इंस्टाग्राम पर चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मटेरियल से जुड़े विज्ञापनों का मामला सिर्फ सोशल मीडिया मॉडरेशन की चूक भर नहीं है, बल्कि यह भारत में ऐसे क्राइम की रिपोर्टिंग और एक्शन के पूरे सिस्टम पर सवाल खड़ा करता है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने मेटा, केंद्र सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी मंत्रालय (MeitY), सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर दो हफ्ते के भीतर एक्शन टेकन रिपोर्ट मांगी है. आयोग को शिकायत मिली थी कि इंस्टाग्राम पर चलाए गए कुछ पेड विज्ञापन, आपत्तिजनक सर्च वर्ड्स के जरिए यूजर्स को ऐसे टेलीग्राम चैनलों तक पहुंचा रहे थे जहां बच्चों से जुड़ा यौन शोषण मटेरियल (CSAM) मौजूद था. भारत में साइबरटिपलाइन के जरिए साल 2025 में करीब 19 लाख रिपोर्ट मिलीं, मगर FIR का डेटा काफी कम रहा.
इस पूरे विवाद को यूनिसेफ की एक नई रिपोर्ट और गहरा कॉन्टेक्स्ट देती है. 21 देशों में 12 से 17 साल के करीब 2.1 करोड़ इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले बच्चों पर हुए स्टडी में सामने आया कि लगभग 2 करोड़ बच्चों ने बीते एक साल में टेक्नोलॉजी के जरिए किसी न किसी रूप में यौन शोषण या उत्पीड़न का सामना किया. इनमें से डेढ़ करोड़ को बिना उनकी इच्छा के यौन सामग्री दिखाई गई, जबकि 40 लाख बच्चों की निजी तस्वीरें बिना सहमति शेयर कर दी गईं. करीब 60 फीसदी मामले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हुए, लेकिन 1 फीसदी से भी कम मामलों की जानकारी अधिकारियों तक पहुंच पाई.
NHRC ने आखिर क्या पूछा है
आयोग ने अपने नोटिस में दो बड़े सवाल उठाए हैं. पहला, क्या POCSO यानी प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज एक्ट, 2012 के तहत तय रिपोर्टिंग की कानूनी जिम्मेदारी का पालन किया गया. दूसरा, क्या ऐसे प्लेटफॉर्म जिनका AI सिस्टम कंटेंट को एक्टिवली आकार देता है, वे इंटरमीडियरी यानी बीच की कड़ी को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा का दावा जारी रख सकते हैं.
पहले सवाल पर आयोग ने मेटा से पूछा है कि क्या कथित क्राइम की जानकारी पुलिस को दी गई थी और अगर नहीं दी गई तो इसके लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान की जाए. POCSO एक्ट की धारा 19 के तहत यह जरूरी है कि जिस किसी को भी ऐसे अपराध की आशंका हो या जानकारी हो, वह इसकी सूचना स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट या लोकल पुलिस को दे. आयोग ने साफ कहा है कि इस जिम्मेदारी की जगह इंटरनल बातचीत, शिकायत निवारण या रेगुलेटरी बातचीत नहीं ले सकती.
दूसरा सवाल एक अलग याचिका से जुड़ा है, जिसमें कहा गया है कि मेटा के AI बेस्ड टूल्स अब सिर्फ थर्ड पार्टी कंटेंट होस्ट नहीं करते, बल्कि कैप्शन जनरेट करने, पोस्टिंग शेड्यूल सुझाने और एंगेजमेंट बढ़ाने में भी मदद करते हैं. आयोग ने इसे एक अहम रेगुलेटरी सवाल बताते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से पूछा है कि क्या ऐसे प्लेटफॉर्म अब भी इंटरमीडियरी की कैटेगरी में आते हैं या फिर IT Rules 2021 के तहत ऑनलाइन क्यूरेटेड कंटेंट के पब्लिशर जैसी भूमिका निभा रहे हैं.
