहत ही हटाया जा सकता है. महाभियोग के प्रस्ताव को पेश करने और पास कराने के भी अलग-अलग नियम हैं.
  • 1. महाभियोग के प्रस्ताव को पेश करने के लिए लोकसभा में 100 तो राज्यसभा में 50 सांसदों के समर्थन की जरूरत होती है. हालांकि, लोकसभा में स्पीकर और राज्यसभा में सभापति को यह तय करना होता है कि इसे स्वीकार किया जाए या नहीं.
  • 2. प्रस्ताव को पास कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (2 तिहाई) की जरूरत होती है. यानी ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए लोकसभा में 362 सांसदों का समर्थन जरूरी है. इसी तरह राज्यसभा में महाभियोग को पास कराने के लिए 164 सांसदों का समर्थन जरूरी है.
  • विपक्ष के पास संसद में इस वक्त इतना बड़ा समर्थन नहीं है. बुधवार (23 सितंबर) को भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव आयोग के विवाद को जबरन का विवाद करार दिया. पार्टी प्रवक्ता सांबित पात्रा ने कहा कि विपक्षी पार्टियां जानबूझकर चुनाव आयोग को निशाने पर ले रही है.
  • यानी सत्ताधारी बीजेपी फिलहाल ज्ञानेश कुमार के समर्थन में है. ऐसे में उनके खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई का सफल होना मुश्किल है.
  • सिविल और क्रिमिनल केस नहीं चलाया जा सकता
  • 2023 में संसद ने चुनाव आयोग को लेकर एक कानून पास किया. इसकी धारा 16 के मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों के खिलाफ आधिकारिक कर्तव्य को निभाते हुए लिए गए किसी फैसले, किए गए काम या दिए गए बयान को लेकर उनके खिलाफ सिविल या आपराधिक मुकदमा शुरू नहीं किया जा सकता और न ही ऐसा मामला जारी रखा जा सकता है.
  • इतना ही नहीं रिटायरमेंट के बाद भी उनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया जा सकता है. कुल मिलाकर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ उनके कार्यकाल में किए गए किसी भी फैसले को लेकर भविष्य में भी कोई कार्रवाई नहीं हो सकती है. हालांकि, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक बयान में कहा है कि ऐसे लोगों को भविष्य में छोड़ा नहीं जाएगा.
  • कॉकरोच पार्टी ने 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया
  • इधर, गुरुवार को कॉकरोच पार्टी के नेता अभिजीत दीपके ने नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए कहा कि अगर ज्ञानेश कुमार खुद इस्तीफा नहीं देते हैं तो हम 48 घंटे बाद आंदोलन करेंगे. दीपके के मुताबिक ज्ञानेश के कारण 13 करोड़ लोगों के नाम काट दिए गए. यह अन्याय है.
  • दीपके ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा- लोकतंत्र का मतलब है कि जनता अपनी सरकार चुने, लेकिन जब से भारत में ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त बने हैं, तब से सरकार यह तय कर रही है कि कौन वोट करेगा और कौन नहीं. यह देशद्रोह है.

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