- जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ चल रही लड़ाई में एक बड़ा बदलाव नजर आ रहा है. सुरक्षा एजेंसियों के आंकड़े बताते हैं कि आतंक का रास्ता चुनने वाले स्थानीय युवाओं की संख्या तेजी से नीचे आई है. 2025 में पूरे साल के लिए दिए गए सुरक्षा आंकड़ों के मुताबिक, सिर्फ एक स्थानीय युवा आतंकी संगठन में शामिल हुआ. इसके मुकाबले पहले के सालों में यह संख्या कई गुना ज्यादा रही थी. यही बदलाव अब जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के बदलते चेहरे की ओर इशारा कर रहा है.
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- दूसरी तरफ आतंकवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. सुरक्षा बल लगातार काउंटर टेरर ऑपरेशन चला रहे हैं और विदेशी आतंकियों की मौजूदगी अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है. 2025 में दिए गए एक सुरक्षा आकलन के मुताबिक, 19 आतंकियों को ऑपरेशन में मार गिराया गया, जिनमें 8 पाकिस्तानी थे. यानी मारे गए आतंकियों में करीब 40 फीसदी पाकिस्तानी नागरिक थे. यह आंकड़ा बताता है कि स्थानीय भर्ती घटने के बावजूद सीमा पार से आने वाले आतंकियों का खतरा बना हुआ है.
- स्थानीय युवाओं की भर्ती बड़ी चिंता थी
- सबसे दिलचस्प तस्वीर सक्रिय आतंकियों के आंकड़े से सामने आती है. नवंबर 2025 में सुरक्षा सूत्रों के हवाले से सामने आए आंकड़े के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में 131 आतंकी सक्रिय थे. इनमें 122 पाकिस्तानी और सिर्फ 9 स्थानीय बताए गए थे. यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ साल पहले आतंकवादी संगठनों के लिए स्थानीय युवाओं की भर्ती एक बड़ी चिंता थी. अब सुरक्षा एजेंसियों के सामने चुनौती का बड़ा हिस्सा विदेशी आतंकियों से जुड़ा दिखाई देता है.
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आंकड़ों में क्या बदला?- 19 आतंकी 2025 के दिए गए सुरक्षा आंकड़े में मारे गए, इनमें 8 पाकिस्तानी थे.
- सिर्फ 1 स्थानीय युवा के 2025 में आतंकी संगठन से जुड़ने की बात कही गई है.
- नवंबर 2025 में 131 सक्रिय आतंकियों में 122 पाकिस्तानी और 9 स्थानीय बताए गए थे.
- सरकारी आंकड़ों के अनुसार, आतंकियों की शुरू की गई घटनाएं 2018 के 228 से घटकर 2025 में 12 रह गईं.
- 2025 में आतंक से जुड़ी नागरिक मौतें 28 और सुरक्षा बलों की मौतें 16 बताई गईं. 2018 में यही आंकड़े 55 और 91 थे.
- 2021 में लोकल आतंकी की संख्या
- 2021 में जम्मू-कश्मीर में स्थानीय युवाओं की आतंकी संगठनों में भर्ती का आंकड़ा 146 था. यह संख्या बताती है कि उस साल बड़ी संख्या में स्थानीय युवा आतंकवाद की राह पर गए थे. हालांकि, इसके बाद स्थानीय भर्ती में लगातार और तेज गिरावट देखने को मिली. 2022 में यह संख्या घटकर 121 रह गई. 2023 में इसमें और बड़ी गिरावट आई और सिर्फ 19 स्थानीय युवा आतंकी संगठनों में शामिल हुए. 2024 में यह आंकड़ा महज 4 रह गया, जबकि 2025 में सिर्फ 1 स्थानीय युवा आतंकी संगठन में शामिल हुआ. यानी 2021 से 2025 के बीच स्थानीय भर्ती में भारी कमी आई है.
- स्थानीय भर्ती में इतनी बड़ी गिरावट क्यों अहम?
- आतंकवादी संगठनों के लिए स्थानीय युवाओं की भर्ती हमेशा से बड़ी चुनौती रही है. किसी इलाके के युवक को संगठन में शामिल करने से आतंकियों को स्थानीय भौगोलिक जानकारी, संपर्क और मदद मिल सकती है. इसलिए जब स्थानीय भर्ती घटती है तो आतंकवादी नेटवर्क के लिए जमीन पर काम करना मुश्किल हो जाता है. 2025 में सिर्फ एक स्थानीय युवक के आतंकी बनने का आंकड़ा इसी बदलाव को दिखाता है.
- यह आंकड़ा सुरक्षा एजेंसियों के उस दावे को मजबूती देता है कि स्थानीय युवाओं का एक बड़ा हिस्सा अब हिंसा के रास्ते से दूर रहना चाहता है. सरकार की ओर से भी लगातार यह कहा गया है कि विकास, रोजगार, शिक्षा और दूसरी योजनाओं के जरिए युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है. लेकिन दूसरी तस्वीर भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. स्थानीय भर्ती भले कम हुई हो, लेकिन आतंकियों की कुल मौजूदगी खत्म नहीं हुई. नवंबर 2025 के आंकड़ों में 131 सक्रिय आतंकियों में 122 विदेशी बताए गए थे.
- आतंकवाद का बदला हुआ चेहरा
- 2025 के आंकड़े यह भी बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद का पैटर्न बदल रहा है. पहले स्थानीय भर्ती और बड़े पैमाने पर सड़क पर होने वाली हिंसा सुरक्षा के लिए बड़ी चिंता थी. अब विदेशी आतंकियों की मौजूदगी, घुसपैठ और आतंकियों को स्थानीय स्तर पर मिलने वाली मदद पर ज्यादा ध्यान है. सरकार के मुताबिक, 2018 में जम्मू-कश्मीर में 228 आतंकी घटनाएं हुई थीं, जबकि 2025 में यह संख्या घटकर 12 रह गई.
- स्थानीय भर्ती क्यों घटी?
- जम्मू-कश्मीर में स्थानीय युवाओं की आतंकी संगठनों में भर्ती घटने के पीछे सुरक्षा कार्रवाई के साथ-साथ रोजगार, कौशल विकास और युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने की योजनाओं को भी एक कारण माना जा रहा है. गृह मंत्रालय के मुताबिक, सरकार ने हिमायत, पीएम कौशल विकास योजना, छात्रवृत्ति, रोजगार और युवा एक्सचेंज कार्यक्रम जैसे कदम उठाए हैं. 2025 में गृह मंत्रालय ने भी आतंकी संगठनों में युवाओं की भर्ती में उल्लेखनीय कमी का जिक्र किया था. वहीं वतन को जानो जैसे कार्यक्रमों के जरिए अब तक करीब 2,868 युवा/बच्चे देश के दूसरे हिस्सों से परिचित कराए जा चुके हैं.
पत्थरबाजी की घटनाएं शून्य- इसी अवधि में सुरक्षा बलों की मौत 91 से घटकर 16 और नागरिकों की मौत 55 से घटकर 28 हुई. यह लंबी अवधि में सुरक्षा स्थिति में आए बदलाव का महत्वपूर्ण संकेत है. पत्थरबाजी का आंकड़ा भी इसी बदलाव को दिखाता है. गृह मंत्रालय के पुराने आंकड़ों के मुताबिक 2018 में संगठित पत्थरबाजी की 1,328 घटनाएं दर्ज हुई थीं, जबकि 2023 और 2024 के उपलब्ध आंकड़ों में ऐसी घटनाएं शून्य थीं. 2025 में भी पत्थरबाजी की घटनाएं शून्य रहने की जानकारी सामने आई है.
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