रिपोर्ट से FIR तक का लंबा और उलझा रास्ता
मेटा से जुड़ा यह मामला भले ही एक शिकायत पर बेस्ड हो, लेकिन यह उस बड़े सिस्टम की झलक भर है जो रिपोर्ट्स को सजा तक पहुंचाने में पहले से ही मुश्किलों का सामना कर रहा है. 2025 में मिली 19 लाख रिपोर्ट में से बेहद कम मामले ही पुलिस एक्शन तक पहुंच पाए. साइबरटिपलाइन एक ऐसा अलर्ट सिस्टम है जो तब एक्टिव होता है जब कोई टेक कंपनी बच्चों से जुड़े यौन शोषण मटेरियल का पता लगाती है. यह रिपोर्ट पहले अमेरिका स्थित नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एंड एक्सप्लॉइटेड चिल्ड्रन के पास जाती है और भारत से कनेक्शन दिखने पर इसे भारतीय एजेंसियों को भेजा जाता है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ये रिपोर्ट पहले नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो और इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर के पास जाती हैं, जो गृह मंत्रालय के तहत काम करते हैं. इसके बाद इन्हें संबंधित राज्य और जिला एजेंसियों तक भेजा जाता है. दिल्ली में यह जिम्मेदारी इंटेलिजेंस फ्यूजन एंड स्ट्रैटेजिक ऑपरेशंस यूनिट यानी IFSO की होती है, जो जिले की पहचान कर मामला संबंधित थाने को भेजती है.
NCRB की 2024 की क्राइम इन इंडिया रिपोर्ट बताती है कि बच्चों के खिलाफ IT एक्ट के तहत दर्ज 1,238 साइबर क्राइम मामलों में से 1,099, यानी करीब नौ में से आठ मामले, बच्चों से जुड़ी यौन सामग्री के पब्लिश या ट्रांसमिशन से जुड़े थे. FIR दर्ज होने से पहले जांचकर्ता अकाउंट डिटेल, IP लॉग, ईमेल, फोन नंबर और डिजिटल हैश वैल्यू जैसी जानकारी के आधार पर यह पता लगाते हैं कि सामग्री कहां से अपलोड या शेयर की गई. दीवान बताते हैं कि अगर तस्वीर या वीडियो पहली नजर में किसी नाबालिग से जुड़ा आपत्तिजनक मटेरियल लगता है, तभी उस आधार पर FIR दर्ज की जाती है, लेकिन अक्सर बच्चे की उम्र साबित करना मुश्किल हो जाता है. धुंधली तस्वीरें या अस्पष्ट बैकग्राउंड होने पर केस दर्ज करने में भी दिक्कत आती है. एक बार FIR दर्ज होने के बाद जांचकर्ता प्लेटफॉर्म से सब्सक्राइबर जानकारी, IP एड्रेस और डिवाइस जब्त कर फॉरेंसिक जांच शुरू करते हैं.
कोर्ट में मामले और आगे की चुनौतियां
ऐसे मामलों की सुनवाई POCSO एक्ट के तहत बनी स्पेशल कोर्ट में होती है, जिन्हें IT एक्ट की धारा 67B से जुड़े मामलों की सुनवाई का भी अधिकार है. लेकिन सजा दिलाने में डिजिटल सबूत की भूमिका सबसे अहम होती है और बचाव पक्ष अक्सर यह सवाल उठाता है कि डिवाइस या SIM इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति वही था या नहीं. मामले की जानकारी रखने वालों के मुताबिक, असली दिक्कत यह है कि साइबरटिपलाइन रिपोर्ट सिर्फ यह बताती है कि मटेरियल कहां मिला, न कि वह कहां से शुरू हुआ. हर अतिरिक्त प्रोसेस एक ऐसी देरी है जिसे कोई बच्चा बर्दाश्त नहीं कर सकता. साथ ही, अपराधी अब एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म और AI जनरेटेड कंटेंट का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं, जिससे पुराने तरीकों से पहचान करना और मुश्किल होता जा रहा है.
यूनिसेफ की रिपोर्ट भी इसी तस्वीर की पुष्टि करती है. करीब 40 फीसदी मामले कभी किसी के साथ शेयर ही नहीं किए गए, जबकि 1 फीसदी से भी कम मामले पुलिस या हेल्पलाइन तक पहुंचे. यूनिसेफ ने प्लेटफॉर्म को डिजाइन से सेफ बनाने, कानूनों को मजबूत करने, भरोसेमंद रिपोर्टिंग सिस्टम बनाने और बच्चों पर सुरक्षा की जिम्मेदारी डालने की बजाय परिवार, स्कूल और समाज को जवाबदेह बनाने की सिफारिश की है. साफ है कि मेटा को भेजा गया NHRC का नोटिस भले ही एक शिकायत से शुरू हुआ हो, लेकिन यह उस बड़े और उलझे हुए सिस्टम की तरफ इशारा करता है जहां रिपोर्ट की संख्या बढ़ने के बावजूद न्याय तक पहुंचने वाले मामलों का हिसाब अब भी अधूरा है.
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